Neemuch Farmer: मध्य प्रदेश के नीमच की जीरन तहसील के भंवरासा सहित आसपास के गांवों में 2 फरवरी को हुई ऐतिहासिक ओलावृष्टि ने किसानों की कमर तोड़ दी. तेज बारिश और भारी ओलों के बाद करीब 18 घंटे तक खेतों और गांवों में बर्फ जमी रही, जिससे अफीम, गेहूं, मेथी, चना, मटर, लहसुन, प्याज, धनिया, रायड़ा और कलौंजी सहित कई फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं. सबसे ज्यादा नुकसान गेहूं, मेथी और अफीम की फसल को हुआ है. ओलों और बर्फ की ठंडक से फसलें सूखने लगीं, कई खेतों में गेहूं की बालियां तो आईं लेकिन उनमें दाने बनना बंद हो गया.
फसल मंडी नहीं, मवेशियों के तबेले तक पहुंची
जो फसल कटकर मंडी तक पहुंचने वाली थी, वह अब मवेशियों के चारे में बदल गई है. किसान मजबूरी में हरी खड़ी फसल काटकर पशुओं को खिला रहे हैं. स्थिति इतनी खराब है कि आने वाले समय में भूसे की भी कमी हो सकती है, जिससे पशुपालन पर संकट गहराने की आशंका है. ओलावृष्टि किसानों के लिए परिवार में किसी जवान मौत से काम नहीं लग रही क्योंकि किसने की फसल उसे समय बर्बाद भी जब कुछ दिनों के बाद दाने बनकर वह काटने वाली थी और मंडी में पहुंचने वाली थी.
किसानों का आक्रोश, हाईवे पर चक्का जाम
ओलावृष्टि के बाद अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की बेरुखी से नाराज किसानों ने 3 फरवरी को नीमच-महू हाईवे पर भंवरसा चौराहे पर चक्का जाम कर दिया. करीब दो दर्जन गांवों के लोग प्रदर्शन में शामिल हुए. उस दोरान किसानों ने फसलों का तत्काल सर्वे, उचित मुआवजा, बीमा का लाभ देने की मांग की थी. घंटे तक चक्का जाम रहा और प्रशासनिक अधिकारियों के महान मनोबल के बाद किसानों ने प्रशासन के आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त किया था, लेकिन किसान अब भी राहत का इंतजार कर रहे हैं. खेतों का राजस्व कृषि विभाग की टीम ने सर्वे तो कर लिया पर किसानो को नही पता की नुकसान कितना दर्ज किया गया है. जमीनी हकीकत में यह है कि 80-100 प्रतिशत नुकसान हुआ है. पर कागजों में क्या दर्ज है किसी को पता नहीं.
दोहरी मार: पिछली सोयाबीन भी खराब, अब रबी फसल भी बर्बाद
किसानों के सामने संकट सिर्फ इस फसल तक सीमित नहीं है. पिछले सीजन में पीला मोज़ेक और अतिवृष्टि से सोयाबीन उत्पादन कम हुआ था. उम्मीद थी कि इस बार गेहूं, सरसों और अफीम आदि फसलो से नुकसान की भरपाई हो पायेगी, लेकिन अब यह फसल भी नष्ट हो गई. खराब हो चुकी फसल की कटाई और गर्मी के लिए खेत को तैयार करने के लिए भी अब पैसों की जरूरत किस को लग रही है.
कर्ज में डूबे किसान, बढ़ती चिंता
भंवरासा के किसान रणजीत सिंह के बताते हैं कि उनके पास 9 बीघा से कुछ अधिक खेत में सोयाबीन था, इसमें भारी नुकसान पहुंचा. 50000 रुपये खर्च किए, लेकिन आधा भी नहीं निकला. मेहनत के साथ पैसा भी गया. गेहूं और अफीम में एक से डेढ़ लाख खर्च किया है पर रबी में तो उससे भी बत्तर हालात है. बैंक और सोसायटी का करीब 3 लाख से अधिक का कर्ज हैं. अब फसल से कुछ भी नहीं मिला, उल्टा कटाई और खेत साफ करने का खर्च अलग से करना पड़ेगा. इसी तरह विक्रम सिंह चौहान सहित कई किसानों ने लाखों खर्च किए, लेकिन उत्पादन शून्य रहा.
अफीम की फसल पूरी तरह तबाह, लाइसेंस बचाने की चिंता
खेतों में अफीम के डोडों की जगह सिर्फ सूखे डंठल बचे हैं. किसानों को डर है कि औसत उत्पादन नहीं होने पर उनका लाइसेंस निरस्त हो सकता है. इसलिए कई किसानों ने अफीम उखड़वाने के लिए आवेदन दे दिया है.
ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई सच्चाई
ओलावृष्टि के 13 दिन बाद जब NDTV की टीम भंवरासा पहुंची तो किसानों की हालत बेहद खराब मिली. महिलाएं सिर पर गेहूं और मेथी काटकर घर ले जाती दिखीं, ताकि मवेशियों को खिलाया जा सके.
अफीम की खेती: कैसे मिलता है लाइसेंस और क्या होती है उत्पादन की शर्त?
भारत में अफीम की खेती पूरी तरह नियंत्रित और लाइसेंस आधारित होती है. यह लाइसेंस केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो द्वारा जारी किया जाता है.
लाइसेंस जारी होने की प्रक्रिया
- किसान को निर्धारित आवेदन प्रक्रिया पूरी करनी होती है.
- भूमि, रिकॉर्ड और पिछली उत्पादकता का सत्यापन होता है.
- केवल चयनित क्षेत्रों में ही अनुमति दी जाती है.
- नियमों और शर्तों का पालन अनिवार्य होता है.
- न्यूनतम औसत उत्पादन (Minimum Qualifying Yield).
- प्रत्येक लाइसेंसधारी किसान को निर्धारित न्यूनतम औसत उत्पादन देना होता है.
- यह औसत हर साल क्षेत्र के अनुसार तय किया जाता है.
- सामान्यतः प्रति हेक्टेयर निश्चित मात्रा में कच्ची अफीम सरकार को जमा करनी होती है
- औसत से कम उत्पादन होने पर लाइसेंस निरस्त हो सकता है
लाइसेंस निरस्त होने का खतरा
यदि किसान प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से तय औसत पूरा नहीं कर पाता तो उसका लाइसेंस रद्द हो सकता है और दोबारा लाइसेंस मिलना लगभग असंभव हो जाता है. इसी कारण किसान अफीम की खेती को “बच्चे की तरह पालने” जैसा बताते हैं.
बीमा और मुआवजे से बाहर अफीम, सबसे बड़ी समस्या
अफीम की खेती पर भारी लागत आती है, लेकिन अधिकांश मामलों में बीमा कवरेज नहीं है. वहीं मुआवजा प्रावधान सीमित या नहीं है. इस वजह से किसानों का नुकसान कई गुना बढ़ जाता है.
किसानों की मांग
- 100% नुकसान घोषित किया जाए.
- पूर्ण बीमा भुगतान
- पर्याप्त मुआवजा
- बैंक कर्ज में राहत
किसानों का कहना है कि पिछली बार मिला मुआवजा “ऊंट के मुंह में जीरा” साबित हुआ था.
सरकार से उम्मीद, लेकिन निराशा गहराती
दोनों फसलें खराब होने के बाद किसान मायूस हैं. उन्हें उम्मीद है कि सरकार राहत देगी, ताकि उनकी आर्थिक गाड़ी फिर पटरी पर आ सके. लेकिन फिलहाल भंवरसा और आसपास के गांवों में खेतों की हरियाली नहीं, बल्कि सूखे डंठल और कर्ज की चिंता दिखाई दे रही है.
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