
MP News: मध्य प्रदेश के देवास जिले के बागली अनुभाग के आदिवासी समाज में गणगौर पर्व जोर शोर से बनाया जाता है. विवाहिता स्त्री अपने सुखमय दाम्पत्य जीवन व पति के लिए व्रत-पूजा करती हैं. जबकि कुंआरी लड़कियां अच्छे वर के लिए गणगौर माता की स्थापना पूजा व्रत करती हैं.
इसके लिए गेहूं के ज्वार छोटे-छोटे कुंडों में लगाया जाता है लेकिन पारसपीपली गांव में समापन के दिन एक अनोखी गुड़ तोड़ने की परम्परा के साथ उनको ठंडा किया जाता है, जो बड़ा ही रोचक होकर आसपास के गांवों के लोगों बड़ी संख्या में इसे देखने आते हैं.
गुड़ तोड़ने की परंपरा
गांव के आदिवासी समाज में गुड़ तोड़ने की परंपरा है जिसमें एक ऊंची लकड़ी सिरे पर गुड़ नारियल की पोटली बांधते हैं. गावं के पुरुष झुंड में ढोल धमाकों के साथ टोली में आते हैं और लकड़ी के उपर गुड़ को निकालते हैं.
क्या कहते हैं पुरुष?
तैयार महिलाएं हाथ में इमली बेशरम की लकड़ी लेकर पुरषों को गुड़ निकालने से रोकती हैं और लकड़ियों से उनकी पीटाई करती हैं. पुरुष गैडी (टी टाइप की लकड़ी से बचाव का ढाल) अपना व साथियों का बचाव करते हैं. यह प्रक्रिया 7 बार होती है. महिलाओं द्वारा मारने से पुरषों को चोट भी आती है लेकिन वह बुरा नहीं मानते. पुरषों का मानना है कि पत्नि घर की लक्ष्मी होती है. वर्षभर पुरुष उन पर हुकुम चलता है. गुस्सा होता है. भला-बुरा कहता है. इसलिए एक दिन महिलाओ का होता है. वह हमें पीट कर वर्षभर की भूल को माफ करती हैं.
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