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जिसे मरा समझ किया अंतिम संस्कार, वो दो साल बाद लौटी जिंदा: अब पुलिस के सामने किया सरेंडर

Chhattisgarh Naxal: साल 2024 के अंतिम महीनों में जब रमली अचानक घर पहुंची तो परिवार के लोग उसे देखकर स्तब्ध रह गए. वहीं परिजनों ने रमली को दोबारा नक्सल संगठन में जाने से रोक दिया. जिसके बाद बाद उसने मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया.

जिसे मरा समझ किया अंतिम संस्कार, वो दो साल बाद लौटी जिंदा: अब पुलिस के सामने किया सरेंडर

Naxalite Ramli Podiyam: बस्तर के नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ इलाके से एक हैरान कर देने वाली कहानी सामने आई है, जिसने मुठभेड़ों के बाद पहचान प्रक्रिया और जमीनी सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 16 अप्रैल 2024 को कांकेर जिले में हुई मुठभेड़ में 29 माओवादियों के मारे जाने का दावा किया गया था. इसी मुठभेड़ में मारी गई एक महिला नक्सली को रेकावाया गांव के परिजन अपनी बेटी रमली पोड़ियाम समझ बैठे और उसका अंतिम संस्कार तक कर दिया, लेकिन करीब डेढ़ साल बाद वही रमली जिंदा घर लौट आई.

जानकारी के अनुसार, रेकावाया की रहने वाली रमली पोड़ियाम ने वर्ष 2023 में नक्सल संगठन जॉइन किया था. संगठन में उसका नाम ‘जैनी' रखा गया था और वह कांकेर एरिया में सक्रिय थी. मुठभेड़ के पांच दिन बाद जब शव गांव लाए गए, तब परिजन ने एक महिला माओवादी के शव को रमली समझ लिया. शव की हालत बेहद खराब थी और कनपटी में गोली लगने के कारण चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था. शारीरिक बनावट समान होने के चलते परिवार को पूरा विश्वास हो गया कि वह उनकी बेटी ही है. इसके बाद गांव में उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

लाशों की अदला-बदली से बढ़ा भ्रम

मुठभेड़ के बाद शवों की सही पहचान न हो पाने से यह भ्रम और गहरा गया. बताया जा रहा है कि उस दिन अबूझमाड़ में कुल पांच शव लाए गए थे, जिनमें सुनीला मड़काम, शीलो कुंजाम, पिंटू ओयाम समेत अन्य नक्सली शामिल थे. रमली की सहेली सुनीला मड़काम भी उसी मुठभेड़ में मारी गई थी, जिससे परिवार को यकीन और पक्का हो गया कि रमली भी मारी गई है. बाद में जो शव परिवार को सौंपा गया, वह दरअसल कलपा गांव की रहने वाली एक अन्य महिला माओवादी ‘जैनी' का था.

जिंदा लौटी बेटी तो चौंक गया परिवार

साल 2024 के अंतिम महीनों में जब रमली अचानक घर पहुंची तो परिवार के लोग उसे देखकर स्तब्ध रह गए. मां हिड़मे और भाई दशमो पोड़ियाम के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था.

भाई दशमो बताता है कि जिसे हमने अपनी बहन समझकर दफनाया था, वह कोई और निकली. हमारी बहन का तो जैसे पुनर्जन्म हो गया.” परिजनों ने रमली को दोबारा नक्सल संगठन में जाने से रोक दिया. इसके बाद उसने मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया.

पुलिस के सामने समर्पण, पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू

रमली पोड़ियाम ने 31 मार्च 2026 को दंतेवाड़ा पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. फिलहाल वह पुलिस लाइन में रहकर प्रशिक्षण ले रही है. अधिकारियों के अनुसार, उसका समर्पण स्वीकार कर लिया गया है और शासन द्वारा मिलने वाली प्रोत्साहन राशि भी स्वीकृत हो चुकी है, जो जल्द उसे प्रदान की जाएगी. यह घटना न केवल नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की जमीनी सच्चाई को उजागर करती है, बल्कि मुठभेड़ों के बाद शवों की पहचान प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है. बस्तर में अब भी कई ऐसे परिवार हैं, जो अपने अपनों की सही जानकारी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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