Indore Dirty Water Deaths: इंदौर के भगीरथपुरा में जो हुआ, वह कोई 'अचानक हुआ हादसा' नहीं बल्कि एक 'प्रायोजित त्रासदी' थी. इसकी पटकथा सालों से धूल खाती सरकारी फाइलों में लिखी जा रही थी, जिसे जिम्मेदार अधिकारियों ने बार-बार नज़रअंदाज़ किया. जब लोग अपनी प्यास बुझाने के लिए नलों के सामने खड़े थे, उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि जर्जर पाइपलाइनों से पानी नहीं, बल्कि साक्षात मौत उनके बर्तनों में उतर रही है. NDTV के हाथ लगे दस्तावेज़ गवाही दे रहे हैं कि दूषित पानी की शिकायतें 2022 से दर्ज थीं, लेकिन तंत्र की नींद तब तक नहीं टूटी जब तक कि बस्तियों से जनाजे नहीं उठने लगे. सच तो यह है कि इन मौतों की ज़हरीली जड़ें 2004 के उस दौर में ही बो दी गई थीं, जब सुधारों के नाम पर करोड़ों का कर्ज तो लिया गया, लेकिन ज़मीन पर सिर्फ लापरवाही की फसल काटी गई.
2004 का वो कर्ज: 906 करोड़ का अधूरा सपना
साल 2004 में मध्य प्रदेश सरकार ने एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) से 200 मिलियन डॉलर (तब लगभग 906 करोड़ रुपये) का कर्ज लिया था. इसका मुख्य उद्देश्य इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर की जलापूर्ति में सुधार करना और हर नागरिक को साफ पीने का पानी देना था. लेकिन 15 साल बाद, 2019 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने इस “वॉटर रिफॉर्म” की पोल खोलकर रख दी.CAG ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि इंदौर और भोपाल में दूषित और प्रदूषित पानी सप्लाई हो रहा है. पाइपलाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर हो चुके हैं, लीकेज की दर बहुत ज़्यादा है और मॉनिटरिंग सिस्टम पूरी तरह फेल है. भ्रष्टाचार और लापरवाही ने इस पूरे प्रोजेक्ट को खोखला कर दिया था.

इंदौर: भागीरथपुरा इलाके की जनता काफी वक्त से दूषित पानी की समस्या झेल रही है.
2025: जब पानी दवा नहीं, ज़हर बन गया
आज इंदौर में दूषित पानी पीने से कम से कम 11 लोगों की मौत हो चुकी है. भगीरथपुरा के घरों में नलों से पानी नहीं, बल्कि बीमारी आई. अस्पतालों के बेड भर गए और “देश का सबसे साफ शहर” नए साल में एक ऐसा दाग लेकर दाखिल हुआ, जिसे कोई स्वच्छता रैंकिंग नहीं धो सकती. सरकार ने माना कि सीवेज का पानी पीने की लाइन में मिल गया था. जांच बैठाई गई, निलंबन हुए और कार्रवाई के आदेश दिए गए. लेकिन सवाल वही है कि अगर शिकायतें पहले से थीं, तो कार्रवाई के लिए लाशों का इंतज़ार क्यों किया गया?
फाइलों की टाइमलाइन: मौतों के बाद जागी नगर निगम की नींद
NDTV ने नगर निगम की जिन फाइलों की पड़ताल की, वे बेहद परेशान करने वाली तस्वीर पेश करती हैं. जो काम सालों से अटका था, वह मौतों के बाद घंटों में पूरा होने लगा
- जुलाई 2022: भगीरथपुरा टैंक क्षेत्र की पाइपलाइन के लिए 2.4 करोड़ का टेंडर निकला.
- नवंबर 2022: मेयर-इन-काउंसिल से मंजूरी मिली.
- फरवरी 2023: महीनों बाद जरूरी कागजी औपचारिकताएं (साइन) हुईं.
- 12 नवंबर 2024: नई फाइल बनी, फिर भी काम शुरू नहीं हुआ.
- 8 अगस्त 2025: 9 महीने बाद दूसरा टेंडर निकला.
- 17 सितंबर 2025: टेंडर खुलने की तारीख तय हुई, लेकिन काम फिर भी अधर में रहा.
- 30 दिसंबर 2025: मौतों के बाद आनन-फानन में फाइल पर साइन हुए.
- 31 दिसंबर 2025: अगले ही दिन टेंडर खोलकर काम को 'फास्ट-ट्रैक' पर डाल दिया गया.
CAG की वो चेतावनी: जिसे चार्जशीट माना जाना चाहिए
2019 की CAG रिपोर्ट आज किसी भविष्यवाणी की तरह नहीं, बल्कि एक चार्जशीट की तरह लगती है. CAG ने तब जो कमियां गिनाई थीं, वही आज मौतों की वजह बनी हैं:
- पानी का गायब होना: इंदौर और भोपाल में आपूर्ति और वितरण के बीच 30% से 70% का अंतर है, यानी आधा पानी सिस्टम से “गायब” हो जाता है.
- कार्रवाई में भारी देरी: लीकेज की शिकायतों पर कार्रवाई करने में 22 से 182 दिनों तक का समय लिया गया.
- फेल सैंपल: 2013-18 के बीच 4,481 सैंपल BIS मानकों पर फेल पाए गए, लेकिन रिकॉर्ड में किसी बड़ी कार्रवाई का जिक्र नहीं है.
- टंकियों की अनदेखी: 45 में से 23 टंकियों की न तो सफाई हुई और न ही उनकी गाद की जैविक जांच की गई.
बोरवेल का दूषित पानी और लाखों की सेहत से खिलवाड़
CAG ने पाया कि इंदौर नगर निगम बिना किसी गुणवत्ता परीक्षण के बोरवेल का पानी सप्लाई कर रहा था. 20 बोरवेल नमूनों की जांच में सभी मानकों से बाहर मिले, जिनमें 'फीकल कॉलिफॉर्म' (मल संबंधी बैक्टीरिया) पाया गया. रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 8.95 लाख लोगों (इंदौर में 5.33 लाख) को दूषित पानी की आपूर्ति की जा रही थी. इसी अवधि में 5.45 लाख जलजनित बीमारियों के मामले दर्ज किए गए थे.भगीरथपुरा की घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का नतीजा है जिसे सालों पहले फेल घोषित किया जा चुका था, लेकिन फिर भी चलने दिया गया. यहां सिर्फ पाइपलाइन नहीं टूटी है, बल्कि जनता का सिस्टम पर भरोसा भी टूट गया है.
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