Woman Delivers Baby on Road: कड़ाके की ठंड, रात का सन्नाटा और खुली सड़क... इन्हीं हालात में एक महिला ने बच्चे को जन्म दिया. यह घटना किसी दूरस्थ या नक्सल प्रभावित इलाके की नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के हाई‑प्रोफाइल विदिशा जिले की है. जिस प्रदेश में डिजिटल इंडिया और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े‑बड़े दावे किए जाते हैं, वहां एक गर्भवती महिला को सड़क पर प्रसव कराना पड़ा. यह तस्वीरें और हालात सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.
रात का अंधेरा और सिस्टम की खामोशी
जानकारी के मुताबिक, रात के समय अचानक प्रसूता महिला को तेज़ दर्द उठा. परिजनों ने तत्काल 108 एंबुलेंस को फोन किया. एक बार नहीं, कई बार कॉल किया. घंटियां बजती रहीं, लेकिन मदद नहीं पहुंची. समय बीतता गया और दर्द बढ़ता चला गया. आखिरकार मजबूर होकर परिजन महिला को अस्पताल ले जाने के लिए पैदल ही निकल पड़े.
सड़क बनी डिलीवरी रूम
रास्ते में महिला की हालत और बिगड़ गई. आगे बढ़ पाना संभव नहीं था. ठंड तेज थी और रात गहरी. ऐसे में सड़क किनारे तिरपाल की आड़ बनाकर वहीं प्रसव कराना पड़ा. आसपास मौजूद लोगों ने टॉर्च की रोशनी में मदद की. खुले आसमान के नीचे, सर्द हवा के बीच, सड़क ही डिलीवरी रूम बन गई.
ठंड में घंटों सड़क पर रहे जच्चा‑बच्चा
प्रसव के बाद भी परेशानी खत्म नहीं हुई. जच्चा और नवजात दो से तीन घंटे तक सड़क पर ही पड़े रहे. ठंड से बचाने के लिए सीमित इंतजाम किए गए. गांव वालों ने जितनी मदद बन पड़ी, उतनी की, लेकिन जो काम स्वास्थ्य विभाग को करना चाहिए था, वह आम लोगों को करना पड़ा.
ग्रामीणों के कांपते हाथ, एक मां की पीड़ा
टॉर्च की हल्की रोशनी, गांव वालों के कांपते हाथ और एक मां की असहनीय पीड़ा. यह दृश्य किसी को भी झकझोर देने वाला था. हर तरफ अफरा‑तफरी थी, लेकिन सिस्टम पूरी तरह खामोश नजर आया. यह सिर्फ एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की नाकामी का आईना था.
प्रसूता महिला की आपबीती
प्रसूता महिला संजना आदिवासी ने बताया कि “रात से बहुत दर्द हो रहा था. एंबुलेंस को फोन लगाया, लेकिन कोई नहीं आया. बहुत ठंड थी. रास्ते में ही बच्चा हो गया. हम सब बहुत डर गए थे.”
अधिकारियों की सफाई
मामले पर जब स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से सवाल किए गए, तो उन्होंने यह माना कि कॉल की गई थी. हालांकि, अधिकारियों का कहना था कि कॉल करने के बाद मोबाइल डिस्चार्ज हो गया था, जिससे संपर्क नहीं हो सका. सीएमएचओ रामहित कुमार ने यही तर्क दिया, लेकिन इससे जमीनी हकीकत नहीं बदलती.