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बदलाव की कहानी; कलंक से कमाल तक, सूखा करार की बेटियों ने बदनामी की बेड़ियां तोड़कर लिख दी नई इबारत

Success story: कभी ‘सूखा करार टप्पा’ को गलत कारणों से जाना जाता था. आज वही गांव ‘खिलाड़ियों का गांव’ कहलाने लगा है. युवा खेल को करियर बना रहे हैं, बेटियां स्कूल, कॉलेज और प्रशिक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए आधुनिक समाज की गति से कदम मिला रही हैं. गांव की एक बेटी की आवाज़ पूरी पीढ़ी की आकांक्षा बन चुकी है. “हम अपने गांव की पहचान बदलना चाहते हैं… पीढ़ियों का कलंक मिटाना चाहते हैं.”

बदलाव की कहानी; कलंक से कमाल तक, सूखा करार की बेटियों ने बदनामी की बेड़ियां तोड़कर लिख दी नई इबारत
Success Story: बदलाव की कहानी; कलंक से कमाल तक, सूखा करार की बेटियों ने बदनामी की बेड़ियां तोड़कर लिख दी नई इबारत

Success story: मध्य प्रदेश के रायसेन (Raisen) जिले में सांची से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित सूखा करार, कभी यह नाम तिरस्कार, सामाजिक बेड़ियों और मजबूरी का पर्याय माना जाता था. देह व्यापार की पीढ़ियों पुरानी कुप्रथा ने गांव को बदनामी में धकेल दिया था. लगभग 500 की आबादी वाले इस छोटे से गांव पर वर्षों तक लगा सामाजिक दाग मिटने का नाम नहीं ले रहा था. शासन‑प्रशासन की ओर से शिक्षा, रोजगार और जागरूकता के अनेक प्रयास हुए, मगर तस्वीर जस की तस बनी रही. लेकिन परिवर्तन कभी एक ही घटना से शुरू होता है और सूखा करार में यह बदलाव साल 2008 में पहली बार सांस लेता दिखाई दिया.

Success story: गांव की बेटियों का कमाल

Success story: गांव की बेटियों का कमाल

खेल बना बदलाव का माध्यम

2008 में खेल एवं युवा कल्याण विभाग के भानु यादव ने गांव के बच्चों को खेल से जोड़ने का प्रयास शुरू किया. पहली बार बच्चों को मैदान और जल क्रीड़ा से जोड़ा गया. इसी पहल ने गांव की दो बेटियों गंगा और जमना को आगे आने का मौका दिया. विधायक ट्रॉफी के फाइनल में दोनों ने गांव का प्रतिनिधित्व किया और कप जीतकर इतिहास रच दिया. यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, बल्कि सूखा करार के लिए नई पहचान की दस्तक थी.

Success story: इन बेटियों ने रचा इतिहास

Success story: इन बेटियों ने रचा इतिहास

पानी पर चप्पू, दिलों में हौसले

गांव में नियमित प्रशिक्षण शुरू हुआ. रोइंग, कैनोइंग, कबड्डी, खो‑खो जैसे खेल अब शौक नहीं, मिशन बन चुका था.
बच्चों का अनुशासन भी देखने लायक है, सुबह 5–6:30 बजे अभ्यास उसके बाद शाम 5–7 बजे फिर से प्रशिक्षण.

छठवीं की प्राची और आठवीं की भारती कहती हैं कि “हम पढ़ाई भी करते हैं, लेकिन खेल को पूरा समय देते हैं… क्योंकि हमें गांव का कलंक मिटाना है.”

राष्ट्रीय मंच पर चमका सूखा करार आज गांव की बेटियों ने न सिर्फ स्थानीय स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय मंच पर भी अपना लोहा मनवाया है.

  • गंगा ने गुजरात में नेशनल प्रतियोगिता जीती
  • जमना ने एट इवेंट में कांस्य पदक हासिल किया
  • निरंजना ने एट इवेंट में रजत जीता
  • जनकी ने भोपाल में हुई 34वीं नेशनल जूनियर कैनो स्प्रिंट में C4 1000 मीटर – गोल्ड, C4 500 मीटर – गोल्ड, C2 500 मीटर – पदक जीते
  • मेघा ने केरल के एलप्पी में ऑल इंडिया रोइंग चैंपियनशिप में 4 और 8 इवेंट में दो रजत पदक जीते

आज गांव की 10–12 बेटियां जिला और राज्य स्तर पर सक्रिय हैं. कई खिलाड़ी भोपाल की स्टेट वॉटर स्पोर्ट्स अकादमी में प्रशिक्षण ले रही हैं.

Success story: खेलों में बनाया नाम

Success story: खेलों में बनाया नाम

कलंक की छाया से बाहर आता गांव

कभी ‘सूखा करार टप्पा' को गलत कारणों से जाना जाता था. आज वही गांव ‘खिलाड़ियों का गांव' कहलाने लगा है. युवा खेल को करियर बना रहे हैं, बेटियां स्कूल, कॉलेज और प्रशिक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए आधुनिक समाज की गति से कदम मिला रही हैं. गांव की एक बेटी की आवाज़ पूरी पीढ़ी की आकांक्षा बन चुकी है. “हम अपने गांव की पहचान बदलना चाहते हैं… पीढ़ियों का कलंक मिटाना चाहते हैं.”

पूर्व सरपंच की प्रेरक भूमिका

गांव की मशहूर "आंटी" व पूर्व सरपंच कहती हैं कि “हमारी समाज में मैं पहली महिला थी, जिसने कई गांवों का प्रतिनिधित्व करते हुए विकास कार्य किए. समाज ने हमें कभी स्वीकार नहीं किया, ताने भी दिए, लेकिन हमने हार नहीं मानी. मेरा सपना था कि हमारी आने वाली पीढ़ी पढ़‑लिखकर इन बेड़ियों से मुक्त हो. आज गांव की फिजा बदलने लगी है.”

उम्मीद की जीत

सूखा करार की कहानी सिर्फ खेल की नहीं है, यह संघर्ष, साहस और सामाजिक बदलाव की जीवंत मिसाल है. यह साबित करती है कि यदि मौका मिले तो बदनाम अतीत भी प्रेरक भविष्य में बदला जा सकता है. आज सूखा करार, सूखा नहीं रहा, यह गांव अब हौसलों, मेडल्स और उम्मीदों से भरा हुआ है. यह कहानी हर उस बेटी के नाम है, जो सपने देखने की हिम्मत रखती है.

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