छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में एक तरफ जहां सरकार विकास की तेज रफ्तार का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. इसी बस्तर संभाग के कांकेर जिले से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जहां एक साथ 50 से ज्यादा सरपंचों ने अपने पदों से सामूहिक इस्तीफा दे दिया है. सरपंचों का गंभीर आरोप है कि उनके क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए सरकार द्वारा फंड जारी नहीं किया जा रहा है, जिससे गांवों में विकास पूरी तरह से ठप हो चुका है. सरपंचों के इस अप्रत्याशित कदम के बाद राज्य स्तर पर भारी सियासी घमासान शुरू हो गया है.
सरपंचों का दर्द: एक साल से नहीं मिला विकास कार्यों के लिए पैसा
सामूहिक इस्तीफा देने वाले सभी सरपंचों का एक ही सुर में दावा है कि पिछले एक वर्ष से ग्राम पंचायतों में किसी भी प्रकार के नए विकास कार्य आवंटित नहीं किए गए हैं. फंड के अभाव में गांवों में सड़क, पानी, और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से जुड़े जरूरी कार्य पूरी तरह ठप पड़े हुए हैं.
सरपंचों का कहना है कि वे अपनी इन समस्याओं को लेकर लगातार जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के साथ पत्राचार कर रहे थे. बार-बार गुहार लगाने और मांग करने के बावजूद प्रशासन द्वारा इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई. जनता के प्रति अपनी जवाबदेही और गांवों की बदहाली से तंग आकर आखिरकार सरपंचों को सामूहिक इस्तीफे जैसा बड़ा कदम उठाना पड़ा.
सुशासन तिहार पर कांग्रेस का करारा हमला
अंतागढ़ में सरपंचों के इस सामूहिक इस्तीफे का सियासी असर तुरंत ही सूबे की राजधानी रायपुर में देखने को मिला. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है और इसे राज्य की सत्ताधारी भाजपा सरकार के 'सुशासन तिहार' के खिलाफ एक बड़ा रिपोर्ट कार्ड करार दिया है.
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा, "छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार विकास कार्यों के लिए पैसे जारी करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है. गांवों में न तो सड़कें बन पा रही हैं और न ही अन्य जरूरी काम हो रहे हैं. पूरे प्रदेश के सरपंच आज परेशान और बेबस हैं. अंतागढ़ में तो 55 से ज्यादा सरपंचों ने एक साथ सामूहिक इस्तीफा दे दिया है. यह इस बात का सीधा और पुख्ता सबूत है कि राज्य में सरकार किस तरह काम कर रही है और जमीनी स्तर पर सुशासन की क्या स्थिति है."
सरकार के माथे पर सिकन, मंत्रियों की अलग नसीहत
बस्तर जैसे संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संभाग में इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों के सामूहिक इस्तीफे की पेशकश ने राज्य सरकार के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आनन-फानन में जिला प्रशासन को सक्रिय कर दिया गया है और अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे तत्काल नाराज सरपंचों से बातचीत कर मामले को सुलझाएं.
हालांकि, सरकार के जिम्मेदार मंत्री इस मामले में सरपंचों को अलग ही नसीहत देते नजर आ रहे हैं. छत्तीसगढ़ शासन के कैबिनेट मंत्री टंक राम वर्मा ने सरकार का बचाव करते हुए कहा, "राज्य में विकास कार्य लगातार जारी हैं और काम की कोई कमी नहीं है. सरपंचों को इस तरह से इस्तीफा नहीं देना चाहिए. जनप्रतिनिधियों को यदि कोई समस्या है, तो उन्हें अपनी बात क्षेत्रीय विधायक या सीधे पंचायत मंत्री के सामने रखनी चाहिए, न कि इस तरह सामूहिक इस्तीफा देना चाहिए."
उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार के प्राथमिकता वाले केंद्र बिंदु (बस्तर) के एक हिस्से में प्रशासन ने सच में विकास कार्यों को रोक कर रखा था? क्या वास्तव में जमीनी स्तर पर जनता की चुनी हुई ग्राम सरकारों (सरपंचों) की बात को अनसुना किया जा रहा था? और अगर सरपंचों के ये आरोप सच साबित होते हैं, तो क्या इसके लिए जिम्मेदार लापरवाह अधिकारियों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई होगी?