छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जैन समाज के आठ सदस्यों ने सांसारिक जीवन त्याग कर मुमुक्ष बनने का निर्णय लिया है. इनमें 13 से 27 वर्ष तक के बच्चे और युवती भी शामिल हैं. कठोर तप, 18 घंटे नंगे पांव चलने जैसी परीक्षाओं के बाद गुरु ने दीक्षा की अनुमति दी.
आमतौर पर लोग जीवन में सुख, सुविधाएं और भविष्य की योजनाएं तलाशते हैं, लेकिन रायपुर के आठ लोगों ने जीवन का अर्थ ही बदल दिया है. इन्होंने भौतिक इच्छाओं को छोड़कर आत्मिक शांति और मोक्ष का मार्ग चुन लिया.
सांसारिक सुख छोड़ ‘मोक्ष' के मार्ग पर चलने वाले सभी आठ लोग रायपुर के अलग-अलग जैन परिवारों से हैं, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही संयम और साधना का जीवन. इन सभी को कठोर परीक्षा में खरा उतरने के बाद ही मुमुक्ष बनने की अनुमति मिली है.

मुंबई में होगा दीक्षा महोत्सव
बता दें कि 8 फरवरी 2026 को मुंबई में संयमरंग उत्सव होगा, जिसमें देशभर के 64 मुमुक्ष दीक्षा लेंगे. इनमें रायपुर के ये आठ मुमुक्ष भी शामिल होंगे. इंडोर स्टेडियम, बूढ़ापारा रायपुर में 25-26 जनवरी को श्री संयम मनोरथ उत्सव समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 3 बाल दीक्षार्थियों सहित सभी 8 सदस्यों को विदाई दी गई.
गुरु की कसौटी पर परखे गए संकल्प
गुरु योग तिलक सुरीश्वर के अनुसार, मुमुक्ष बनने का रास्ता आसान नहीं होता. दीक्षा से पहले शिष्यों की कठोर परीक्षा ली जाती है. परीक्षा में 18 घंटे तक नंगे पांव चलना. सीमित और अप्रिय भोजन खाना व बच्चों और बड़ों सभी की सहनशक्ति परखी जाती है.
आधुनिक दुनिया से साध्वी बनने का निर्णय
वर्ल्ड टूर पर जाना की ख्वाहिश रखने वाली 27 वर्षीय सुरभि भंसाली ने फूड टेक्नोलॉजी में मास्टर्स किया है. आधुनिक जीवन, सोशल मीडिया, घूमना-फिरना पसंद करने वाली सुरभि का जीवन चातुर्मास के दौरान बदला.
चातुर्मास के बाद उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर साध्वी बनने का संकल्प लिया. परिवार के लिए यह निर्णय चौंकाने वाला जरूर था, लेकिन गर्व से भरा भी.
पूरा परिवार बना मुमुक्ष, रिश्तों को कहा अलविदा
रायपुर की आम्रपाली सोसायटी के आशीष सुराना, उनकी पत्नी रितु और दोनों बेटे आर्यन (16) व आरुष (14) चारों ने भी एक साथ मुमुक्ष बनने का फैसला लिया. एक ही परिवार के चार सदस्यों का एक साथ दीक्षा लेना जैन समाज में दुर्लभ उदाहरण माना जा रहा है.

व्यवसाय छोड़ा, मोह त्यागा
आशीष सुराना ने रायपुर में चल रहे अपने होलसेल बैग बिजनेस को बेच दिया. दीक्षा से पहले परिवार और करीबियों के साथ समय बिताया और फिर संयम के मार्ग पर निकल पड़े. परिजनों का कहना है कि बच्चों के लिए यह निर्णय सबसे कठिन था, लेकिन उनके दृढ़ संकल्प ने सभी को भावुक कर दिया.
13 साल की उम्र में वैराग्य
रायपुर की दावड़ा कॉलोनी निवासी 13 वर्षीय तनिष सोनिगरा ने भी मुमुक्ष बनने का फैसला किया. फिल्में, नए कपड़े और पसंदीदा खान-पान छोड़ने का संकल्प लेना माता-पिता के लिए आसान नहीं था, लेकिन बेटे की आस्था के आगे उन्होंने मन को मना लिया.

Raipur Jain Family monkhood Renunciation Diksha
माता-पिता ने चुना संयम, बेटा बना सहारा
NDTV से बातचीत में यश संकलेचा ने बताया कि उनके पिता शैलेंद्र संकलेचा और माता एकता ने भी मुमुक्ष बनने का निर्णय लिया. यश ने कहा कि “मां-पापा ने हमारे लिए पूरी जिंदगी जी, अब वे अपने सच्चे सुख के लिए जीना चाहते हैं.”
मुमुक्ष बनने के बाद जीवन कैसा होता है?
नया नाम और पहचान
बदली हुई वेशभूषा
सांसारिक रिश्तों से पूर्ण विरक्ति
गुरु ही मार्गदर्शक और परिवार
रायपुर के आठ दीक्षार्थी (सांसारिक जीवन त्यागने वाले)
शैलेंद्र संकलेचा -उम्र 49 साल
एकता संकलेचा-उम्र 47 साल
आशीष सुराना-उम्र 42 साल
रितु सुराना-उम्र 40 साल
आर्यन सुराना-उम्र 16 साल
आरुष सुराना-उम्र 14 साल
तनिष सोनिगरा-उम्र 13 साल
सुरभि बंसाली-उम्र 26 साल