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कौन थे आचार्य विद्यासागर महाराज जिन्हें गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड ने माना 'ब्रह्मांड का देवता'? शोक में डूबा जैन समाज

आचार्य विद्यासागर के निधन पर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आधे दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गई है. चंद्रगिरि तीर्थ की ओर से जारी बयान के अनुसार, आचार्य विद्यासागर महाराज ने देर रात 2:35 बजे 'चंद्रगिरि तीर्थ' में 'सल्लेखना' करके देह त्याग दी.

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कौन थे आचार्य विद्यासागर महाराज जिन्हें गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड ने माना 'ब्रह्मांड का देवता'? शोक में डूबा जैन समाज
जानिए कौन थे आचार्य विद्यासागर महाराज

Acharya Vidyasagar Maharaj: जाने-माने जैनमुनि आचार्य विद्यासागर महाराज ने छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित 'चंद्रगिरि तीर्थ' में 'सल्लेखना' करके रविवार को देह त्याग दी. जैन समाज के लिए यह बेहद दुखद खबर है. चंद्रगिरि तीर्थ की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, 'सल्लेखना' जैन धर्म में एक प्रथा है, जिसमें देह त्यागने के लिए स्वेच्छा से अन्न-जल का त्याग किया जाता है.

आचार्य विद्यासागर महाराज जैन समाज के सबसे प्रसिद्ध संत थे. वह आचार्य ज्ञानसागर के शिष्य थे. आचार्य ज्ञानसागर ने समाधि लेते समय अपना 'आचार्य' मुनि विद्यासागर को सौंप दिया था. 22 नवंबर 1972 में आचार्य बनते वक्त मुनि विद्यासागर की उम्र सिर्फ 26 साल थी. उनका जन्म 10 अक्टूबर 1946 को शरद पूर्णिमा के दिन कर्नाटक के बेलगांव जिले के चिक्कोड़ी गांव में हुआ था. 

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माता-पिता को भी दी थी दीक्षा

आचार्य विद्यासागर के पिता का नाम मल्लप्पाजी अष्टगे और माता का नाम श्रीमती अष्टगे था. बचपन में घर पर सभी उन्हें नीलू कहकर पुकारते थे. आचार्य विद्यासागर के बारे में कई बातें ऐसी हैं जो हैरान कर देने वाली हैं. उन्होंने अपने जीवन में 500 से अधिक लोगों को दीक्षा दी. खुद आचार्य विद्यासागर के माता और पिता ने भी उन्हीं से दीक्षा ली थी और बाद में उन्होंने समाधि ले ली. 

22 साल की उम्र में ली 'दिगंबर साधु' की दीक्षा

आचार्य विद्यासागर को लोग उनके गहन आध्यात्मिक ज्ञान के लिए जानते थे. साल 1968 में सिर्फ 22 साल की उम्र में आचार्य ज्ञानसागर ने मुनि विद्यासागर को 'दिगंबर साधु' के रूप में दीक्षा दी और चार साल बाद उन्हें 'आचार्य' का पद प्राप्त हुआ. उन्होंने अपना जीवन जैन धर्मग्रंथों और दर्शन के अध्ययन और अनुप्रयोगों में समर्पित कर दिया. संस्कृत और अन्य भाषाओं पर उनकी अद्भुत पकड़ थी. उन्होंने खुद भी कई आध्यात्मिक ग्रंथ लिखे हैं. 

'ब्रह्मांड के देवता' के रूप में सम्मानित

जैन समुदाय में उनके कुछ व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त कार्यों में निरंजन शतक, भावना शतक, परीष जया शतक, सुनीति शतक और श्रमण शतक शामिल हैं. उन्होंने हिंदी को बढ़ावा देने और किसी भी राज्य में न्याय प्रणाली को उसकी आधिकारिक भाषा में बनाने के अभियान का भी नेतृत्व किया था. 11 फरवरी को आचार्य विद्यासागर महाराज को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में 'ब्रह्मांड के देवता' के रूप में सम्मानित किया गया था.

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पीएम मोदी ने लिया था आशीर्वाद

आचार्य विद्यासागर के निधन पर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आधे दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गई है. चंद्रगिरि तीर्थ की ओर से जारी बयान के अनुसार, आचार्य विद्यासागर महाराज ने देर रात 2:35 बजे 'चंद्रगिरि तीर्थ' में 'सल्लेखना' करके देह त्याग दी. इसमें कहा गया, 'महाराज जी डोंगरगढ़ में 'चंद्रगिरि तीर्थ' में छह माह से रह रहे थे और पिछले कुछ दिनों से बीमार थे. तीन दिन से वह सल्लेखना का पालन कर रहे थे और उन्होंने अन्न-जल का त्याग किया हुआ था.' पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पांच नवंबर को डोंगरगढ़ गए थे और उन्होंने आचार्य विद्यासागर महाराज से मुलाकात की थी और उनका आशीर्वाद लिया था

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