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मध्य प्रदेश के इन 62 गांवों में दो महीने तक मनाई जाती है दीवाली, जानिए खास परंपरा के बारे में

देश भर में दिवाली के त्योहार को लोग निर्धारित समय पर मनाते हैं लेकिन मध्य प्रदेश के डही अंचल के आदिवासी समाज के 62 आदिवासी बहुल गांवों के लोग पुरानी परंपरा के अनुसार ही दो माह तक दिवाली का त्योहार मनाते हैं.

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मध्य प्रदेश के इन 62 गांवों में दो महीने तक मनाई जाती है दीवाली, जानिए खास परंपरा के बारे में
दो महीने तक दिवाली मनाते हैं ये गांव

धन की देवी महालक्ष्मी और सुख समृद्धि के देवता भगवान गणेश की पूजा (Laxmi-Ganesh Pooja) दीपावली के पर्व पर खास रूप से की जाती है. साल के सबसे बड़े त्योहार दीपावली (Deepawali) को मनाने के लिए लोग महीनों पहले से तैयारियां करते हैं. हिंदू धर्म में दीपावली का विशेष महत्त्व बताया गया है. हर साल कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाए जाने वाले दीपोत्सव के इस त्योहार को मनाने के लिए अलग ही उत्साह देखने को मिलता है. पांच दिवसीय इस त्योहार को लोग बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में ऐसे गांव है जहां दो महीने तक दिवाली का त्योहार मनाया जाता है..

प्रभु श्रीराम रावण का वध कर और 14 वर्ष का वनवास पूरा करके जब आयोध्या वापस लौटे तब इस खुशी में आयोध्यावासियों ने दीयों की रोशनी से नगर को सजाया. तभी से पूरे देश में बड़े धूमधाम से 5 दिनों तक दिवाली का त्योहार मनाया जाता है लेकिन मध्य प्रदेश के डही अंचल के आदिवासी समाज में अलग तरीके से दिवाली मनाने की परंपरा आज भी कायम है.

62 गांवों में मनाते हैं दो माह तक दिवाली

देश भर में दिवाली के त्योहार को लोग निर्धारित समय पर मनाते हैं लेकिन मध्य प्रदेश के डही अंचल के आदिवासी समाज के 62 आदिवासी बहुल गांवों के लोग पुरानी परंपरा के अनुसार ही दो माह तक दिवाली का त्योहार मनाते हैं.

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गांव के मुखिया तय करते हैं कब मानेगी दिवाली

खेती किसानी के कामकाज को खत्म होने के बाद यहां दीपावली का त्योहार मनाया जाता है. इन 62 गांवों में एक या दो दिन नहीं बल्कि दो माह तक दिवाली मनाई जाती है. इसके लिए किसी एक तारीख का निर्धारण नहीं होता है बल्कि गांव के मुखिया ये तय करते हैं कि दिवाली का पर्व कब मनाया जाएगा.

पशुधन पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है. इस गांव के आदिवासी समाज के लोग दिवाली के पर्व पर पशुधन पूजा को बहुत महत्व देते हैं, जिसके चलते पशुधन की पूजा की जाती है जिसमें मिट्टी से बने घोड़े, ढावे और माझली को आदिवासी लोग कुम्हारों से खरीदते हैं.

पशुओं को सजाते हैं

इन्हें खरीदते समय पशु बांधने के स्थान पर गाय, भैंस, बैल के सामने रखकर पूजा की जाती है. इस दौरान पशुओं को भी खूब सजाया जाता है. घर में पकवान बनाए जाते हैं और कुलदेवी और इष्ट देवताओं को उनका भोग लगाया जाता है और लोग नाचते गाते हुए दिवाली के त्योहार का आनंद लेते हैं.

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