
शिवपुरी का नाम सुनते ही आपको याद आ सकता है—शिव, पानी, शिवत्व! लेकिन यहां शिवपुरी के लोग भगवान शिव की तरह गले में विष नहीं, प्यास लिए घूम रहे हैं। पानी की तलाश में… खुद अपने ही घरों के कमरों को खोदकर.
चौंकिए नहीं... आपने सही पढ़ा ...
यहां लोग घर में कमरा नहीं—कुंआ खोद रहे हैं. मानो पीने के पानी के लिए अब RERA या नक्शा पास कराना जरूरी न हो… पानी चाहिए, तो खुदाई करिए. खुद ही इंजीनियर बनिए, खुद ही मजदूर, और खुद ही सिस्टम के मुंह पर तमाचा मारिए. जिन घरों में कभी बच्चों के लिए पढ़ाई का कमरा सोचा था, वहां अब फावड़े चल रहे हैं. छेनी-हथौड़ी से दीवारें नहीं, ज़मीनें खोदी जा रही हैं. वजह? पानी की तलाश. मध्य प्रदेश के शिवपुरी में लोग अब अपने घरों के भीतर ही कुएं (या कहिए मिनी-बोरवेल) खोद रहे हैं — और वो भी सरकारी मदद से नहीं, बल्कि सिस्टम की बेरुख़ी से प्रेरित होकर.
यहां कोई पानी की टंकी नहीं है, कोई हैंडपंप नहीं है, कोई बोरवेल नहीं है. अगर कुछ है तो उम्मीद — और वो भी ज़मीन के नीचे कहीं गड़ी हुई. इसलिए वे अपने ही घर के कमरों को खोदकर पानी निकाल रहे हैं. आप सोच रहे होंगे कि अगर कुआं ही खोदना है तो घर के बाहर खोद लेते घर के अंदर ही क्यों...तो जनाब इसका जवाब ये है- इन मजबूरों की मजबूरी ये है कि उनके पास अपने घर के अलावा कोई जमीन नहीं है..
आगे बढ़ने से पहले कुछ आंकड़ों पर आप गौर फरमा लीजिए ताकि स्थिति की गंभीरता को आप समझ सकें

लुधावली बस्ती में 100 से ज्यादा परिवार रहते हैं, लेकिन उनके पास जल नहीं, नल नहीं. नगर पालिका ने कोई हेडपंप नहीं लगवाया, न बोरवेल, न कुआं, न बावड़ी. .लेकिन एक दिन जब इंतजार थक गया, तो लोगों ने तय किया—अब पानी सरकार से नहीं, पाताल से लाना होगा.
यहीं की निवासी मनीषा जाटव कहती हैं-"हमने तो अपने घर के कमरे में ही गड्ढा खोद दिया, अब ये गड्ढा ही हमारी उम्मीद है. हो सकता है इसी से पानी निकले, या फिर आत्मसम्मान बहकर चला जाए". इसी तरह से मीना जाटव की आवाज में व्यंग्य भी है, पीड़ा भी, "अब हम गंदा पानी पीएं, बीमार हों, मरे—किसी को फर्क नहीं पड़ता.चुनाव के पहले नेता कहते हैं—हम पानी देंगे, घर देंगे. फिर चुनाव जीत जाते हैं और हमें वैसे ही भूला देते हैं जैसे भूलभुलैया में रास्ता भूल गए हों."

महिलाएं घर के अंदर आती हैं और कुएं से पानी लेकर जाती हैं. मोहल्ले के लोगों को एक कुएं से ही पानी मिल पा रहा है
जिस बस्ती में लोग प्यास से जूझ रहे हैं, उसके बिल्कुल बाजू में गौशाला क्षेत्र है.वहां मानीखेड़ा डैम से पाइपलाइन आ चुकी है, नल भी हैं, पानी भी है। मतलब, पानी के पाइप भी 'राजनीति' से निर्देशित होते हैं—जैसे कि GPS हो, जहां वोट हैं वहीं मोड़ते चलो. हद तो ये है कि नगर पालिका कहती है, "बस्ती अवैध है, वहां कुछ नहीं कर सकते." इन परिवारों की हालत 8 साल से एक जैसी है. न पीने का पानी, न सुनवाई, न बदलाव. मीडिया आया, हेडलाइन बनी, कुछ फोटो खिंचे, लेकिन सिस्टम की प्यास न बुझी, न इंसान की. स्थानीय निवासियों की काफी जद्दोजहद के बाद नगर पालिका के अधिकारियों के मुंह से ये शब्द निकले-"प्रयास कर रहे हैं. मॉनिटरिंग कर रहे हैं.जल्द निराकरण करेंगे."
लोग जब कहते हैं—"हमें इन गड्डों में ही दफना दो..." तो वो सिर्फ गड्डे की बात नहीं कर रहे होते. वो बता रहे होते हैं उस आत्मसम्मान की मौत, जो हर दिन लाइन में लगकर, भीख मांगकर, और वोट देकर शर्मिंदा होता है.
साल भर पहले सिंधिया जी ने कहा था…
चुनाव के दौरान जब पानी के संकट पर सवाल पूछा गया था, तो मौजूदा सांसद और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने फरमाया था – "ग्वालियर-चंबल इलाके में बहुत कम वर्षा हुई है, यही सीजन है कि वाटर लेवल कम होता है. बोरिंग भी 700-800 फीट नीचे चली गई है और पिछली बारिश की वजह से जो नदी-नाले भरने चाहिए थे, वे 30-40% कम वर्षा के चलते नहीं भर पाए. इस बार संकट जरूर है लेकिन हम उसका समाधान निकालने की बात कर रहे हैं"

यहां लोग छेनी और हथौड़ी की सहायता से खुद ही अपने घर के अंदर कमरे में कुआं खोद ले रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि नेता आते हैं वादा करते हैं लेकिन फिर भूल जाते हैं.
भूजल हर साल जा रहा है और नीचे
फिर क्या हुआ? इंद्रदेव ने जवाब दे दिया, अच्छी बारिश हो गई. नदियां मुस्कुराईं, तालाब लबालब हो गए — लेकिन सिस्टम की पाइपलाइन अब भी सूखी पड़ी है. समाधान की तलाश में जो बैठकें हुईं, शायद उनमें पानी से ज्यादा चाय पी गई है. शिवपुरी के लोग अब हैंडपंप नहीं खोज रहे हैं बल्कि भूगोल पढ़ रहे हैं. क्योंकि जानना ज़रूरी हो गया है कि अगला बोर कितने ‘हेक्टेयर मीटर' नीचे जाएगा. केंद्रीय जल बोर्ड की मानें तो जिले में वार्षिक भूजल पुनर्भरण 74,729 हैक्टेयर मीटर नीचे है, और निकासी 52,488 हैक्टेयर मीटर.
खानियाधाना ब्लॉक में तो भूजल विकास स्तर में 83% तक की गिरावट हो चुकी है.अगर पानी नहीं मिला तो अगला सर्वे ‘रेगिस्तान की संभावनाएं' पर किया जाएगा. कृषि विभाग कहता है कि जिले का 60% हिस्सा वर्षा आधारित है, यानी किसान बादल देखकर बीज डालते हैं और भगवान देखकर उम्मीद. शेष 40% क्षेत्र में सिंचाई होती है – बशर्ते नहर में पानी आ जाए, नहर तक बिजली पहुंच जाए. जल जीवन मिशन में शिवपुरी के 841 गांवों को जल से जोड़ने की योजना है, मगर इन गांवों के लोग अब भी घरों में खुदाई कर रहे हैं – पीने के पानी के लिए, खजाने के लिए नहीं.
पाताल की ओर सुरंगे खोद रहे हैं लोग !
ख़बर यही है — लोग अब आशियाने नहीं बना रहे, पाताल की ओर सुरंगें खोद रहे हैं. और सिस्टम... वो काग़ज़ पर एक और योजना बनाने में व्यस्त है — “जल दर्शन योजना – पानी नहीं देंगे, दर्शन करवा देंगे।” शिवपुरी की लुधावली बस्ती में जो हो रहा है, वो चेतावनी है… कि आने वाला समय सिर्फ सूखा नहीं लाएगा, बल्कि सूखी सोच भी लाएगा। अगर हम अब भी नहीं चेते, तो शहरों के ड्राइंग रूम में भी लोग बाल्टी भरकर बैठेंगे—भूखे नहीं, प्यासे मरेंगे.तो अब फैसला आपको करना है—कमरा सजाना है या खोदना है?
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