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Lok Sabha Election: एमपी में कम वोटिंग ने बढ़ाई भाजपा की चिंता, 7-8 सीटों पर कांटे की टक्कर के है आसार

आदिवासी बहुल मालवा-निमाड़ जो कई सालों से आरएसएस-बीजेपी का सबसे बड़ा आधार माना जाता है, वहां भी दो-तीन सीटें हैं, जिन पर करीबी मुकाबला हो सकता है.

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Lok Sabha Election: एमपी में कम वोटिंग ने बढ़ाई भाजपा की चिंता, 7-8 सीटों पर कांटे की टक्कर के है आसार

मध्यप्रदेश लोकसभा चुनाव के सभी 4 चरणों के मतदान खत्म हो चुके हैं. हालांकि, इस दौरान 2019 के मुकाबले मतदान के लिए लोग घरों से कम निकले. वहीं, चुनाव में कोई लहर नहीं दिखी. ऐसे में सवाल यह उठ रहे हैं कि क्या 29 कमल खिलाने का बीजेपी का दावा सही होगा या कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने एनडीटीवी के साथ बातचीत में लगभग 40 फीसद सीटें जीतने का जो दावा किया है, वह सच साबित होगा. 

7-8 सीटों पर करीबी का है मुकाबला 

दोनों पार्टियों के दावे चाहे जो भी हो, नतीजे तो अगले महीने आएंगे. हालांकि, कई मौजूदा सांसदों के खिलाफ नाराज़गी और जातीय समीकरणों ने कम से कम 7-8 सीटों पर मुकाबला करीबी का ज़रूर बना दिया है.

तीसरा चरण था सबसे रोमांचक 

राज्य में तीसरा चरण सबसे रोमांचक था. दरअसल, इस चरण में 3 बड़े नाम मैदान में थे. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के किस्मत का फैसला भी इसी चरण में जनता ने किया. हालांकि, इस चरण में मतदान में मामूली बढ़त दर्ज की गई. इस चरण में 66.75% मतदान हुआ, जो 2019 के 66.63% से ज्यादा है. 

राजगढ़ में सबसे ज्यादा 76% मतदान

राजगढ़ में अधिकतम 76% मतदान हुआ, शिवराज की विदिशा में 75% मतदान और सिंधिया की गुना 72.5% मतदान हुआ. हालांकि, फिर भी ये 2019 के मुकाबले कम है. राजगढ़ में मुकाबला कड़ा माना जा रहा है. वहीं, गुना में सिंधिया की जीत आसान मानी जा रही है. विदिशा की लड़ाई को शिवराज रिकॉर्ड मतों से जीत के तौर पर ले रहे हैं, ताकि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर सकें.

मत प्रतिशत में आई गिरावट

राज्य में चार चरणों में कुल 66.87% मतदान हुआ, जो 2019 के 71.16% से कम है. पूरे राज्य में पुरुष और महिला दोनों के मतदान प्रतिशत में 3-4% की गिरावट आई है. कुछ जानकार कहते हैं इसके दो पहलू है. कई पारंपरिक बीजेपी के वोटरों ने अति आत्मविश्वास के कारण मतदान में भाग नहीं लिया कि मोदी लहर में उनका वोट उतनी अहमियत नहीं रखता है. वहीं, कुछ पुराने और वफादार कांग्रेस मतदाताओं ने भी मतदान में कम रुचि दिखाई होगी, जिन्हें लगता है कि पीएम मोदी की लोकप्रियता, अयोध्या राम मंदिर के मद्देनजर, मुख्य विपक्षी दल को हासिल करने के लिए कुछ भी नहीं बचा है.

7-8 सीटों पर है कड़ा मुकाबला

मध्य प्रदेश में 2003 से यानी लगभग 19 सालों से बीजेपी का राज है ( अगर 2018 में 15 महीने के कांग्रेस शासनकाल को छोड़ दें ) 2019 के चुनाव में बीजेपी 29 में 28 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी, जबकि उस दौरान राज्य की सत्ता पर कमलनाथ काबिज थे, लेकिन इस बार 3 मौजूदा विधायकों सहित कई कार्यकर्ताओं के कांग्रेस छोड़ने के बावजूद छिंदवाड़ा और मंडला सहित 7-8 सीटें ऐसी हैं, जहां मुकाबला कड़ा है.

कांग्रेस का गढ़ फतह करने के लिए भाजपा ने  अपनाई आक्रामक रणनीति

छिंदवाड़ा जो कांग्रेस और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का गढ़ है. वहां बीजेपी ने आक्रामक रणनीति अपनाई. कमलनाथ के हनुमान यानी पूर्व मंत्री दीपक सक्सेना, उनके बेटे, छिंदवाड़ा महापौर ( हालांकि चुनाव के दिन उन्होंने घर वापसी का वीडियो जारी किया) और अमरवाड़ा से मौजूदा विधायक कमलेश शाह बीजेपी में शामिल हो गए. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का रोड शो हुआ, बीजेपी का पूर्व शीर्ष नेतृत्व वहां डटा रहा. सामने कमलनाथ परिवार मोर्चा लेता रहा. कमलनाथ के अलावा उनकी पूर्व सांसद पत्नी अलका नाथ, सांसद और कांग्रेस उम्मीदवार बेटे नकुल नाथ और नकुल की पत्नी प्रिया नाथ आठों विधानसभा क्षेत्रों में आक्रामक प्रचार किया. नाथ सीनियर ने छोटी-छोटी चुनावी सभाओं में यह बताते हुए भावनात्मक कार्ड खेला कि कैसे उन्होंने अपने युवा दिनों में छिंदवाड़ा के लिए लगातार काम किया. उनके बेटे और बहू ने पूर्व मंत्री दीपक सक्सेना, मौजूदा विधायक कमलेश शाह और भगोड़ों पर जमकर निशाना साधा.

छिंदवाड़ा में कांग्रेस अब भी है मजबूत

स्थानीय लोगों का कहना है छिंदवाड़ा में जहां 45% से अधिक आबादी आदिवासी है, बीजेपी के आदिवासी नेता नत्थन शाह 2019 में नकुल नाथ से 37,000 से अधिक वोटों से हार गए थे, लेकिन शाह को दोहराने या आदिवासी उम्मीदवार को मैदान में उतारने के बजाय, बीजेपी ने अपने जिला अध्यक्ष विवेक बंटी साहू को मैदान में उतारा. साहू, जिनके बनिया (व्यापारी) समुदाय में केवल लगभग 8% मतदाता हैं. ऐसे में नाथ सीनियर के भावनात्मक कार्ड की वजह से माहौल बदल नहीं पाया.

 कुलदस्ते की राह नहीं है आसान

महाकौशल की आदिवासी आरक्षित मंडला-एसटी सीट, जो 1991 तक कांग्रेस का गढ़ थी, लेकिन उसके बाद 6 दफे केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने जीत हासिल की. वहां एक बार फिर 2014 का सीन था, जब कुलस्ते ने कांग्रेस के ओमकार सिंह मरकाम को 1.10 लाख वोटों से हराया था, लेकिन दोनों दलों के स्थानीय नेताओं का कहना था इस बार कुलस्ते के लिये लड़ाई इतनी आसान नहीं  है. 2023 में कुलस्ते निवास-एसटी से विधानसभा चुनाव हार गए थे. कांग्रेस ने बिछिया, निवास, शाहपुरा में बढ़त ली सिर्फ डिंडोरी, केवलारी, गोटेगांव और मंडला विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी सांसद आगे नजर आ रही है. ऐसे में मामला बहुत करीबी हो सकता है.

बसपा बिगाड़ सकती है खेल

महाकौशल के वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौधरी कहते हैं कि मंडला में मुकाबला बहुत कठिन है. लोगों का कहना है कि फगन सिंह कुलस्ते ने केंद्रीय मंत्री रहते हुए कुछ नहीं किया. उन्होंने अपने परिवार को ही आगे बढ़ाया. महाकौशल से लगे रीवा संभाग की सतना सीट पर भी सांसद गणेश सिंह विधायकी का चुनाव हार चुके हैं, जिन्हें कांग्रेस विधायक सिद्धार्थ कुशवाह ने ही हराया था. वहीं, लोकसभा में भी ताल ठोक रहे हैं. चूंकि मुकाबला 2 ओबीसी उम्मीदवारों का है. ऐसे में इलाके के 4 लाख ब्राह्मण वोटर निर्णायक हो सकते हैं, लेकिन यहां दिक्कत है क्योंकि बसपा ने बीजेपी के बाकी मैहार से पूर्व विधायक नारायण त्रिपाठी को टिकट दिया है, जिन्होंने ब्राह्मण वोट के अलावा बसपा के परंपरागत वोट भी हासिल किए होंगे. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि इस त्रिकोणीय लड़ाई में क्या उन्होंने बीजेपी सांसद की चुनावी संभावनाओं को अधिक नुकसान पहुंचाया है या कांग्रेस को झटका दिया है.

यहां हो रहा है ऱझ का भारी विरोध

सतना से वरिष्ठ पत्रकार ज्ञान शुक्ल कहते हैं कि यहां एक दिलचस्प कहानी यह भी है कि कांग्रेस के विधायक एवं सांसद प्रत्याशी सिद्धार्थ कुशवाहा लगातार तीन चुनाव लड़े. नगरीय निकाय में महापौर का जिसमें वो 25 हजार वोटों से हारे. फिर महज चंद माह बाद विधायकी लड़े जिसमें चार बारके सांसद और भाजपा से विधायक पद के प्रत्याशी गणेश सिंह को उन्होंने लगभग 4 हजार वोटों से हरा दिया, कुल मिलाकर यहां सांसद गणेश सिंह भारी व्यक्तिगत विरोध और भितरघात के कारण ही विधानसभा हारे. अब सांसद के लिये भी समीकरण आसान नहीं दिख रहा है यहां पार्टी  का नहीं, बल्कि प्रत्याशी का व्यक्तिगत विरोध ही अहम फैक्टर साबित हो सकता है.

यहां भाजपा की जीत नहीं है आसान

वैसे बीजेपी की सबसे बड़ी चिंता ग्वालियर-चंबल का इलाका हो सकता है, क्योंकि 2023 विधानसभा चुनावों में भी यहां बीजेपी को सिर्फ 18 सीटें मिलीं, जो कांग्रेस के 16 से सिर्फ 2 ज्यादा थी. यहां केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया तो जीत की दहलीज पर दिख रहे हैं, लेकिन बाकी की 3 सीटों पर ये विश्लेषण शायद उतना सटीक ना बैठे.

इन सीटों पर कांग्रेस पेश कर रही है चुनौती

इलाके के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सिंधिया ने गुना में लड़ाई के दौरान बहुत मेहनत की है, लेकिन पड़ोसी ग्वालियर, मुरैना और भिंड-एससी सीटों पर, भाजपा को न केवल कांग्रेस से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि अपने खुद के कैडर की नाराजगी का भी भारी पड़ सकती है. ये कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. अगर पार्टी अपने तीन गढ़ों (मुरैना, ग्वालियर और भिंड-एससी) में से एक, दो या सबसे खराब स्थिति में तीनों ही हार जाए. मुरैना में, तोमर के वफादार शिवमंगल तोमर (जो लगातार 2 राज्य चुनाव हार गए) को पुराने बीजेपी सदस्य पूर्व विधायक सत्यपाल सिकरवार के खिलाफ खड़ा किया गया है और भिंड-एससी सीट पर मौजूदा सांसद संध्या राय, जो पहले से ही पार्टी में विरोधियों के निशाने पर रही हैं. उन्हें मौजूदा विधायक फूल सिंह बरैया से बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, हालांकि, मुरैना और भिंड-एससी सीट पर बसपा उम्मीदवारों की उपस्थिति वास्तव में करीबी मुकाबले की स्थिति में निर्णायक भूमिका निभा सकती है.

ग्वालियर चंबल में चुनौती दे रही है कांग्रेस

ग्वालियर चंबल के वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली कहते हैं - ग्वालियर चम्बल में लोकसभा चुनाव भी विधानसभा की तर्ज पर होने से भाजपा चिंतित दिखी. 2023 के चुनाव में जब पूरे प्रदेश में कांग्रेस की हालत बदतर रही, तब भी इन अंचल में कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी. 34 में से 16 सीटें जीतीं. वजह चुनाव प्रत्याशी और जातियों पर केंद्रित होना था.  लोकसभा में भी कांग्रेस ने चार सीट में से एक ब्राह्मण, एक ठाकुर, एक पिछड़ा और एक दलित को टिकट दिया. इसका असर भी दिखा भाजपा का कट्टर परंपरागत ब्राह्मण वोट इस बार जाति के चक्कर में कांग्रेस के पक्ष में एकजुट दिखा, तो इसका लाभ मुरैना में भी मिलता दिखा, मुरैना में हालांकि अंतिम समय मे कांग्रेस के दिग्गज नेता राम निवास रावत के भाजपा में जाने से भाजपा को थोड़ी बढ़त मिली लेकिन वहां काँग्रेस ने ठाकुर सत्यपाल सिकरवार  को ही केंडिडेट बनाकर चुनाव को तोमर बनाम आल करने की कोशिश की  एक बात और कि सिकरवार खुद और उनके पिता गजराज सिंह दोनो भाजपा से विधायक रहे है. गजराज सिंह भाजपा के जिला अध्यक्ष भी रहे हैं. इसलिए इस परिवार की भाजपा के कार्यकर्ताओं में भी गहरी पैठ है. इसके चलते बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पर्दे के पीछे से उनका काम करते दिखे.

इन सीटों पर भी है कांटे की टक्कर 

 दो-तीन अन्य सीटों पर कांटे की टक्कर वाली सीटों में से राजगढ़ भी है जहां मौजूदा सांसद रोडमल नागर ने 2019 में 4.35 लाख वोटों से जीती थी, वह अब बहुत दिलचस्प हो गई है, क्योंकि क्षेत्र के सबसे बड़े कांग्रेस नेता और पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र में लौट आए हैं (जो उन्होंने 1984 और 1991 में जीता था, लेकिन 33 साल बाद उम्मीदवार के रूप में 1989 में हार गए ) शिवराज सिंह चौहान के वफादार रोडमल नागर को "नॉन-परफॉर्मेंस" के लिए मतदाताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है, पूरे अभियान के दौरान बीजेपी और खुद नागर ये दिखाते रहे कि लड़ाई दिग्विजय सिंह और उनके बीच नहीं है बल्कि मोदी बनाम कांग्रेस है, हिंदुत्व के मुद्दे पर लड़ाई का ध्रुवीकरण करने की पूरी कोशिश हुई ये तक कहा गया कि ये दिग्विजय सिंह और भगवान राम के बीच की लड़ाई है. लेकिन दिग्विजय ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा था कि भगवान राम अगर बीजेपी के उम्मीदवार होते तो मैं उनका प्रस्तावक होता न कि चुनावी प्रतिद्वंद्वी. ये मेरे और बीजेपी सांसद के बीच की लड़ाई है. हालांकि, ये भी सही है कि 4.35 लाख की पिछली लीड को पाटना आसान नहीं है, राघौगढ़ और निकटवर्ती चाचौड़ा में अन्य छह विधानसभा क्षेत्रों की तुलना में कम मतदान भी उनकी राह में रोड़ा हो सकता है.

मालवा-निमाड़ में भी बाजपा खस्ताहाल

आदिवासी बहुल मालवा-निमाड़ जो कई सालों से आरएसएस-बीजेपी का सबसे बड़ा आधार माना जाता है, वहां भी दो-तीन सीटें हैं, जिन पर करीबी मुकाबला हो सकता है. कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले रतलाम-एसटी सीट पर (जिसे बीजेपी केवल दो बार 2014 और 2019 में जीत पाई है ), पांच बार के कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया का मुकाबला राज्य में कैबिनेट मंत्री नागर सिंह चौहान की पत्नी अनीता नागर सिंह चौहान से है इस लड़ाई को भील बनाम भिलाला जनजाति की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है.  हालांकि रतलाम-एसटी में अलीराजपुर, पेटलावद, थांदला, रतलाम शहर और रतलाम-ग्रामीण क्षेत्रों में बीजेपी का मजबूत आधार सैलाना, जोबट और झाबुआ विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के लाभ को बेअसर कर सकता है, इसके अलावा, भारतीय आदिवासी पार्टी के उम्मीदवार की मौजूदगी भी कांग्रेस के चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है.

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यहां बी कांग्रेस की स्थिति है मजबूत

पड़ोसी खरगोन एसटी सीट पर, पहली बार कांग्रेस उम्मीदवार पोरलाल खरते ने पहली बार में ही मौजूदा सांसद गजेंद्र पटेल के खिलाफ बहुत मजबूत चुनाव लड़ा, लेकिन स्थानीय लोगों की माने तो कई कांग्रेस नेता पूरी मजबूती से उनके साथ खड़े नहीं रहे जिससे बीजेपी की स्थिति ठीक बन गई. धार-एसटी सीट जहां भोजशाला-कमल मौला मस्जिद का मामला ऐन चुनावों से पहले उछला, कांग्रेस उम्मीदवार राधेश्याम मुवेल को नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के वफादार के रूप में देखा जा रहा है, ऐसे में कांग्रेस के ही दूसरे स्थानीय नेता पूरी तरीके से अपने सहयोगी के लिये लड़ने नहीं उतरे. कांग्रेस मालवा-निमाड़ की केवल तीन सीटों पर लड़ाई में है, लेकिन नतीजा अगर पक्ष में नहीं आया तो एक वजह कांग्रेस की अपनी खींचतान भी होगी.

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