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This Article is From Jan 07, 2026

Chhattisgarh POCSO case: नाबालिग से दुष्कर्म के दोषियों को 20-20 साल की सजा, 1.5 साल में आया फैसला 

छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले से नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म मामले में अदालत ने सख्त फैसला सुनाया है. भाटापारा की अदालत ने मुख्य आरोपी दुष्यंत टंडन और सहयोगी कुलदीप मनहरे को पॉक्सो एक्ट के तहत 20-20 साल के कठोर कारावास और अर्थदंड की सजा दी. यह फैसला सिर्फ डेढ़ साल में सुनाया गया.

Chhattisgarh POCSO case: नाबालिग से दुष्कर्म के दोषियों को 20-20 साल की सजा, 1.5 साल में आया फैसला 

Chhattisgarh POCSO case: छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले से एक बड़ा और सख्त फैसला सामने आया है. भाटापारा की अदालत ने नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म के मामले में दो आरोपियों को दोषी करार देते हुए 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. यह फैसला सिर्फ डेढ़ साल में सुनाया गया, जो न्यायिक प्रक्रिया की तेजी और गंभीर अपराधों पर अदालत के कड़े रुख को दर्शाता है.

अपहरण और दुष्कर्म का मामला

यह मामला भाटापारा ग्रामीण थाना क्षेत्र के ग्राम राजढार से जुड़ा है. पीड़िता के पिता ने 11 अगस्त 2024 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उनकी नाबालिग बेटी स्कूल जाने के लिए निकली थी, लेकिन घर वापस नहीं लौटी. काफी तलाश के बाद भी जब कोई सुराग नहीं मिला, तो अपहरण की आशंका जताई गई.

पुलिस ने की बरामदगी

जांच के दौरान पुलिस ने 2 सितंबर 2024 को पीड़िता को मुख्य आरोपी दुष्यंत टंडन के कब्जे से बरामद किया. वह सह-आरोपी कुलदीप मनहरे के ग्राम नयापारा स्थित मकान में मिली. पीड़िता ने बयान दिया कि दुष्यंत ने शादी का झांसा देकर उसे बहलाया और अपने दोस्त के घर में रखकर जबरन शारीरिक संबंध बनाए.

आरोपी का अमानवीय व्यवहार

पीड़िता ने बताया कि आरोपी उसे कमरे में बंद कर बाहर से ताला लगा देता था. हैरानी की बात यह है कि मुख्य आरोपी दुष्यंत पहले से शादीशुदा है और दो बच्चों का पिता है. इसने नाबालिग को धोखे में रखकर अपराध को अंजाम दिया.

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अदालत का कड़ा रुख

मामले की सुनवाई के दौरान सभी गवाहों के बयान और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी पाया. अपर सत्र न्यायाधीश सतीश कुमार जायसवाल ने पॉक्सो एक्ट के तहत दोनों को 20-20 साल के कठोर कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई.

समाज को मिला सख्त संदेश

यह फैसला नाबालिगों के खिलाफ अपराध करने वालों के लिए एक सख्त संदेश है. अदालत ने साफ कर दिया है कि ऐसे मामलों में किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जाएगी. यह निर्णय समाज में न्याय और सुरक्षा की उम्मीद को मजबूत करता है.

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