Bagh Print Controversy: मध्य प्रदेश की जिस कला ने दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, आज वही अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही है . मध्य प्रदेश की शान कहे जाने वाले 'बाग प्रिंट' को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसने राज्य प्रशासन को कटघरे में ला खड़ा किया है . मामला धार जिले का है, जहां एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को जो सम्मान भेंट किया गया, उसे लेकर अब कला जगत और स्थानीय कारीगरों में भारी नाराजगी है .
क्या है पूरा मामला?
बीती 23 दिसंबर को धार में एक मेडिकल कॉलेज के शिलान्यास का कार्यक्रम था . इस खास मौके पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा का स्वागत करने के लिए उन्हें बाग प्रिंट का एक स्टोल पहनाया . मंच पर तो सब कुछ ठीक रहा, लेकिन जैसे ही इस कार्यक्रम की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं, विवाद शुरू हो गया . बाग गांव के उन कारीगरों ने, जिनकी पीढ़ियां इस कला को संजो रही हैं, एक ही नजर में पहचान लिया कि मंत्री जी को पहनाया गया स्टोल हाथ से बना असली बाग प्रिंट नहीं, बल्कि बाजार में मिलने वाला सस्ता मशीन प्रिंट था .

असली और नकली का फर्क और कारीगरों का दर्द
बाग प्रिंट की खासियत इसके पारंपरिक तरीके में छिपी है . पुश्तैनी कारीगर बिलाल खत्री बताते हैं कि असली बाग प्रिंट सिर्फ प्राकृतिक रंगों और हाथ से नक्काशी किए गए लकड़ी के ब्लॉक्स से तैयार होता है . इसे बनाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि एक कपड़े को तैयार होने में लगभग एक महीना लग जाता है . वहीं, बाजार में बिकने वाले नकली प्रिंट मशीनों से केमिकल रंगों के जरिए मिनटों में तैयार कर दिए जाते हैं . असली बाग प्रिंट को इसकी शुद्धता की वजह से 'जीआई टैग' (GI Tag) भी मिला हुआ है, जो इसकी प्रमाणिकता की गारंटी है . कारीगरों का कहना है कि वीआईपी मेहमानों को इस तरह के नकली उत्पाद भेंट करना न केवल इस प्राचीन कला का अपमान है, बल्कि यह प्रदेश की साख पर भी एक बड़ा धब्बा है .

प्रशासन का रुख और जांच की मांग
इस मामले ने अब तूल पकड़ लिया है . स्थानीय कारीगरों ने इसकी शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय और जीआई टैग अथॉरिटी तक पहुंचा दी है . उनका कहना है कि जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए . हालांकि, धार के कलेक्टर प्रियांक मिश्रा इस विवाद को अलग नजरिए से देख रहे हैं . उनका तर्क है कि अब स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं भी बाग प्रिंट का काम कर रही हैं और यह जरूरी नहीं कि सारा काम एक ही परिवार करे . प्रशासन का कहना है कि यह कहना गलत होगा कि स्टोल नकली है, क्योंकि इसे बाग की ही एक संस्था से लिया गया था .
बाग प्रिंट की मेहनत और परंपरा का सवाल
असली बाग प्रिंट को तैयार करना किसी तपस्या से कम नहीं है . कपड़े को कई बार धोना, उसे खास घोल में भिगोना, फिर प्राकृतिक रंगों जैसे लोहे के बुरादे, गुड़ और फिटकरी से तैयार स्याही का इस्तेमाल कर हाथ से छपाई करना—यह एक लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया है . अंत में इसे तांबे के बर्तनों में उबाला जाता है ताकि रंग पक्के हो सकें . जब मशीनें इस महीने भर की मेहनत को चंद मिनटों में कॉपी कर लेती हैं, तो वह सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि एक संस्कृति की हार होती है . सवाल अब यह है कि क्या सरकारी आयोजनों में इस तरह की लापरवाही से हम अपनी ही विरासत को कमजोर नहीं कर रहे हैं? यह उस संस्कृति का भी मामला है जो बाजार में हार रही है. उस पहचान का भी मामला है जो कथित तौर पर नकल में घुल रही है.