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13, 14 और 16 की उम्र में चुन ल‍िया वैराग्य, 18 घंटे नंगे पांव चलकर ऐसे दी परीक्षा

Raipur Jain samaj: रायपुर के 8 जैन दीक्षार्थियों ने सांसारिक जीवन छोड़ संयम और तप का मार्ग चुना. इसमें 3 बच्चे भी शामिल हैं, जिन्होंने बचपन की खुशियों को पीछे छोड़ मोक्ष की ओर कदम बढ़ाया. जान‍िए mumukshu diksha Spiritual Path की पूरी कहानी. 

13, 14 और 16 की उम्र में चुन ल‍िया वैराग्य, 18 घंटे नंगे पांव चलकर ऐसे दी परीक्षा
रायपुर जैन समाज के 8 लोग मोक्ष पथ पर, तीन बच्चे भी शामिल, 8 फरवरी को मुम्‍बई में लेंगे दीक्षा

Raipur Jain samaj: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वैराग्य की यह कहानी इसलिए भी चौंकाती है क्योंकि इसमें सिर्फ बड़े ही नहीं, बल्कि तीन बच्चे भी शामिल हैं. 13, 14 और 16 साल की उम्र में जब आमतौर पर स्कूल, दोस्त और सपने होते हैं, उसी उम्र में रायपर जैन समाज के इन बच्चों ने भी गुरु द्वारा ली गई 18 घंटे नंगे पांव चलने जैसी कठ‍िन परीक्षा पास करके सांसारिक जीवन से अलग होकर संयम और तप का रास्ता चुना है.

रायपर जैन समाज में वैराग्‍य का यह फैसला अकेला नहीं है. बच्चों के अलावा पत‍ि-पत्‍नी की जोड़ी और फूड टेक्नोलॉजी में मास्टर्स कर चुकी 26 साल एक युवती ने भी सांसारिक जीवन त्यागने का संकल्प लिया है. रायपुर के कुल आठ दीक्षार्थियों की यह यात्रा जैन समाज में आस्था, त्याग और साहस की एक असाधारण मिसाल बन गई है. 

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Raipur Jain Samaj Mumukshu Diksha 3 Children on Monks Path

Raipur Jain Samaj Mumukshu Diksha 3 Children on Monks Path

रायपुर के आठ दीक्षार्थी

  1. शैलेंद्र संकलेचा, उम्र 49 साल
  2. आशीष सुराना, उम्र 42 साल
  3. आर्यन सुराना, उम्र 16 साल
  4. आरुष सुराना, उम्र 14 साल
  5. तनिष सोनिगरा, उम्र 13 साल
  6. एकता संकलेचा, उम्र 47 साल
  7. रितु सुराना, उम्र 40 साल
  8. सुरभि भंसाली, उम्र 26 साल
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रायपुर में दी विदाई

दीक्षा लेने जा रहे शैलेंद्र संकलेचा व एकता संकलेचा के बेटे यश संकलेचा ने NDTV से बातचीत में बताया कि 25 और 26 जनवरी 2026 को रायपुर के इंडोर स्टेडियम, बूढ़ापारा में श्री संयम मनोरथ उत्सव समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में तीन बाल दीक्षार्थियों सहित आठ सदस्यों को विदाई दी गई. 

Raipur Jain Samaj Mumukshu Diksha 3 Children on Monks Path

Raipur Jain Samaj Mumukshu Diksha 3 Children on Monks Path

मुंबई में 8 फरवरी को लेंगे दीक्षा

रायपुर से ये दीक्षार्थी अब मुंबई जाएंगे. मुंबई के बोरीवली में 4 से 8 फरवरी 2026 तक विशाल आयोजन होगा, जिसमें आचार्य भगवंत श्रीमद विजय योगतिलक सूरीश्वरजी देशभर से आए 58 दीक्षार्थियों को दीक्षा देंगे. रायपुर के आठ दीक्षार्थी भी इसमें शामिल होंगे. 

रायपुर जैन समाज के आठ दीक्षार्थियों में से किसी ने करोड़ों का व्यवसाय, किसी ने विदेश भ्रमण का सपना, और किसी ने बचपन की खुशियों को पीछे छोड़ जीवन को नए अर्थ देने का निर्णय लिया है. 
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किसी ने करोड़ों का व्यवसाय, किसी ने बचपन का मोह छोड़ा

शैलेंद्र संकलेचा व एकता: माता-पिता के रूप में संयम और साधना को चुना, अपने बेटे यश के लिए उदाहरण बने. 
आशीष सुराना: करोड़ों का होलसेल बैग बिजनेस छोड़ मोक्ष का मार्ग अपनाया. 
रितु सुराना: परिवार की जिम्मेदारियों के बीच त्याग और तप का मार्ग चुना. 
आर्यन सुराना: किशोर उम्र में खेल-खेल के सपनों को पीछे छोड़ संयम और तप अपनाया. 
आरुष सुराना: कम उम्र में बचपन का मोह छोड़ा और मोक्ष की राह चुनी. 
तनिष सोनिगरा: फिल्में, नए कपड़े और बाहरी दुनिया का आकर्षण छोड़ साधना की ओर बढ़े. 
सुरभि भंसाली: वर्ल्ड टूर और आधुनिक जीवन का सपना छोड़ साध्वी बनी, सोशल मीडिया और मित्रों से विरक्ति अपनाई.

जैन समाज में मुमुक्ष क्या होता है?

मुमुक्ष संस्कृत शब्द मु+मूक्ष से बना है, जिसका अर्थ होता है मोक्ष की इच्छा रखने वाला. जैन धर्म में मुमुक्ष वह व्यक्ति होता है जो सांसारिक बंधनों (परिवार, धन, सुख, मान-सम्मान आदि) से मुक्त होकर आत्मा के शुद्धिकरण और मोक्ष (मुक्ति) की खोज में लगा होता है.

मुमुक्ष जीवन में त्याग, संयम और साधना को अपनाता है. उसका मुख्य उद्देश्य जड़ और जीव में फँसी मोह-माया से मुक्ति पाना और निर्वाण/मोक्ष प्राप्त करना होता है. मुमुक्ष बनने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति तुरंत घर-बार छोड़ दे, लेकिन आंतरिक रूप से सांसारिक आकर्षणों से विरक्ति शुरू कर देता है.

जैन समाज में दीक्षा क्या होती है?

दीक्षा का अर्थ है धार्मिक या आध्यात्मिक रूप से जीवन का पूर्ण समर्पण, विशेषकर साधु-साध्वी बनने के लिए. जैन धर्म में दीक्षा लेने वाला व्यक्ति संसारिक जीवन में परिवार, व्यवसाय, सांसारिक सुख-सुविधाएं छोड़ देता है. संयम और तप अपनाता है. अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (संपत्ति का न्यूनतम उपयोग) का पालन. साधु/साध्वी के रूप में जीवन जीता है. उसके शेष जीवन का लक्ष्‍य मोक्ष की प्राप्ति रह जाती है. दीक्षा के बाद उसे जैन अनुशासन और नियमों का पालन करना होता है.

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