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SIR में शिक्षक, स्कूलों में सन्नाटा: MP में बजट तो बढ़ा पर साक्षरता घटी, 'ड्यूटी' के बोझ तले टीचर

MP Education Crisis: मध्यप्रदेश में शिक्षा के बजट में 41 फीसदी की भारी बढ़ोतरी के बावजूद साक्षरता दर में गिरावट दर्ज की गई है क्योंकि प्रदेश के करीब 22 फीसदी शिक्षक क्लासरूम छोड़कर चुनावी ड्यूटी और दूसरे सरकारी कामों में व्यस्त हैं. ग्राउंड रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य के 92 हजार स्कूलों में 70 हजार पद खाली हैं और कई जगह एक ही ब्लैकबोर्ड के भरोसे तीन-तीन कक्षाएं चल रही हैं जिससे बोर्ड परीक्षाओं से पहले छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है.

SIR में शिक्षक, स्कूलों में सन्नाटा: MP में बजट तो बढ़ा पर साक्षरता घटी, 'ड्यूटी' के बोझ तले टीचर

MP Teacher Election Duty: मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में इन दिनों पढ़ाई और भविष्य दोनों ही 'सरकारी ड्यूटी' की भेंट चढ़ रहे हैं. एक तरफ शिक्षा का बजट 41 फीसदी तक बढ़ गया है, लेकिन दूसरी तरफ साक्षरता की दर सुधरने के बजाय लगातार गोते लगा रही है. विडंबना यह है कि प्रदेश के हजारों शिक्षक क्लासरूम में बच्चों को पढ़ाने के बजाय घर-घर जाकर मतदाता सूचियां और सरकारी फाइलें दुरुस्त कर रहे हैं. आगर मालवा से आई एक तस्वीर इस सिस्टम की सबसे डरावनी हकीकत पेश करती है, जहां दो कमरों के स्कूल में एक ही ब्लैकबोर्ड के तीन टुकड़ों पर तीन अलग-अलग कक्षाओं का पाठ चल रहा है. बजट की भारी-भरकम बढ़ोतरी और जमीन पर खाली पड़े 70 हजार पदों के बीच सवाल यही है कि अगर गुरुजी चुनाव और सर्वे में ही उलझे रहेंगे, तो साक्षरता के पायदान पर नीचे से चौथे पायदान पर खड़ा मध्यप्रदेश आखिर आगे कैसे बढ़ेगा?

एक ब्लैकबोर्ड, तीन कक्षाएं और मजबूर छात्र

NDTV के ग्राउंड रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. मसलन- आगर मालवा के खेड़ा माधोपुर गांव में शिक्षा का मजाक उड़ता दिख रहा है. यहां दो कमरों के स्कूल में 55 बच्चे पढ़ते हैं, जिन्हें पढ़ाने की जिम्मेदारी सिर्फ एक शिक्षक भारत कुमार जाटव पर है. स्कूल में तैनात दूसरे शिक्षक नवंबर से ही एसआईआर (SIR) ड्यूटी में लगे हैं. शिक्षक भारत कुमार अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहते हैं, "मैं अकेला क्या-क्या पढ़ाऊं? कभी अंग्रेजी का पाठ लिखने को बोलता हूं, तो बच्चे बातें करने लगते हैं. चौथी और पांचवीं के बच्चों को एक साथ बिठाना पड़ता है क्योंकि मेरे साथी शिक्षक बीएलओ ड्यूटी में हैं." वहीं, चौथी क्लास के छात्र राज का दर्द और भी गहरा है, वह कहता है, "जब सर दूसरी तरफ देखते हैं तो बच्चे चिल्लाते हैं, हमारी पढ़ाई नहीं हो पा रही है." 

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आंकड़ों में पिछड़ता मध्यप्रदेश

विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि 2021-22 में शिक्षा का बजट जो 25,953 करोड़ था, वह अब बढ़कर 36,582 करोड़ हो गया है. लेकिन विडंबना देखिए कि इसी दौरान साक्षरता दर 76.7% से घटकर 75.2% रह गई. राज्य में 70 हजार शिक्षकों के पद खाली हैं और 12,210 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. इस पर स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह का कहना है कि सरकार 32 हजार नई भर्तियां कर रही है और फिलहाल 76 हजार अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है.

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चुनाव ड्यूटी का बोझ और खाली क्लासरूम

प्रदेश के 92 हजार स्कूलों का हाल कुछ ऐसा ही है. करीब 65 हजार बीएलओ (BLO) ड्यूटी में लगे कर्मचारियों में बड़ी संख्या शिक्षकों की है. नियमों के मुताबिक गणित और विज्ञान के शिक्षकों को इन कामों से दूर रखना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि शिक्षा विभाग भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है. बजट तो बढ़ रहा है, लेकिन वह जा कहां रहा है किसी को नहीं पता. पटवारी का आरोप है कि बच्चों की शिक्षा पर संकट मंडरा रहा है और साक्षरता दर का गिरना इसकी पुष्टि करता है. 

शिक्षकों पर बढ़ रहा है काम का बोझ: जगदीश यादव

इस पूरे मसले पर  राज्य स्तरीय  शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश यादव पिछले दो महीने से हमारे शिक्षक बहुत परेशान है, हम सरकार के हर काम करने के लिए तैयार है लेकिन सरकार को भी समझना चाहिए की कौन से काम शिक्षकों से करवाने है कौन से नहीं. इतना भार था हम पर. कुछ कलेक्टरों ने तो यह तक बोला की आप शैक्षणिक कार्यों से मुक्त हैं. इन सबका असर रिजल्ट पर और पढ़ाई पर पड़ रहा है. 50,000 से ज़्यादा शिक्षकों को इस काम में लगाया  गया जिसके चलते कई स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं रहे. शिक्षकों पर इतना काम का बोझ डाला कि कई शिक्षक अब इस दुनिया में नहीं रहे.

बोर्ड परीक्षा और भविष्य पर सवाल

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि चुनावी ड्यूटी में लगे ये शिक्षक 7 फरवरी 2026 को कार्यमुक्त होंगे, और उसी दिन से 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो रही हैं. यानी जिस समय शिक्षकों को बच्चों का रिवीजन कराना चाहिए, उस समय वे वोटरों की लिस्ट फाइनल कर रहे होंगे. देखा जाए तो साल 2016 के सरकारी आदेशों को दरकिनार कर शिक्षकों को मिड-डे मील से लेकर जनगणना तक के कामों में लगा दिया गया है. अगर यही आलम रहा, तो बजट की बढ़ोतरी केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी और क्लासरूम का सन्नाटा और गहराता जाएगा. सरकारी बाबुओं को यह समझना होगा कि आलीशान स्कूल की इमारतें और करोड़ों का बजट तब तक बेमानी है, जब तक कि क्लासरूम में बच्चों के पास उनके शिक्षक मौजूद न हों. शिक्षा के नाम पर हो रहा यह 'बजट विस्तार' तब तक सार्थक नहीं होगा, जब तक कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक बोझ से मुक्त कर वापस उनके मूल कर्तव्य यानी 'पढ़ाने' की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाती.

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