
Naxalite In Chhattisgarh : आवश्यकता आविष्कार की जननी है. इसी तर्ज पर अब छत्तीसगढ़ के जंगल में ही नक्सली BGL जैसे विस्फोटक और कारतूस का निर्माण करने लगे हैं. इसका खुलासा हाल में नारायणपुर जिले में हुई मुठभेड़ (Naraynpur Naxalites Encounter) के बाद हुआ है. यहां पुलिस को बड़ी मात्रा में लोहे के कारतूस मिले हैं. पुलिस ने इन कारतूसों को बैलेस्टिक परीक्षण के लिए भेजा है . घने जंगलों में नक्सलियों का हथियार के बाद कारतूस का निर्माण सुरक्षाबलों के लिए चिंता का विषय बन सकता है.
दरअसल अबूझमाड़ के गोबेल और वत्तेकाल के जंगलों में हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों की टीम ने 6 नक्सलियों को मार गिराया था. जवानों ना बड़ी संख्या में नक्सलियों के हथियार भी बरामद किए थे. वहीं से उन्हें बड़ी मात्रा में लोहे के कारतूस भी मिले हैं. इन कारतूसों के आकार को देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि इनका इस्तेमाल 12 बोर बन्दूक में किया जा सकता है. 12 बोर बंदूक का निर्माण लम्बे समय से नक्सली जंगल में ही कर रहे हैं और बीते लंबे समय से होने वाले मुठभेड़ों में बड़ी मात्रा में 12 बोर बन्दूक भी बरामद किया जा रहा है. ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि घने जंगलों में नक्सली लगातार नए हथियार और विस्फोटकों के निर्माण पर न केवल लगातार काम कर रहे हैं, बल्कि इस प्रक्रिया में वे सफल भी हो रहे हैं.
दावा- नक्सलवाद अब ले रहा है अंतिम सांस
दरअसल बस्तर में चार दशक से काबिज़ नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए सरकार ने कमर कस ली है. छत्तीसगढ़ में सरकार बदलने के बाद से ही लगातार नक्सलियों के गढ़ में सुरक्षाबलों के कैम्प लगाए जा रहे हैं. साथ ही सुरक्षाबलों के जवान उन इलाकों तक पहुंच कर मुठभेड़ कर रहे हैं, जिन इलाकों में कभी जवानों का पहुंचना कठिन हुआ करता था. लगातार मिल रही सफलताओं के बाद अब जवानों और सरकार ने यह दावा करना भी शुरू कर दिया है कि बस्तर में नक्सलवाद अब अंतिम सांस ले रहा है. इसी बीच अबूझमाड़ के जंगलों से 7 जून को हुई मुठभेड़ के बाद जवानों को कुछ ऐसे सामान बरामद हुए हैं जो सुरक्षाबलों को चौंकाने के लिए काफी हैं.
कई बार हथियारों की फैक्ट्रियां बरामद हुई हैं
बस्तर के घने जंगलों में लगातार कई बार जवानों को सघन सर्चिंग के समय नक्सलियों के हथियार बनाने की फैक्ट्रियां या छोटे कारखाने मिले हैं. जहां नक्सलियों द्वारा तरह-तरह के हथियार बनाए जाते रहे हैं. जिनमें रायफल और देशी कट्टे के साथ साथ पिस्तौल जैसे हथियार भी शामिल हैं. जंगलों में हथियार और कारतूस बनाने के लिए नक्सली लेथ मशीनों का भी उपयोग करते हैं.

इससे पहले दंतेवाड़ा में नक्सलियों को लेथ मशीन पहुंचाते हुए रायपुर के एक व्यापारी को गिरफ्तार किया गया था. उस वक्त उस व्यापारी ने भी यह जानकारी दी थी कि हथियार बनाने के लिए नक्सली मिनी लेथ मशीन का उपयोग कर रहे हैं. हाल ही में कांकेर जिले में भी नक्सलियों का हथियार बनाने का कारखाना जवानों ने बरामद किया था.
लेकिन हाल में ही बरामद किए गए लोहे के कारतूस को देखकर ऐसा लग रहा है कि वे 12 बोर में इस्तेमाल करने के लिए बनाए गए कारतूस प्रतीत हो रहे हैं. उन कारतूस को बैलेस्टिक एग्जामिनेशन के लिए भेजा गया है. उसकी रिपोर्ट आने पर स्थिति और क्लियर हो जाएगी. नक्सलियों की सभी रणनीतियों को ध्यान में रखकर जवान उनसे लड़ने को तैयार हैं.
हथियार का निर्माण ही प्रमुख आपूर्ति का साधन
नक्सली संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रह चुके पूर्व नक्सली बदरन्ना ने भी इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि संगठन में हथियारों को बेहद सुरक्षित रखा जाता है क्योंकि इनके बिना लड़ाई संभव नहीं है और जब यह लड़ाई सरकार से लड़नी है तो यह तय है कि सरकार उनके हथियारों और कारतूसों को नुकसान पहुंचाने या उन तक नए कारतूस और हथियार पहुंचने में बाधा उत्पन्न करेगी. ऐसे में संगठन में हथियार को लेकर तीन प्रमुख रणनीति है. जिसमें पहली रणनीति है कि जवानो से लूटा जाए , दूसरी जंगलों में ही निर्माण किया जाए और तब भी जरुरत हो तो ख़रीदा जाए. ऐसे में जंगलों में सक्रिय रहने वाला नक्सली संगठन हमेशा से ही आसपास की चीजों से हथियार निर्माण की कोशिशों में लगा रहता है. IED बम , स्पाइक होल , तीर बम इसके प्रमुख उदाहरण हैं.
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