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This Article is From Aug 31, 2023

गेहूं के पौधे को साक्षी मानकर, सम्मान और प्रेम देने का प्रतीक है कजलियां पर्व

बीते दिन देश भर में रक्षाबंधन की धूम देखी गई थी लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश के कुछ जगहों पर रक्षाबंधन के अगले दिन का भी खास महत्त्व होता है. बता दें कि बुंदेलखंड एवं महाकौशल में रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों का त्योहार मनाया जाता था.

गेहूं के पौधे को साक्षी मानकर, सम्मान और प्रेम देने का प्रतीक है कजलियां पर्व

भोपाल: बीते दिन देश भर में रक्षाबंधन की धूम देखी गई थी लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश के कुछ जगहों पर रक्षाबंधन के अगले दिन का भी खास महत्त्व होता है. बता दें कि बुंदेलखंड एवं महाकौशल में रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों का त्योहार मनाया जाता है. यह त्योहार क्या होता है? इससे जुड़ी भी जानकारी हम आपको बताएंगे लेकिन उससे पहले यह बता दें कि यह परंपरा कुछ सालों में समाप्त सी होती जा रही है. देहात और जबलपुर के पुरातन मोहल्लों में अभी भी यह त्योहार मनाया जाता है लेकिन बाकी जगहों पर इसका लगभग चलन खत्म हो चुका है.

कैसे मनाया जाता है ये त्योहार 

आइए आपको बताते हैं कि इसे कैसे मनाया जाता है. दरअसल, इस त्योहार को मनाने के लिए 15 दिन पहले घरों में मिट्टी की टोकरी में गेहूं या जौ के दाने अंकुरित होने रख दिए जाते हैं. ताकि रक्षाबंधन तक उनकी कोपलें फूट पड़ें. इन कोपलों को सभी धर्म, उम्र और समाज के लोग आपस में बांटते थे. जिस तरह होली में अबीर का महत्व है उसी तरह बुंदेलखंड में गेहूं की इन कजलियों का महत्व था, जिसे बांटकर दुश्मन भी अपनी दुश्मनी भुला देते थे.

कजलियां/भुजरिया पर्व की ख़ास बातें 

कजलियों को कई अंचलों में भुजलिया भी कहा जाता है. यह प्रकृति के प्रेम से जुड़ा पड़ाव है. श्रावण माह की अष्टमी-नवमीं को  छोटी-छोटी टोकरियों में गेहूं और जौ के दाने बिछाकर मिट्टी और खाद डाल दी जाती है. कई लोग इन टोकरियों को अंधेरे या छायादार स्थान पर रखकर उगाते हैं. ताकि कजलियों का रंग हरा न होकर हल्का पीला रहे लेकिन आजकल के ज़माने में धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म सी होती जा रही है.

किन्नरों का भरता है मेला

जबलपुर के हनुमानताल इलाके में कजलियां के दिन मेला भरने की भी परंपरा रही है, जो कि आज भी कायम है. इस दिन किन्नर समाज विभिन्न आकर्षक परिधानों में जुलूस की शक्ल में कजलियां ढोने हनुमानताल तालाब पहुंचते है. गाजे-बाजे के साथ निकलने वाली किन्नरों की टोली और उनका श्रंगार पुरुषों का ही नहीं बल्कि महिलाओं का भी आकर्षण का केंद्र रहता है. 

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