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खुर्जा से ग्वालियर मेले तक: 100 साल पुरानी खजला मिठाई की वो कहानी, जो आज भी लोगों का दिल जीत रही

Gwalior vyapar Mela Khajla Sweet: 120 साल पुराने ऐतिहासिक ग्वालियर व्यापार मेले में मिलने वाली पारंपरिक मिठाई ‘खजला’ आज भी सैलानियों की पहली पसंद बनी हुई है. यूपी के खुर्जा से शुरू हुई इसकी कहानी अब देशभर के मेलों तक फैल चुकी है. 

खुर्जा से ग्वालियर मेले तक: 100 साल पुरानी खजला मिठाई की वो कहानी, जो आज भी लोगों का दिल जीत रही

Gwalior vyapar Mela Khajla Sweet: मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 2025 से ऐतिहासिक श्रीमंत माधवराव सिंधिया ग्वालियर व्यापार मेला चल रहा है, जो 25 फरवरी 2026 तक आयोजित होगा. करीब 108 एकड़ में फैला यह मेला देश के सबसे पुराने और व्यवस्थित मेलों में गिना जाता है. इसकी शुरुआत ग्वालियर रियासत के तत्कालीन सिंधिया महाराज ने वर्ष 1905 में की थी. इस लिहाज से यह मेला अब 120 वर्ष पुराना हो चुका है. इस वर्ष मेले का उद्घाटन केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने किया था.

ग्वालियर का यह मेला सैकड़ों करोड़ रुपये के टर्नओवर वाला माना जाता है, जहां सुई से लेकर लग्जरी कारों तक की बिक्री होती है. लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी पारंपरिक मिठाई है, जिसके बिना सैलानियों का मेला भ्रमण अधूरा माना जाता है. यह मिठाई है खाजा, जिसे आज खजला के नाम से जाना जाता है.  

Gwalior vyapar Mela Khajla Sweet

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ग्वालियर मेले की मिठाई बन चुका है खजला

ग्वालियर मेले में पिछले करीब 60 वर्षों से खजला बेच रहे एक दुकानदार ने बताया कि यह मिठाई अब केवल स्वाद नहीं, बल्कि मेले की पहचान बन चुकी है. आधुनिक दौर में भले ही चीनी, थाई और विदेशी फास्ट फूड लोगों की पसंद बनते जा रहे हों, लेकिन खजला और पापड़ जैसे पारंपरिक व्यंजनों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है.

मेले में सजी-धजी दुकानों पर बैठकर सैलानी बड़े चाव से खजला और पापड़ का स्वाद लेते हैं. इसकी ताजगी, भीनी-भीनी खुशबू और कुरकुरापन लोगों को बरबस अपनी ओर खींच लेता है. ऐतिहासिक ग्वालियर व्यापार मेले में खजले की दुकानें शुरू से ही आकर्षण का केंद्र रही हैं और इस बार भी कई प्रकार के स्वादिष्ट खजले और पापड़ की दुकानें सजी हुई हैं. 

Gwalior vyapar Mela Khajla Sweet

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60 साल से पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा कारोबार

मेले के झूला सेक्टर में ‘अंजलि खजला-पापड़' नाम से दुकान लगाए बैठे संचालक बताते हैं कि उनका परिवार करीब 60 वर्षों से ग्वालियर मेले में दुकान लगाता आ रहा है. पहले प्रमोद कुमार यादव खजला बेचते थे, अब उनके बेटे अजय कुमार यादव और सूरज कुमार यादव इस पुस्तैनी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.

यादव परिवार सहित लगभग 50 कर्मचारी इस दुकान पर खजला, पापड़ और चाट का कारोबार संभालते हैं. यहां रबड़ी खजला, मलाई खजला, खोए का खजला, दूध का खजला, कम मीठा और नमकीन खजला खूब पसंद किया जाता है. इसके अलावा पापड़, छोले-भटूरे और आलू चाट भी दही, चटनी और मसालों के साथ परोसी जाती है.

50 से 60 लाख रुपये तक की बिक्री

ग्वालियर मेले के दुकानदार बताते हैं कि सैलानी केवल दुकान पर बैठकर ही खजला नहीं खाते, बल्कि अपने रिश्तेदारों और स्वजनों के लिए पैक कराकर भी ले जाते हैं, क्योंकि खजला आम मिठाई की दुकानों पर नहीं मिलता. यह मिठाई मुख्य रूप से मेलों में ही बिकती है.  एक बड़े दुकानदार के अनुसार, ग्वालियर मेले में उनकी दुकान से औसतन 50 से 60 लाख रुपये तक की बिक्री हो जाती है. 

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खाजा से खजला बनने तक का सफर

ग्‍वाल‍ियर व्‍यापार मेले की इस सबसे फेमस म‍िठाई को पहले खाजा कहा जाता था, लेकिन समय के साथ इसका नाम खजला हो गया. इसे ‘मेले की मिठाई' भी कहा जाता है, क्योंकि यह आम स्वीट्स हाउस में उपलब्ध नहीं होती. दुकानदारों के अनुसार, खजला के व्यापार का इतिहास करीब 100 वर्ष पुराना है.

किंवदंती के अनुसार, इस मिठाई की शुरुआत उत्तर प्रदेश के खुर्जा क्षेत्र से हुई. लगभग एक सदी पहले खुर्जा के पौसरा गांव निवासी बाबा लेखराज गंगा स्नान के लिए हरिद्वार गए थे. वहां गंगा किनारे एक महिला को उन्होंने यह अनोखी मिठाई बनाकर बेचते देखा. बाबा लेखराज ने उससे खजला बनाने की विधि सीखी और गांव लौटकर इसे बनाकर कंधे पर झोली टांगकर बेचने लगे.

धीरे-धीरे खजला लोगों की पसंद बन गया और इससे अच्छी आमदनी होने लगी. बाबा लेखराज से प्रेरित होकर कुंदन सिंह, लाला पन्नालाल और सुभाष चंद जैसे लोगों ने भी खुर्जा क्षेत्र में खजला का व्यवसाय शुरू किया. 

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UP से निकलकर देशभर में फैला कारोबार

शुरुआत में खजला का कारोबार उत्तर प्रदेश के खुर्जा, बुलंदशहर, अलीगढ़ और गोरखपुर के मेलों तक सीमित था. बाद में यह राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और बंगाल सहित देश के कई राज्यों में फैल गया. आज देशभर के बड़े मेलों में खजला मिठाई की दुकानें देखने को मिलती हैं.

खजला कैसे बनता है? 

खजला बेचने वाले इसकी विधि को गोपनीय रखते हैं, लेकिन उपयोग होने वाली सामग्री के बारे में बताते हैं. खजला बनाने में मैदा, चीनी, घी, रिफाइंड, दूध और खोवा का इस्तेमाल किया जाता है. मुख्य रूप से पांच प्रकार के खजले बनाए जाते हैं, जिनमें खोवा खजला, दूध खजला, सिंगल खजला, डबल खजला और नमकीन खजला शामिल हैं. इनमें सिंगल और नमकीन खजला की बिक्री सबसे अधिक होती है. खास बात यह है कि ये लंबे समय तक खराब नहीं होते.

मेलों में ही गुजरता है साल

खजला व्यापार से जुड़े लोग बताते हैं कि इसमें 500 पक्की दुकानें हैं. 250 चबूतरे और पचास से ज्यादा छत्री हैं. खान-पान में आए बदलावों के बावजूद खजले की मांग आज भी बनी हुई है. अब इसके साथ नमकीन पापड़ भी बेचे जा रहे हैं. दुकानदारों के अनुसार, वे केवल ग्वालियर मेला ही नहीं, बल्कि औरंगाबाद (महाराष्ट्र), देवघर बैजनाथ धाम (झारखंड), भरतपुर (राजस्थान) सहित देश के कई बड़े मेलों में दुकान लगाते हैं. इस दौरान माता-पिता से लेकर पूरा परिवार साथ चलता है और साल का अधिकांश समय मेलों में ही गुजरता है. 

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