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आतंक का दूसरा नाम खूंखार नक्सली हिड़मा के गांव में पुलिस और सुरक्षाबलों ने डाला डेरा, खोला नया कैंप

सूत्रों के मुताबिक हिड़मा को गिरफ्तार ना कर पाने के पीछे उसकी सुरक्षा प्रणाली है. बताया जाता है कि हिड़मा की सुरक्षा के लिए 5 किलोमीटर का त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा है. स्थानीय निवासियों के बीच मजबूत नेटवर्क भी है. स्थानीय होने के कारण जंगल के अंदर और बाहर की जानकारी काफी अच्छे से है.

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आतंक का दूसरा नाम खूंखार नक्सली हिड़मा के गांव में पुलिस और सुरक्षाबलों ने डाला डेरा, खोला नया कैंप
हिड़मा के गांव में पुलिस और सुरक्षाबलों ने डाला डेरा

Police Camp in Sukma: बस्तर में चार दशक से जारी नक्सलवाद के खिलाफ जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. नक्सलियों के पूर्व बटालियन चीफ और सेंट्रल कमेटी मेम्बर माड़वी हिड़मा के गांव में सुरक्षाबलों ने डेरा डाल दिया है. रविवार को पुलिस और सुरक्षाबलों ने पूवर्ती गांव में नया पुलिस कैंप खोलकर माओवादियों के सबसे मजबूत कहे जाने वाले किले को ढहा दिया. यह इलाका माओवादियों के नेता माड़वी हिडमा का पैतृक गांव है.

सुकमा और बीजापुर जिले के सरहदी इलाकों में बीते ढाई महीने में 7 पुलिस कैंप खोले गए हैं. रविवार को सुरक्षाबलों ने दुर्दांत नक्सली नेता माड़वी हिड़मा के गांव पूवर्ती में नया पुलिस कैंप खोल दिया है. यह कैंप बस्तर पुलिस के लिहाज से बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. आपको बता दें कि सुकमा व बीजापुर जिले के कई इलाकों को माओवादियों का मजबूत गढ़ माना जाता है. शासन-प्रशासन की पहुंच से दशकों दूर रहने की वजह से यहां नक्सलियों की जनताना सरकार का राज है और इस पूरे इलाके में माड़वी हिड़मा के आतंक का बोलबाला है.  

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आतंक का दूसरा नाम माड़वी हिड़मा

बता दें कि बस्तर में घटित सभी नक्सली घटनाओं में माड़वी हिड़मा ही मास्टरमाइंड था. ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत हो या फिर बुरकापाल में 25 जवानों का बलिदान, माड़वी हिड़मा की अगुवाई में नक्सलियों ने इसे अंजाम दिया है. इसके अलावा बस्तर में अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक हत्याकांड के नाम से प्रसिद्ध झीरम नक्सली कांड में भी माड़वी हिड़मा की अहम भूमिका रही है.  

लंबे संघर्ष और सैकड़ों बलिदानों के बाद मिली कामयाबी

बस्तर के बेहद नक्सल प्रभावित इलाकों तक पहुंचने में पुलिस और प्रशासन को कई साल तक संघर्ष करना पड़ा है. इसके लिए सैकड़ों पुलिस और सुरक्षाबल के जवानों ने अपनी शहादत दी है. सड़क की सुरक्षा हो या फिर कैंप की सुरक्षा, जवानों ने अपना खून बहाया है. पहली बार नक्सली नेता माड़वी हिड़मा को घेरने के लिए साल 2021 में सीआरपीएफ और राज्य पुलिस की संयुक्त पार्टी टेकलगुड़ा में घुसी थी. इस दौरान नक्सलियों के एंबुश में फंसकर 22 जवानों की शहादत हुई थी. तीन साल के बाद दोबारा सुरक्षाबल उसी इलाके में घुसे लेकिन इस बार उन्होंने वहीं रहकर नक्सलियों का सामना करनी की रणनीति बनाई और कैंप स्थापित कर दिया. 30 जनवरी को टेकलगुड़ा में खोले गए नए पुलिस कैंप पर भी नक्सलियों ने हमला कर दिया था जिसमें 3 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए थे.

एसपी ने खुद संभाली कमान

सुकमा पुलिस के इतिहास में अब तक का सबसे खतरनाक कैंप पूवर्ती में खोला गया है. एसपी किरण चव्हाण ने खुद रहकर कैंप खेलने में अहम भूमिका निभाई है. शनिवार की सुबह जब जवान वहां पहुंचे तो नक्सलियों ने हमले करने का प्लान बना लिया था लेकिन जवानों की जवाबी कार्रवाई के चलते वे मौके से भागने में कामयाब रहे. 30 जनवरी को टेकलगुड़ा पुलिस कैंप पर हुए नक्सली हमले के बाद सुरक्षाबल आक्रामक रणनीति के साथ आगे बढ़े और पूवर्ती में पुलिस कैंप खोलने में सफल हुए.

क्यों गिरफ्तार नहीं हो पा रहा हिड़मा?

सूत्रों के मुताबिक हिड़मा को गिरफ्तार ना कर पाने के पीछे उसकी सुरक्षा प्रणाली है. बताया जाता है कि हिड़मा की सुरक्षा के लिए 5 किलोमीटर का त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा है. स्थानीय निवासियों के बीच मजबूत नेटवर्क भी है. स्थानीय होने के कारण जंगल के अंदर और बाहर की जानकारी काफी अच्छे से है. हिड़मा के पास मौजूद कमांडो अच्छी तरह से प्रशिक्षित और आधुनिक हथियारों से लैस हैं. व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए एक अलग टीम भी है.

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कैंप खुलने से नक्सलियों के मनोबल को करारा झटका

दुर्दांत नक्सली नेता माड़वी हिड़मा के गांव पूवर्ती में पुलिस कैंप के खुलने से माओवादियों के मनोबल को करारा झटका लगेगा. माड़वी हिड़मा गुरिल्ला युद्ध की अच्छी जानकारी रखता है. हिड़मा लड़ाई की रणनीति बनाने में भी माहिर बताया जाता है इसलिए सुरक्षाबल के जवान नक्सल नेता हिड़मा को घेरने की रणनीति बना रहे हैं. अगर वह पकड़ा या मारा जाता है तो इससे संगठन की कमर टूट जाएगी.

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