Indore Dirty Water Death: 70 साल की उर्मिला यादव बिल्कुल स्वस्थ थीं. न चलने में तकलीफ थी, न सांस लेने में कोई दिक्कत. उनके जीवन में खुशियों ने 15 साल के लंबे इंतजार के बाद दस्तक दी थी, जब उनके बेटे संजय के घर नन्हा मेहमान आया. उर्मिला पहली बार दादी बनी थीं और उनके दिन पोते की किलकारियों के बीच बीत रहे थे. लेकिन किसे पता था कि जिस इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है, उसी शहर का पानी उर्मिला के लिए काल बन जाएगा. 15 साल की मन्नत के बाद मिला पोता अभी ठीक से दादी की गोद पहचानना शुरू ही कर पाया था कि सिस्टम की लापरवाही ने इस रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

इंदौर के भागीरथपुरा की रहने वाली उर्मिला देवी अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनका परिवार में गुस्सा इस बात का भी है कि कोई जनप्रतिनिधि उनसे मिलने नहीं आया.
प्यास बुझाने वाले पानी में घुला था मौत का संक्रमण
परिवार का कहना है कि शुक्रवार की शाम तक सब कुछ सामान्य था, लेकिन अचानक उर्मिला को उल्टी और दस्त शुरू हुए. जिसके बाद शनिवार सुबह पेशे से दर्जी बेटा संजय उन्हें लेकर क्लॉथ मार्केट अस्पताल भागा. एक दिन आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच जंग चली और रविवार सुबह 11 बजे उर्मिला की सांसें थम गईं. डॉक्टरों के मुताबिक संक्रमण इतना तेज था कि शरीर ने जवाब दे दिया.
अभी वो पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ है.
इलाज के लिए कर्ज और सिस्टम की बेरुखी
संजय यादव की आंखों में अपनी मां को खोने का गम तो है ही, साथ ही व्यवस्था के प्रति गहरा आक्रोश भी है. उन्होंने बताया कि ड्रेनेज और पाइपलाइन की खुदाई के कारण हफ्तों से गंदा पानी आ रहा था, जिसकी शिकायत भी की गई लेकिन किसी ने नहीं सुनी. निजी अस्पताल में मां को बचाने के लिए संजय ने 22 घंटों में 40 हजार रुपये भर दिए. यह रकम उन्होंने कर्ज लेकर जुटाई थी, लेकिन इतना खर्च करने के बाद भी वे अपनी मां को बचा नहीं सके. संजय कहते हैं, "मेरे पास सारे बिल और सबूत हैं, पर मेरी मां वापस नहीं आएगी."
शोक संतप्त परिवार और नेताओं का 'अहंकार'
बेटे का दर्द तब और बढ़ जाता है जब वह शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता का जिक्र करता है. मां की अंतिम क्रिया में जुटे संजय बताते हैं कि अब तक सरकार का कोई नुमाइंदा उनके घर नहीं पहुंचा. उल्टे नेता उन्हें चौक पर बुला रहे हैं. संजय सवाल पूछते हैं, "मैंने अभी मां को मुखाग्नि दी है, तीन दिन तक तो मैं कहीं जा नहीं सकता. क्या उन्हें यहां नहीं आना चाहिए था? क्या सरकार को यह नहीं दिखता कि किसी के घर में क्या टूटा है?" आज घर के कोने में बच्चे का झूला तो है, लेकिन उसमें झुलाने वाली दादी अब इस दुनिया में नहीं हैं. यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर करारा तमाचा है जो स्वच्छता के दावों के पीछे अपनी नाकामियों को छुपा रहा है.
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