Somnath Swabhiman Parv: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने गुरुवार से शुरू हो रहे 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' (Somnath Swabhiman Parv) के अवसर पर भारत की सांस्कृतिक अटूटता और संघर्ष की गाथा को याद किया है. उन्होंने कहा कि अटूट आस्था के एक हजार वर्ष का यह अवसर हमें राष्ट्र की एकता के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की प्रेरणा देता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, "सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आज से शुभारंभ हो रहा है. एक हजार साल पहले जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर ने अपने इतिहास का पहला आक्रमण झेला था. साल 1026 का आक्रमण और उसके बाद हुए अनेक हमले भी हमारी शाश्वत आस्था को डिगा नहीं सके, बल्कि इनसे भारत की सांस्कृतिक एकता की भावना और सशक्त हुई और सोमनाथ का बार-बार पुनरोद्धार होता रहा."
प्रहार से प्रबल वर्तमान तक..
— Bhupendra Patel (@Bhupendrapbjp) January 7, 2026
संघर्ष से स्वर्णिम वर्तमान तक..
सोमनाथ मंदिर भारत की अटूट आस्था का प्रतीक है।
आइए, माननीय प्रधानमंत्री श्री @NarendraModi जी की प्रेरणा से आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में जुड़ें।
शिवत्व की शाश्वतता का जयघोष करें।#SomnathSwabhimanParv pic.twitter.com/WRFaUZX6k5
ऐसा है इतिहास Somnath Mandir History
सोमनाथ मंदिर सिर्फ पत्थरों से बना कोई ढांचा या केवल पूजा की जगह नहीं है. यह भारत की उस सभ्यता की आत्मा का प्रतीक है, जो हजारों साल पुरानी है, जिस पर बार-बार हमले हुए, लेकिन जिसे कभी पूरी तरह तोड़ा नहीं जा सका. सोमनाथ की कहानी दरअसल आस्था, स्मृति और समय के साथ एक सभ्यता के रिश्ते की कहानी है. इसे बार-बार नष्ट करने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार यह पहले से ज्यादा मजबूती के साथ खड़ा हुआ.
वर्ष 2026…
— MyGov Hindi (@MyGovHindi) January 6, 2026
पहले आघात के 1000 वर्ष पूर्ण होने का यह क्षण इतिहास को नहीं, अटूट आस्था को स्मरण करता है।
सदियों बाद भी अडिग खड़ा सोमनाथ मंदिर
भारत के स्वाभिमान का शाश्वत प्रतीक है।
🙏 जय सोमनाथ!#SomnathTemple #SomnathSwabhimanParv pic.twitter.com/Jx8V5GwMoM
अगर सोमनाथ की कहानी देखें, तो यह दुनिया के इतिहास में शायद इकलौती ऐसी जगह है जिसे बार-बार तोड़ा गया, लेकिन हर बार फिर से बनाया गया. के.एम. मुंशी ने अपनी मशहूर किताब 'सोमनाथ: द श्राइन इटरनल' में लिखा है कि सोमनाथ को सृष्टि जितना ही प्राचीन माना जाता है. मुंशी सिर्फ लेखक ही नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी और आजाद भारत में नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे. उनकी किताब में दर्ज घटनाएं बताती हैं कि सोमनाथ को मिटाने की हर कोशिश नाकाम रही.
1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति अलाफ खान ने फिर मंदिर को नष्ट किया और मूर्ति के टुकड़े दिल्ली ले गया. कुछ सालों बाद हिंदू शासकों ने इसे फिर से खड़ा किया. 1394 में गुजरात के गवर्नर मुजफ्फर खान ने मंदिर को तोड़ा. 1459 में महमूद बेगड़ा ने भी सोमनाथ को अपवित्र किया. इसके बावजूद मंदिर किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा.
भारत माता के करोड़ों संतानों का अजय स्वाभिमान है, श्री सोमनाथ महादेव की पावन धरती।
— C R Paatil (@CRPaatil) January 7, 2026
वर्ष 1026 से सोमनाथ का विध्वंस करने की कुटिल कोशिशें बार-बार हुईं। लेकिन यह विध्वंस की नहीं, 1000 साल की अटूट आस्था की गाथा है। अनगिनत सनातनियों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
उसी सनातनी शौर्य के 1000… pic.twitter.com/Wn73cmyn7k
यह रक्त, बलिदान और आस्था से भरी कहानी दिखाती है कि कैसे सोमनाथ भारत के पुनर्जन्म का प्रतीक बन गया. जिन आक्रांताओं ने इसे खत्म करना चाहा, वे इतिहास की किताबों में नाम भर बनकर रह गए, लेकिन सोमनाथ आज भी पूरे गौरव के साथ खड़ा है.
अल-बरूनी ने यह भी बताया कि सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं था, बल्कि एक बड़ा सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र था. यहां सोने के कलश, रत्नजड़ित मूर्तियां, अपार धन और विद्वानों, कलाकारों व व्यापारियों की मौजूदगी थी. यह मंदिर समुद्री व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में भी जाना जाता था, जो भारत को अफ्रीका और चीन से जोड़ता था.

Somnath Swabhiman Parv: सोमनाथ मंदिर
आजादी के बाद सोमनाथ का पुनर्निर्माण आधुनिक भारत की अंतरात्मा से जुड़ा सवाल बन गया. सरदार वल्लभभाई पटेल ने 13 नवंबर 1947 को सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की. उनके लिए यह कोई धार्मिक राजनीति नहीं, बल्कि सदियों की अपमानजनक गुलामी से उबरने का प्रतीक था. के.एम. मुंशी ने इसमें उनका पूरा साथ दिया और कहा कि इतने भव्य स्तर का मंदिर भारत में करीब 800 साल बाद बन रहा है.
आज सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवित संदेश है. यह बताता है कि जिन सभ्यताओं की जड़ें आस्था और आत्मविश्वास में होती हैं, उन्हें तलवार और तोप से खत्म नहीं किया जा सकता. हर गिरावट के बाद उठ खड़े होने की जो ताकत भारत ने दिखाई है, वही सोमनाथ की असली पहचान है. यही वजह है कि सोमनाथ सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आज और आने वाले कल की भी प्रेरणा है.
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