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Manikarnika Ghat: काशी की मणिकर्णिका पर मालवा की आह - जब अहिल्याबाई की विरासत से टकराया विकास

Manikarnika Ghat Demolition: 254 साल पहले, 1771 में. उसी मणिकर्णिका पर जहां आज विकास की मशीनें गुर्राईं, और बुलडोज़र की धूल में पत्थर, प्रतीक और स्मृति एक साथ ढह गए. उसी मणिकर्णिका में जहाँ मृत्यु भी मंगल मानी जाती है ... वही महाश्मशान, जहाँ चिता की आग कभी ठंडी नहीं पड़ती.

Manikarnika Ghat: काशी की मणिकर्णिका पर मालवा की आह - जब अहिल्याबाई की विरासत से टकराया विकास

Varanasi Manikarnika Ghat Demolition: काशी में सुबह जब गंगा उतरती है, तो वह घाटों से नहीं स्मृतियों से टकराकर बहती है. बनारस की बोली में कहें तो, “गंगा जी सब देखत हैं, सब जानत हैं.” वो गंगा, वो घाट जिन्होंने बहुत कुछ देखा है ... राजाओं का आना-जाना, साधुओं की राख, चिताओं की आग, और वह दिन भी देखा होगा, जब मालवा की पुण्यश्लोका महारानी जिन्हें मां अहिल्याबाई होलकर कहा जाता है उन्होंने काशी की देह पर अपने हाथों से एक घाट सँवारा था.

254 साल पहले, 1771 में. उसी मणिकर्णिका पर जहाँ आज विकास की मशीनें गुर्राईं, और बुलडोज़र की धूल में पत्थर, प्रतीक और स्मृति एक साथ ढह गए. उसी मणिकर्णिका में जहाँ मृत्यु भी मंगल मानी जाती है ... वही महाश्मशान, जहाँ चिता की आग कभी ठंडी नहीं पड़ती.

अहिल्याबाई शिव की अनन्य उपासक रहीं. होश संभालने के बाद से मृत्यु शय्या तक महादेव के लिए समर्पित. पति, ससुर और बेटे की मौत के बाद उन्होंने राज्य किसी मनुष्य को नहीं, भगवान शंकर को सौंप दिया. वे स्वयं को शासक नहीं, सेविका मानती थीं. यहीं से शुरू हुआ वह अद्भुत विधान हर राजकीय आदेश के शीर्ष पर लिखा जाता था “हुजूर शंकर”. यह परंपरा महाराजा यशवंतराव होलकर द्वितीय के समय तक चली यही कारण था कि उनके समय के सिक्कों पर शिवलिंग अंकित हुआ करता था. जितनी शिवभक्ति, उतनी ही मृदु 13 मार्च 1767 को उन्होंने रियासत की कमान संभाली, जनता की गाढ़ी कमाई की रक्षा के लिए एक-एक आने का हिसाब रखा. एक बार तो पति को भी अग्रिम वेतन देने से इंकार कर दिया. 28 वर्षों के शासन में उन्होंने देशभर में 65 मंदिर, धर्मशालाएँ, सड़कें, तालाब और नदियों के भव्य घाट बनवाए कहते हैं, शिव की इतनी अनन्य भक्त थीं कि रियासत का हर ऑर्डर “हुजूर शंकर” से शुरू होता था और इसी शिव-समर्पित जीवन की छाया काशी में सबसे गहरी पड़ती है.

1771 से 1785 के बीच, देवी अहिल्याबाई ने काशी में मणिकर्णिका घाट सहित पाँच घाटों का निर्माण कराया. उस दौर में इस घाट पर हजारों रुपये खर्च हुए जब एक-एक आने का हिसाब रखने वाली अहिल्या के लिए यह सिर्फ निर्माण नहीं, धर्म और लोककल्याण का संकल्प था.

आज उसी घाट का एक हिस्सा श्मशान घाट के “आधुनिकीकरण” प्रोजेक्ट के तहत तोड़ दिया गया है. 29,350 वर्ग मीटर क्षेत्र में हो रहे इस निर्माण में 15 से 20 मीटर गहरी पाइलिंग कराई जा रही है, क्योंकि जमीन दलदली है और बाढ़ से बचाव ज़रूरी बताया गया है. विकास की दलीलें हैं, इंजीनियरिंग की भाषा है लेकिन सवाल इतिहास का है.

इस घाट की देखरेख इंदौर स्थित खासगी देवी अहिल्याबाई होलकर चैरिटीज़ ट्रस्ट करता है जिसे 1962 में स्थापित किया गया था, ताकि होल्कर राज्य के अधीन धार्मिक दान, मंदिरों और संपत्तियों का संरक्षण हो. ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंतराव होलकर, जो अहिल्याबाई के वंशज हैं, उन्होंने एक विस्तृत बयान में कहा,

“हमें बहुत दुख और गुस्से के साथ यह बताना पड़ रहा है कि वाराणसी में ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट को तोड़ दिया गया है. पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा 1791 में पहली बार बहाल की गई यह जगह मा साहेब के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी. देशभर में उनके द्वारा बनाए या बहाल किए गए सैकड़ों स्थलों में से यह उन बहुत कम स्थलों में से एक था जहाँ उन्होंने पवित्र माँ गंगा की पूजा में अपनी छवि वाली मूर्तियाँ स्थापित की थीं.”

और आगे ट्रस्ट ने कहा, “10 जनवरी 2026 को बिना किसी उचित सूचना या चेतावनी के, कथित तौर पर नगर निगम अधिकारियों के निर्देश पर, मणिकर्णिका घाट को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया गया. यह स्थल के इतिहास या महत्व की पूरी तरह से अनदेखी करते हुए किया गया. खासगी ट्रस्ट और होल्कर परिवार इस शर्मनाक और अपमानजनक कृत्य की कड़ी निंदा करते हैं.”

“देवी अहिल्याबाई की पवित्र और ऐतिहासिक मूर्तियाँ… अब इस बेतरतीब विकास के मलबे में पड़ी हैं.”

ट्रस्ट ने कहा कि अहिल्या की विरासत और मणिकर्णिका घाट के सबसे बड़े संरक्षक के तौर पर उसने मूर्तियों को वापस पाने के लिए तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी है और जिम्मेदार एजेंसियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू की जा रही है.

ट्रस्ट ने यह भी साफ किया कि वे संवेदनशील और योजनाबद्ध विकास के खिलाफ नहीं हैं.
उन्होंने प्रधानमंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकास-विजन की तारीफ करते हुए कहा कि लेकिन “मणिकर्णिका घाट का स्थानीय स्तर पर डिमोलिशन… इस पवित्र महिला और पवित्र गंगा नदी के किनारे उनके द्वारा बहाल किए गए घाट के प्रति उचित सम्मान के साथ किया जाना चाहिए था.”

और फिर ट्रस्ट ने प्रधानमंत्री व यूपी मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि, इस लापरवाही की पूरी जांच हो, संबंधित लोग जवाबदेह ठहराए जाएँ, मूर्तियों को सुरक्षित रूप से बरामद कर ट्रस्ट को सौंपा जाए, और नए विकास में मूर्तियों को उनके सही स्थान पर बहाल करने के लिए ट्रस्ट के साथ सीधा समन्वय किया जाए.

ट्रस्ट ने कहा इन कदमों से “देवी अहिल्याबाई की आत्मा एक बार फिर पवित्र गंगा के किनारे पूजा करना जारी रख सकेगी.”

माँ अहिल्या का काशी से रिश्ता साधारण नहीं, आत्मिक था. उन्होंने यहाँ भव्य काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और गंगा तट पर कई घाट, चबूतरे और महल बनवाए जो आज होलकरवाड़ा के नाम से जाने जाते हैं. यहीं माँ गंगा की प्राचीन और दुर्लभ मूर्तियाँ भी स्थापित की गईं. ये समूची विरासत आज भी खासगी ट्रस्ट के संरक्षण में है.

काशी में जो कुछ सच है, वह अक्सर घाट की सीढ़ियों पर नहीं कानों में उतरता है. बनारस में खबर भी ऐसे ही आती है पहले धुआँ दिखता है, फिर पता चलता है कि धुआँ किसका है... चिता का, चूल्हे का या किसी की स्मृति का. और गंगा? गंगा तो यहाँ अख़बार से पहले पढ़ ली जाती हैं उनकी धारा बताती है कि शहर में आज क्या टूटा है, क्या जुड़ा है, और किसकी आह पानी में घुल गई है.

इस बार गंगा के पानी में जो भारीपन है, वह सिर्फ़ सर्दी का नहीं. मालवा की एक पुरानी सांस उसमें फँसी है. अहिल्याबाई की. हाँ वही पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर, जिनका नाम इंदौर लेते ही अपने आप ज़ुबान पर आ जाता है, जैसे बनारस में “हर हर महादेव” बिना कोशिश निकल जाता है.

पुराण-धर्मशास्त्र कहते हैं काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी है. मणिकर्णिका घाट की स्थापना अनादि काल में हुई मानी जाती है. मणिकर्णिका काशी के 84 प्रमुख घाटों में है. पुराण कहते हैं यहीं भगवान विष्णु की मणि गिरी इसलिए नाम पड़ा.
कथाएँ यह भी कहती हैं विष्णु ने यहाँ हजारों वर्षों तप किया महादेव के प्रकट होने पर चक्र पुष्कर्णी कुंड रचा स्नान करते समय उनका मूल्यवान कुंडल गिरा और कुंड कहलाया मणिकर्णिका. इसका इतिहास गंगा-अवतरण से भी पहले का माना जाता है.

मणिकर्णिका को महादेव का पसंदीदा स्थल कहा जाता है. मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती अन्नपूर्णा के रूप में मृतकों का कल्याण करती हैं. और दूसरी ओर शिव औघड़ रूप में मृत्यु को प्राप्त लोगों को कान में तारक मंत्र देकर मुक्ति का मार्ग देते हैं. इसी कारण यहाँ चिताओं की अग्नि हमेशा जलती रहती है. मान्यता है यहाँ औघड़ शिव विराजते हैं, दाह-संस्कार पर महादेव तारक मंत्र देते हैं जो यहाँ मोक्ष पाता है, फिर गर्भ में नहीं लौटता.

यह वही घाट है, जहां पारंपरिक पत्थर की सीढ़ियां, शिल्पकला, धार्मिक प्रतीक और लोकविश्वास सदियों से एक साथ सांस लेते रहे हैं. अहिल्याबाई ने यहां यात्रियों के लिए विश्राम, जल और पूजा की सुविधाएं विकसित कराईं बिना किसी शोर, बिना किसी उद्घाटन पट्टिका के.

13 मार्च 1767 को सत्ता संभालने वाली अहिल्या ने 28 वर्षों में देशभर में 65 मंदिर, धर्मशालाएँ, घाट, कुएँ, तालाब, सड़कें और बावड़ियाँ बनवायीं, अमरकंटक से बद्रीनाथ, केदारनाथ से रामेश्वरम्, अयोध्या से हरिद्वार तक.

काशी से उनका रिश्ता विशेष था. आज जिस काशी विश्वनाथ मंदिर को हम देखते हैं, उसका वर्तमान स्वरूप 1775-1780 के बीच अहिल्याबाई ने ही पुनर्निर्मित कराया. 2021 में जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन हुआ, तो उसी परिसर में अहिल्याबाई की प्रतिमा लगी और उनके योगदान को सार्वजनिक रूप से याद किया गया. और आज उसी काशी में उनके बनाए घाट का एक हिस्सा टूट रहा है.

काशी में लोग झगड़ा करते हैं तो भी गंगा की ओर देखकर करते हैं क्योंकि यहाँ हर बात का गवाह कोई न कोई घाट है. और मणिकर्णिका तो ऐसा घाट है जहाँ आग भी गवाह होती है. इंदौर के होल्कर वंशज नाराज़ हैं. समाज के लोग नाराज़ हैं. राजनीति भी गरमाई है कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इसे विरासत पर हमला बताकर सरकार को घेरा कहा कि जो सरकार संस्कृति और सनातन के नाम पर वोट मांगती है, वही सरकार ऐतिहासिक धरोहरों को मिटा रही है. उन्होंने AMASR Act, 1958 का हवाला देते हुए जांच की मांग की.

बनारस में यह सवाल नया नहीं है. यहां हर ईंट के नीचे इतिहास है, और हर विकास परियोजना के सामने स्मृति खड़ी हो जाती है. लेकिन अहिल्याबाई का नाम काशी और मालवा दोनों के लिए भावनात्मक है.

इंदौर में आज भी उनका नाम आते ही पहले अहिल्या याद आती हैं. और बनारस में, गंगा के किनारे, उनकी बनाई सीढ़ियों पर आज भी चिता की आग जलती है मोक्ष की आशा के साथ. गंगा बहती रहेंगी, काशी जिंदा रहेगी. पर सवाल यह है, क्या विकास की आंधी में अहिल्याबाई की विरासत भी मलबा बनकर रह जाएगी? यह शहर याद रखता है. और गंगा, गंगा तो सब जानती हैं.

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इसलिए सवाल सिर्फ़ इतना नहीं कि घाट का हिस्सा क्यों टूटा, सवाल यह है कि जो घाट मृत्यु को मंगल मानता है, वहाँ इतिहास को मलबा मानने की हिम्मत किसने कर दी?

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