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तीन रानियां, 34 बच्चे और संडे का व्रत... जानें फुटबॉल-सिटी का शौक रखने वाले दुनिया के पहले सफेद बाघ मोहन की कहानी

White Tiger Mohan: 72 साल पहले 27 मई, 1951 को दुनिया ने सफेद बाघ को देखा था. यह जगह सीधी का पनखोर का जंगल था. इस बाघ को सबसे पहले रीवा के तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह ने देखा था.

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तीन रानियां, 34 बच्चे और संडे का व्रत... जानें फुटबॉल-सिटी का शौक रखने वाले दुनिया के पहले सफेद बाघ मोहन की कहानी

First White Tiger of the World Mohan: दुनिया में दो ही सफेद चीज प्रसिद्ध है. एक आगरा का 'ताजमहल' और दूसरा रीवा का 'सफेद बाघ'. दरअसल, दुनिया के सबसे पहले सफेद बाघ मोहन मध्य प्रदेश की शान और रीवा के लिए खास पहचान रखता था. इसकी आंखें नीली थी और खाल सफेद, जिसे दुनिया आज भी सफेद बाघ के रूप में जानती है. ये अदभुत आश्चर्यजनक और सत्य था.

आज से ठीक 72 साल पहले 27 मई, 1951 को दुनिया ने पहले सफेद बाघ को देखा था. यह जगह सीधी का पनखोर का जंगल था. दरअसल, रीवा के तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह उस समय जोधपुर के राजा अजीत सिंह के साथ सीधी के पनखोरा के जंगलों में शिकार पर थे. इस दौरान उन्हें एक अद्भुत बाघ नजर आया. एक बाघिन अपने तीन बच्चों के साथ जंगल में घूम रही है.

अकबरनामा में भी सफेद बाघ का है जिक्र 

बाघिन और दो शावक सामान्य थे, लेकिन तीसरा अद्भुत था. पूरी तरीके से सफेद, जिसे देख महाराज मार्तण्ड सिंह चकित रह गए. हालांकि महाराज ने उसे पकड़ लिया और फिर गोविंदगढ़ के किले में ले आए. किले में आने के बाद बाघ का नामकरण किया गया और इसका नाम मोहन दिया गया. आज दुनिया में जितने भी सफेद बाघ हैं सब मोहन के वंशज हैं. हालांकि मोहन 19 दिसंबर, 1969 को दुनिया को अलविदा कह दिया.

अगर इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो सफेद शेरों की पहली बार जिक्र मुगल बादशाह अकबर के समय में देखने को मिलता है. इसका जिक्र अकबरनामा में किया गया. दरअसल, अकबरनामा में जिक्र किया गया है कि साल 1561 में अकबर ने दो सफेद बाघों का शिकार किया था.

कैसे पकड़ा गया था मोहन?

बाघ मोहन को गोविंदगढ़ के किले में रखा गया और इसे बड़े ही शान शौकत से देखभाल की जा रही थी, लेकिन दो दिन बाद ही गोविंदगढ़ के किले से मोहन निकल गया और गोविंदगढ़ के पास की माद के जंगलों में पहुंच गया. जिसे शेरों के रहने के लिए सबसे बेहतर जगह मानी जाती थी. हालांकि मोहन को यहां से पकड़कर एक बार फिर गोविंदगढ़ के किले में लाया गया.

मोहन देखने में अदभुत और आश्चर्यजनक था, इसलिए एसकी वंशज को बढ़ाने का फैसला किया गया. इसके लिए मोहन के साथ अलग-अलग समय में तीन बाघिनों को रखा गया. जिसके बाद यानी सबसे पहले मोहन के तीन बच्चे जन्म लिए, लेकिन तीनों ही बार सामान्य रंग थे. जिसके बाद मोहन को बाघिन राधा के साथ रखा गया. जिसके बाद 30 अक्टूबर, 1958 को बाघिन राधा  और मोहन से चार बच्चे हुए. जिसका नाम राजा, रानी, मोहिनी, सकेशी, रखा गया. ये चारों सफेद थे.

मोहन के 21 बच्चे थे सफेद

बता दें कि 19 साल में मोहन से 34 बच्चे हुए, जिसमें 21 सफेद थे और इस तरीके से दुनिया को सफेद बाघों की वंशावली देखने को मिली. आज दुनिया में जितने भी सफेद बाघ हैं. ये सभी मोहन के वंशज हैं. दरअसल, मोहन के अलग-अलग बाघिनों से  जो 34 बच्चे हुए, उनमें से 21 पूरी तरीके से सफेद थे. इतना ही नहीं बाघिन राधा से मोहन के 14 बच्चे जन्म लिए थे और ये सभी पूरी तरह से सफेद थे, लेकिन 8 जुलाई, 1976 को विराट की मौत हो गई, जिसके बाद इस इलाके में सफेद बाघों का खत्मा हो गया. 

हालांकि सरकार ने सफेद बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए रीवा में एक पहल की शुरुआत की और दुनिया का एकमात्र व्हाइट टाइगर सफारी बनाया गया. ये सफारी रीवा से 20 किलोमीटर दूर सतना जिले के मुकुंदपुर में स्थापित किया गया.  

बता दें कि रीवा में एक बार फिर सफेद बाघ को लाने के लिए मुकुंदपुर के जंगल में व्हाइट टाइगर सफारी बनाया गया और  रघु और विंध्य को लाकर यहां रखा गया, लेकिन अब तक ये कामयाबी नहीं हासिल हो पाई. 

अदब से लिया जाता था मोहन का नाम

मोहन को बचपन में ही सीधी के जंगल से पड़कर गोविंदगढ़ किले में रखा गया था. महाराज मार्तण्ड सिंह ने उसका नाम मोहन सिंह रखा था. प्यार से लोग उन्हें मोहन कहते थे. मोहन के नाम के आगे जी लगाया जाता था. लोग उन्हें मोहन सिंह जी के नाम से पुकारते थे. इतना ही नहीं मोहन के बारे में और भी किस्से सुनने के लिए मिलते हैं. ऐसा कहा जाता है कि मांस खाने वाला बाघ मोहन रविवार को मांस नहीं खाता था. दरअसल, मोहन शुरू से ही हफ्ते में एक दिन मांस नहीं खाता था, जब मोहन के इन आदतों पर देखभाल करने वाले केयरटेकर ने ध्यान दिया तो पता चला कि ये दिन रविवार का होता है. जिसके बाद केयरटेकर ने ये जानकारी महाराजा मार्तंड सिंह को दी. जिसके बाद महाराज मार्तंड सिंह ने रविवार के दिन मोहन को 2 लीटर दूध देने का फरमान जारी किया. मोहन जब तक जिंदा रहे, रविवार को मांस नहीं खाया. हालांकि उसके जगह वो 2 लीटर दूध पिया करता था.

कैसे खत्म हुआ रीवा से सफेद बाघ?

गोविंदगढ़ किले में 6 नवंबर, 1967 को अंतिम सफेद शेर मोहन और सुकेसी से विराट का जन्म हुआ था. वहीं लगभग 8 सालों तक गोविंदगढ़ किला सफेद शेरों से गुलजार रहा. हालांकि 8 जुलाई, 1976 को आखिरी सफेद बाघ विराट की मौत हो गई, जिससे गोविंदगढ़ में सफेद बाघों का खात्मा हो गया.

जिसने देखा देखते ही रह गया

मोहन के बच्चे को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में देखा जाता है. 1960 में सकेशी को 10000 डॉलर में अमेरिका को दिया गया था. सुकेशी जब अमरीका पहुंची तब उसे रिसीव करने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति आइसेनहवार भी पहुंचे थे. इतना ही नहीं जब यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटू भारत आए थे, तो उन्हें सफेद बाघ का दिलदार कराया गया था. इस दौरान राष्ट्रपति टीटू राजधानी दिल्ली में आधे घंटे तक चुपचाप खड़े होकर सफेद बाघ को देखते ही रहे.

राजकीय सम्मान के साथ हुआ था अंतिम संस्कार 

बता दें कि मोहन की मौत 19 दिसंबर, 1969 को हुई थी. मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ हुआ था. दरअसल, मोहन का अंतिम संस्कार राज परिवार के रीति रिवाज के तहत हुआ था. इतना ही नहीं मोहन को गोविंदगढ़ किले में जिस जगह पर रखा गया था, उसी जगह पर उनका अंतिम संस्कार भी किया गया था.

फुटबॉल खेलने और सिटी सुनने का बड़ा शौकीन था मोहन

महाराज मार्तंड सिंह ने मोहन को गोविंदगढ़ के किले में रखा था और वो दोपहर के बाद का वक्त मोहन के साथ ही बिताते थे. इस दौरान महाराज मोहन के साथ फुटबॉल खेला करते थे. महाराज मार्तंड सिंह फुटबॉल मोहन की तरफ फेंकते थे और वो फुटबॉल से आकर्षित होकर उनके पास पहुंच जाता था. इतना ही नहीं जब महाराज मार्तंड सिंह सीटी बजाते थे तो वो उनकी सिटी की आवाज को पहचान जाता था. मोहन की देखभाल करने वाले पुलवाबैरिया भी इस बात को अक्सर कहा करते थे. हालांकि मोहन की मौत के बाद पुलवा बैरिया को दिल्ली के चिड़ियाघर में बुला लिया गया था. जिसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन सफेद शेरों की देखभाल में ही बिताया. पुलवा बैरिया के अनुसार, महाराज अक्सर मोहन के पास चले जाते थे. इस दौरान मोहन भी उन पर हमला नहीं करता था. 

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