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This Article is From Sep 29, 2025

MP के सोया किसान संकट में: MSP 5328, पर मिल रहे 3800, क्या भावांतर से बदलेंगे हालात?

देश के कुल सोयाबीन उत्पादन में लगभग आधा हिस्सा देने वाले मध्य प्रदेश को भले ही 'सोयाबीन का कटोरा' कहा जाता हो, लेकिन इस साल भारी बारिश, पीले मोजेक रोग और नकली कीटनाशकों ने इस 'पीले सोने' को किसानों के लिए 'काला सोना' बना दिया है. खेत से लेकर मंडी तक किसान दोहरी मार झेल रहा है—एक ओर फसल बर्बाद हुई है, तो दूसरी ओर मंडियों में उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से ₹1500 तक कम दाम मिल रहे हैं.

MP के सोया किसान संकट में: MSP 5328, पर मिल रहे 3800, क्या भावांतर से बदलेंगे हालात?

Soybean crisis Madhya Pradesh: देश के कुल सोयाबीन उत्पादन में लगभग आधा हिस्सा देने वाले मध्य प्रदेश को भले ही 'सोयाबीन का कटोरा' कहा जाता हो, लेकिन इस साल भारी बारिश, पीले मोजेक रोग और नकली कीटनाशकों ने इस 'पीले सोने' को किसानों के लिए 'काला सोना' बना दिया है. खेत से लेकर मंडी तक किसान दोहरी मार झेल रहा है—एक ओर फसल बर्बाद हुई है, तो दूसरी ओर मंडियों में उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से ₹1500 तक कम दाम मिल रहे हैं. इन सबके बीच सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए एक बार फिर 'भावांतर भुगतान योजना' लागू करने का ऐलान किया है...हालांकि किसानों और एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस योजना में मौजूद खामियां और भुगतान में देरी उनकी तत्काल ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाएंगी. ग्राउंड पर क्या हैं हालात जानिए अनुराग द्वारी की इस खास रिपोर्ट में

खेतों का हाल:'कर्ज़ा चुकाने के लिए ज़मीन बेचनी पड़ेगी'

राज्य के सहरवासा गांव के किसान भारी बर्बादी के बाद गहरे संकट में हैं. किसान पवन कुमार, वैजयंती, कल्याण सिंह डांगी और गंभीर सिंह डांगी ने बताया कि उन्होंने कर्ज़ा लेकर बीज बोया था, लेकिन बारिश और रोग ने फसल को पूरी तरह से 'गला' दिया है. किसान वैजयंती ने कहा कि "खाने को चाहिए, कर्ज़ा भी देना है बताओ कैसे काम होगा, कुछ नहीं है इसमें सब खाली खाली है छोटे छोटे दाने हैं." कर्ज़ और मजबूरी ऐसी है कि किसानों के सामने मज़दूरी करने या खेत बेचने जैसे कठिन रास्ते ही बचे हैं. अभी आपने किसानों की परेशानी पढ़ी और समझी लेकिन आगे बढ़ने से पहले जान लीजिए मध्यप्रदेश में सोयाबीन की खेती के क्या मायने हैं... 

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मंडी में औने-पौने दाम: MSP से ₹1500 कम मिल रहा भाव

सोयाबीन के लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹5328 प्रति क्विंटल घोषित किया है, लेकिन भोपाल की करौंद मंडी में किसानों को औसतन ₹3800 से भी कम का भाव मिल रहा है.मंडी व्यापारी संघ के अध्यक्ष हरीश ज्ञानचंदानी ने कम दाम का कारण बताते हुए कहा -अभी जो क्वॉलिटी आ रही है उसमें नमी आ रही है,क्वॉलिटी लो है. उन्होंने माना कि किसान मजबूरी में खराब माल बेच रहा है, हालांकि अच्छा माल ₹4200-₹4300 तक बिक रहा है. दूसरी तरफ किसानों की पीड़ा अलग है. किसान दीवान सिंह रघुवंशी ने बताया कि प्रति एकड़ केवल 4-5 क्विंटल सोयाबीन निकल रहा है और ₹3200 तक के रेट पर लागत भी नहीं निकल पाएगी. किसान गयाराम ने कहा कि 40-50 क्विंटल का नुकसान हुआ और 15-20 हज़ार की दवा फेंकनी पड़ी.

मंडी में जो भाव मिल रहे हैं उससे सोयाबीन के किसान बेहद मायूस हैं.

मंडी में जो भाव मिल रहे हैं उससे सोयाबीन के किसान बेहद मायूस हैं.

भावांतर योजना: राहत या शोषण?

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसानों को राहत देते हुए भावांतर भुगतान योजना फिर से लागू करने का ऐलान किया है. यह योजना MSP (₹5328) और मंडी के मॉडल भाव के बीच के अंतर की राशि किसानों के खाते में देगी. हालांकि  कांग्रेस किसान प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष केदार सिरोही सहित कई विशेषज्ञों ने इस योजना के लागू होने के समय और तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अब ग्राफिक्स के जरिए समझ लेते हैं भावांतर भुगतान योजना की वजह से पहले क्या दिक्कत आई है.  

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किसान दीवान सिंह रघुवंशी ने कहा कि किसान को अभी मज़दूरी और अगली धान की कटाई के लिए तुरंत पैसों की ज़रूरत है, ऐसे में वह भावांतर के देर से आने वाले भुगतान का इंतज़ार नहीं कर सकता, और मजबूरी में सस्ते दामों पर बेच रहा है. इन सभी सवालों के बावजूद, सरकार ने इस बार भावांतर योजना के लिए पंजीकरण 10 अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक और भुगतान की अवधि 01 नवम्बर 2025 से 31 जनवरी 2026 तक तय की है. राजस्व विभाग सत्यापन के बाद पैसा सीधे किसान के खाते में भेजेगा. यह देखना होगा कि यह भावांतर योजना, कर्ज़ और नुकसान के जाल में फंसे मध्य प्रदेश के लाखों किसानों के लिए वास्तव में राहत साबित होती है या नहीं?

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