मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में एक ऐसा गांव है, जहां आर्मी में जाना परंपरा बन गई. यही वजह है कि यहां हर दूसरे घर में एक सैनिक है और वर्दी पहनने का जुनून ऐसा है कि किशोर अवस्था में आते ही सेना में जाने की तैयारी शुरू हो जाती है. आज हम ऐसे ही गांव से आपको रुबरु करवा रहे हैं.
शहर से करीब 55 किलोमीटर दूर तराना तहसील में कनासिया गांव है. यहां की आबादी करीब 5 हजार है, लेकिन यहां हर दूसरे घर वर्दी धारी है. कोई सेना में है तो कोई पुलिस में. स्थिति यह है कि यहां किशोर अवस्था में आते ही खेल का मैदान या क्रिकेट नहीं दिखता, बल्कि सेना में जाने के लिए दौड़, ड्रिल और परेड की तैयारी करते लगते हैं. स्थिति यह है कि अभी यहां ऐसे रिटायर्ड सैनिक हैं, जिनमें से कोई कोर ऑफ सिग्नल्स में रहा, कोई मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री में, कोई राष्ट्रीय राइफल्स में आतंकवाद से लड़ा तो कोई लद्दाख की बर्फीली वादियों में देश की रक्षा कर रहा है.

ऐसे शुरू हुई परंपरा
इस गांव में देशसेवा की शुरुआत साल 1963 में शुरू हुई थी, जब 18 साल के शालाग्राम सेना में भर्ती हुए. वह अब 81 साल के हैं, लेकिन जोश आज भी जवानों जैसा दिखता है. शालाग्राम के दो भाई सोहन देथलिया और रणछोड़लाल भी सेना में रहे. तीनों ने 1965 और 1971 के युद्ध लड़े. बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में हिस्सा लिया और सेवा से रिटायर होकर गांव लौट आए. फिर उन्होंने देशभक्ति की असली पाठशाला शुरू की.
रिटायर्ड फौजी दे रहे ट्रेनिंग
कनासिया गांव में सैनिकों की गाथाएं सुन देशभक्ति का जज्बा बचपन से पैदा हो जाता है. यही वजह है कि यहां के किशोर खेल की जगह अग्निवीर बनने का सपना देखते है और रिटायर फौजी अपनी वर्दी की यादों को अगली पीढ़ी के हौसले में बदलने के लिए ट्रेनिंग देते है.