
फौजी हमारी रक्षा करते हैं. दिन-रात देश की सेवा में लगे रहते हैं. ऐसे में वो सभी त्योहारों से लगभग दूर ही रहते हैं. अभी रक्षाबंधन आने वाले है. इस त्योहार में बहन, अपने भाइयों की रक्षा की कामना करते हैं. बैतूल सांस्कृतिक सेवा समिति लगातार तीसरे वर्ष में रक्षाबंधन का पर्व भारत-चीन सीमा पर मना रही है. कारगिल युद्ध के बाद से संस्था द्वारा राष्ट्र रक्षा मिशन के माध्यम से देश की अंतराष्ट्रीय सीमाओं पर तैनात सैनिकों के साथ बैतूल की बेटियां रक्षाबंधन का पर्व मना रही है.
मिशन का 24वां पड़ाव इस बार देश के अरुणाचल प्रदेश स्थित भारत-चीन सीमा पर पूरा होगा. आगामी 30 एवं 31 अगस्त को जिले से 15 सदस्यीय दल द्वारा लगातार तीसरी बार भारत चीन सीमा पर रक्षाबंधन मनाया जाएगा. इसके पूर्व वर्ष 2021 में समिति के 17 सदस्यीय दल ने लेह लद्दाख, कारगिल तथा सांभा में, वर्ष 2022 में 24 सदस्यीय दल ने सिक्किम के गंगटोक एवं नाथूला में रक्षाबंधन मनाया था. इस वर्ष अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में भारत चीन, तिब्बल एवं भूटान की सीमा पर तैनात आईटीबीपी सैनिकों के साथ रक्षाबंधन मनेगा.

बैतूल सांस्कृतिक सेवा समिति की अध्यक्ष गौरी पदम ने बताया कि 26 अगस्त को इटारसी से डिब्रूगढ़ एक्सप्रेस से संस्था का दल तवांग के लिए रवाना होगा जो 29 अगस्त की शाम तक तवांग पहुंचेगा. 30 एवं 31 अगस्त को तवांग में एलएसी साथ बटालियन मुख्यालय पर भी सैनिकों के साथ रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाएगा. उन्होंने बताया कि 15 सदस्यीय दल में 5 नए सदस्यों को भी अवसर दिया गया है.
भारत और चीन के बीच करीब 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा है. यह बॉर्डर अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तरारखंड और सिक्किम से लगता है. अरुणाचल प्रदेश स्थित तवांग लगभग 17 हजार फीट की ऊंचाई पर है. तवांग का इलाका मैकमोहन लाइन के अंदर पड़ता है और यह भारत का अहम हिस्सा है. यह इलाका पश्चिम में भूटान और उत्तर में तिब्बत का बॉर्डर भी साझा करता है. तवांग मेंं विशाल बौद्ध मठ भी है.
तवांग 1962 के भारत-चीन युद्ध से भी जुड़ा हुआ है. 1962 के युद्ध में भारत को यहां काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। बाद में युद्धविराम के तहत चीन को पीछे हटना पड़ा था. मैकमोहन समझौते के बाद तवांग को भारत का हिस्सा माना गया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, महावीर चक्र से सम्मानित जसवन्त सिंह रावत ने सेला और नूरा नाम की दो स्थानीय मोनपा लड़कियों की मदद से इस पहाड़ी दर्रे पर चीनी सेना को रोक दिया था. बाद में, सेला की हत्या कर दी गई और नूरा को पकड़ लिया गया.
एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागते हुए, जसवंत सिंह ने दुश्मन को 72 घंटों तक रोके रखा जब तक कि चीनियों ने एक स्थानीय आपूर्तिकर्ता को पकड़ नहीं लिया, जिसने उन्हें बताया कि वे केवल एक लड़ाकू का सामना कर रहे थे. इसके बाद चीनियों ने जसवंत की स्थिति पर हमला कर दिया और वह शहीद हो गए. भारतीय सेना ने जसवन्त सिंह के लिए जसवन्त गढ़ युद्ध स्मारक बनवाया और दर्रे, सुरंग और झील का नाम सेला के बलिदान के लिए उसके नाम पर रखा गया. सुरंग का नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा गया है. 2 किमी पूर्व में स्थित नूरानांग जलप्रपात का नाम नूरा के नाम पर रखा गया है.