IPS Bhojram Patel Success Story: वैसे हर किसी की सफलता के पीछे एक संघर्ष की कहानी छिपी होती है. लेकिन आज हम एक ऐसे अफसर के संघर्ष की कहानी आपको बताने जा रहे हैं जो न केवल युवाओं को प्रेरणा देने वाली है बल्कि दिल को झकझोर कर रखने वाली भी है. हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के युवा आईपीएस अफसर भोजराम पटेल की. इन्होंने तमाम संघर्ष और चुनौतियों को मात देकर एक बड़ा मुकाम हासिल किया और आज छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के एसपी हैं. NDTV की सीनियर सब एडिटर अंबु शर्मा से हुई बातचीत में उन्होंने अपने संघर्षों की कहानी साझा की. आइए जानते हैं इनके बारे में...
छत्तीसगढ़ के ही रहने वाले हैं भोजराम
भोजराम पटेल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तारापुर गांव के रहने वाले हैं. उनके पिता किसान और मां गृहिणी हैं. पिता ने सिर्फ चौथी कक्षा तक की ही पढ़ाई की है. सिर्फ खेती किसानी ही आय का जरिया रहा है.लेकिन माता-पिता ने अपने बेटे भोजराम को अच्छी शिक्षा दिलाने किसी तरह की कसर नहीं छोड़ी. भोजराम की प्रारंभिक से लेकर 12वीं तक की शिक्षा गांव की ही स्कूल में हुई. फिर ग्रेजुएशन के लिए वे रायगढ़ चले गए. साल 2005 को उनका चयन शिक्षाकर्मी वर्ग दो के लिए हुआ.
इस बात ने झकझोर दिया दिल
भोजराम बताते हैं कि जब वे शिक्षाकर्मी की नौकरी में आए थे तब तक उन्हें यूपीएससी के बारे में जानकारी नहीं थी. इस नौकरी में 3820 रुपये की सैलरी थी. एक दिन किसी व्यक्ति ने शिक्षक की तुलना मजदूर से कर दी. इस बात ने दिल को झकझोर दिया. मेरे मन में विचार आया कि ऐसी कोई सी नौकरी हो जिसमें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से मिलने का मौका मिले. फिर मुझे यूपीएससी के बारे में पता चला. मैंने मां को सारी बात बताई. मां-पिता ने मेरा सपोर्ट किया. मैंने तय किया कि मुझे एक दिन बड़ा अफसर बनना है.
दिन में टीचर और रात को स्टूडेंट होता था
भोजराम पटेल बताते हैं कि उनके मन में कुछ कर गुजरने का जुनून आ गया था. 2005 से 2013 तक शिक्षाकर्मी की नौकरी की. इस समय दिन में बच्चों को पढ़ाता और रात को खुद स्टूडेंट बनकर सेल्फ स्टडी करता था. कोचिंग कर रहे कुछ दोस्तों से मदद भी ले लेता था. इस तरह से पढ़ाई की और साल 2013 को यूपीएससी की परीक्षा पास कर आईपीएस बना और मुझे होम कैडर मिला.
गरीबी भी देखी
भोजराम ने अपने बचपन में गरीबी भी देखी. एक किस्सा बताते हुए वे खुद भावुक हो जाते हैं. खेती-किसानी पर ही परिवार निर्भर था. एक बार फसलों को काफी नुकसान हुआ था. ऐसे में घर में भोजन के लाले पड़ने लगे थे. चावल कम थे, मां जानती थीं कि उनका बेटे का पेट चावल के बिना नहीं भरता. ऐसे में मां सब्जी में मिर्च ज्यादा डालती थी कि पानी ज्यादा पीना पड़े इससे पेट भर जाए. इसके अलावा कई बार हालातों से लड़कर आगे बढ़ते रहे. मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं फिर में हर तरह से सपोर्ट किया. उनके संघर्ष और सपोर्ट से ही मैंने बड़ा मुकाम हासिल किया.
इन जिलों में मिल चुकी है पोस्टिंग
भोजराम पटेल रायपुर, कांकेर, गरियाबंद, कोरिया, महासमुंद, बीजापुर के बाद अब मुंगेली में पदस्थ हैं. जहां रहे हैं वहां मजबूत पुलिसिंग के साथ ही नवाचारों के जरिए बदलाव लाने की भी कोशिश की है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए पहल, छइयां, सियान कार्यक्रम चलाकर लोगों से जुड़ने और बदलाव की कोशिश की है.
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