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MP बासमती चावल को GI टैग देने की मांग , पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखा पत्र

Geographical Indication: वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि कई वर्षों से मध्य प्रदेश के किसान राज्य के 14 जिलों में उत्पादित उच्च गुणवत्ता वाले बासमती चावल को जीआई टैग देने की मांग कर रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार इस मुद्दे पर उदासीन बनी हुई है. उन्होंने ऐलान किया कि अगर इस संबंध जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन किया जाएगा. 

MP बासमती चावल को GI टैग देने की मांग , पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखा पत्र
FORMER CM DIGVIJAY SINGH DEMANDING GI TAG FOR MP BASMATI RICE
भोपाल:

GI Tag For MP Basmati: मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर मध्य प्रदेश में उत्पादित बासमती चावल को ‘ज्योग्राफिकल इंडिकेशन' (जीआई) टैग देने की मांग की है. रविवार को भोपाल में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में संवाददाताओ को संबोधित करते हुए पूर्व सीएम ने कहा कि अगर इस संबंध में जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन किया जाएगा.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि कई वर्षों से मध्य प्रदेश के किसान राज्य के 14 जिलों में उत्पादित उच्च गुणवत्ता वाले बासमती चावल को जीआई टैग देने की मांग कर रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार इस मुद्दे पर उदासीन बनी हुई है. उन्होंने ऐलान किया कि अगर इस संबंध जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन किया जाएगा. 

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उत्पाद की पहचान व विशेषता की गारंटी देता है ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग

गौरतलब है जीआई टैग मुख्य रूप से कृषि उत्पादों, हस्तशिल्प और खाद्य वस्तुओं को उनकी भौगोलिक उत्पत्ति और विशिष्ट गुणवत्ता के आधार पर दिया जाता है. यह टैग उत्पाद की पहचान और विशेषता की गारंटी देता है, जिससे किसान और उत्पादक अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त कर सकते हैं. पूर्व सीएम के मुताबिक जीआई टैग के अभाव में मध्यप्रदेश के किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है.

'पत्र लिखने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया'

पूर्व सीएम ने मध्य प्रदेश के बड़े चावल उत्पाद जिले श्योपुर, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, गुना, विदिशा, रायसेन, सीहोर, हरदा, होशंगाबाद, नरसिंहपुर और जबलपुर जिलों का उल्लेख करते हुए कहा कि, “यह अत्यंत आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस विषय पर तीन महीने पहले पत्र लिखने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों ने किसानों के हित में कोई ठोस कदम नहीं उठाया.

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पूर्व सीएम ने दावा किया कि 2013 में यूपीए-2 सरकार ने एमपी बासमती को जीआई टैग दिया था, लेकिन मौजूदा सरकार ने साल 2016 में इसे वापस ले लिया. उन्होंने कहा कि वर्तमान में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, यूपी और दिल्ली के बासमती चावल को जीआई टैग का लाभ मिल रहा है, लेकिन एमपी के किसान वंचित रखा गया है.

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मिल मालिकों व व्यापारिक लॉबी के दबाव में किसानों के साथ हो रहा भेदभाव

उन्होंने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों के मिल मालिकों और व्यापारिक लॉबी के दबाव में मध्य प्रदेश के किसानों के साथ भेदभाव किया जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में उत्पादित बासमती चावल को कम कीमत पर खरीदा जा रहा है और अन्य राज्यों के चावलों को जीआई टैग के नाम पर विदेशों में निर्यात किया जा रहा है, जिससे कंपनियां और व्यापारी भारी मुनाफा कमा रहे हैं जबकि किसानों को नुकसान हो रहा है.

'समय रहते निर्णय नहीं लिया तो भारत की स्थिति कमजोर हो सकती है

पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए दिग्विजय सिंह कहा कि उसने अपने बासमती चावल के लिए जीआई टैग वाले जिलों की संख्या 14 से बढ़ाकर 48 कर दी हैऔर वर्ष 2030 तक 21 अरब डॉलर के निर्यात बाजार का लक्ष्य रखा है. उन्होंने आगे कहा, “यदि भारत ने किसानों के हित में समय रहते निर्णय नहीं लिया तो अंतरराष्ट्रीय बासमती बाजार में देश की स्थिति कमजोर हो सकती है.

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बकौल दिग्विजय सिंह, एमपी में बासमती चावल की खेती 100 वर्षों से अधिक समय से की जा रही है, जिसका उल्लेख ब्रिटिश कालीन गजेटियर में मिलता है. राज्य की जलवायु और मिट्टी के कारण यहां उत्पादित बासमती चावल की सुगंध और गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है और अमेरिका, कनाडा, यूरोप और पश्चिम एशिया में इसकी मांग अधिक है.

'कुछ अधिकारी एमपी के किसानों के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं'

उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि, कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के कुछ अधिकारी मध्यप्रदेश के किसानों के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं और प्रधानमंत्री को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र और राज्य सरकार ने जल्द निर्णय नहीं लिया तो वह किसानों के साथ आंदोलन का नेतृत्व करेंगे।

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