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MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला की शादी को बताया अवैध, इस कानून का दिया हवाला

MP High Court News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुस्लिम लॉ का हवाला देते हुए एक मुस्लिम युवक और हिंदू युवती की शादी की याचिका खारिज कर दी है.

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MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला की शादी को बताया अवैध, इस कानून का दिया हवाला
फाइल फोटो

Hindu Muslim Marriage Declared Illegal: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अनुच्छेद 226 के तहत दायर एक याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें विशेष विवाह अधिनियम के तहत अंतरधार्मिक विवाह करने की इच्छा रखने वाले एक जोड़े के लिए पुलिस सुरक्षा और अन्य राहतें मांगी गई थी. कोर्ट ने इस बड़े फैसले (MP High Court Verdict) को सुनाते समय मुस्लिम कानून का हवाला दिया. जस्टिस जी एस अहलूवालिया (Justice G S Ahluwalia) की सिंगल बेंच ने इस फैसले में कहा कि मुस्लिम कानून (Muslim Law) के अनुसार, एक मुस्लिम पुरुष की शादी "मूर्तिपूजक या अग्निपूजक'' महिला से वैध नहीं है. 

जस्टिस अहलूवालिया ने कहा, "मुस्लिम कानून के अनुसार, किसी मुस्लिम लड़के की शादी किसी मूर्तिपूजक या अग्निपूजक लड़की से वैध विवाह नहीं है. यदि शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड भी है तो भी वह वैध नहीं रहेगी और यह एक गैरकानूनी विवाह होगा."

याचिकाकर्ताओं ने की थी सुरक्षा की मांग

बता दें कि याचिकाकर्ता ने परिवार के सदस्यों से मिल रही धमकियों का हवाला देते हुए अदालत का रुख किया था. मध्य प्रदेश के अनूपपुर में रहने वाली सारिका सेन और सफी खान ने अदालत से अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने और विवाह पंजीकरण अधिकारी के समक्ष उनकी सुरक्षित उपस्थिति सुनिश्चित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था. याचिकाकर्ता सारिका सेन (पत्नी) ने परिवार के सदस्यों द्वारा साफी खान (पति) के खिलाफ अपहरण सहित किसी भी आपराधिक आरोपों से सुरक्षा की भी मांग की थी.

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे एक दूसरे से प्यार करते हैं और पहले ही विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह अधिकारी से संपर्क कर चुके हैं. हालांकि, लड़की के परिवार की आपत्तियों के कारण वे अपना विवाह पंजीकृत नहीं करवा सके. वकील ने सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला दिया, जिसमें इसी तरह के मामलों में पुलिस सुरक्षा प्रदान की गई थी.

कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से किया इनकार

जबलपुर हाईकोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाते हुए कहा, "याचिकाकर्ताओं का यह मामला नहीं है कि अगर शादी नहीं हुई तो भी वे 'लिव-इन' में रहने के इच्छुक हैं. याचिकाकर्ताओं का यह भी मामला नहीं है कि याचिकाकर्ता नंबर-एक मुस्लिम धर्म स्वीकार कर ले. इन परिस्थितियों में इस अदालत का मानना है कि हस्तक्षेप करने के लिए कोई मामला नहीं बनता है." इस फैसले के साथ ही अदालत ने मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की रहने वाली सारिका सेन (23) और सफी खान (23) की याचिकाओं को खारिज कर दिया.

याचिकाकर्ताओं की ये थी मांगें

बता दें कि याचिका में कई तरह की मांगें की गई थी. जिसमें विवाह पंजीकरण अधिकारी के समक्ष रजिस्ट्रेशन के लिए एक गार्ड, याचिकाकर्ता नंबर 1 के परिवार से सुरक्षा और याचिकाकर्ता नंबर 2 के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज नहीं करने की मांग शामिल थी. दोनों याचिकाकर्ता विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करना चाहते थे. जिसके लिए दोनों याची सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) मामले का हवाला देते हुए समाज और परिवार से पुलिस सुरक्षा की मांग की थी.

याचिका का विरोध करते हुए लड़की के परिवार ने आरोप लगाया कि वह परिवार के आभूषण और नकदी के साथ भाग गई है और अंतरधार्मिक विवाह से उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा. अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना. जिसमें एक मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला के बीच विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह की वैधता को लेकर पर्सनल लॉ पर बहस हुई. याचिकाकर्ताओं का ये भी कहना था कि सारिक हिंदू बनी रहेंगी और सफी खान मुस्लिम ही रहेंगे और एक-दूसरे के धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करेंगे.

कोर्ट ने इस केस का दिया हवाला

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट में मोहम्मद सलीम बनाम शमसुद्दीन और अन्य बातों का हवाला देते हुए कहा कि एक मुस्लिम पुरुष और एक मूर्ति पूजा करने वाली महिला के बीच विवाह अनियमित (फासिद) माना जाता है, लेकिन शून्य नहीं इसने मुस्लिम कानून में वैध (सहीह), शून्य (बातिल), और अनियमित (फासिद) विवाहों के बीच के अंतर को उजागर किया. ऐसे में जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया का फैसला था कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत भी, व्यक्तिगत कानून के अनुसार अंतरधार्मिक विवाह अनियमित बना रहेगा. अदालत ने दोनों को पुलिस सुरक्षा या अन्य राहत देने के लिए कोई आधार नहीं पाया और याचिका को खारिज कर दिया.

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