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कैसे बनते हैं शंकराचार्य, यह कितना कठिन? ब्राह्मण कुल से काशी विद्वत परिषद तक का पूरा रास्ता जानिए

प्रयागराज माघ मेले के दौरान शंकराचार्य पद को लेकर उठे विवाद के बीच यह सवाल अहम हो गया है कि शंकराचार्य कैसे बनते हैं. इसके लिए किसी सन्यासी में क्या-क्या दक्षता होना जरूरी है. इसका पहली परंपरा क्या है और इस पर आखिरी फैसला कौन लेता है? 

कैसे बनते हैं शंकराचार्य, यह कितना कठिन? ब्राह्मण कुल से काशी विद्वत परिषद तक का पूरा रास्ता जानिए

How to become Shankaracharya: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में सनातन धर्म और आस्था का माघ मेला लगा है. इस मेले में पहुंचकर लाखों श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ ले रहे हैं. बीते दिनों मौनी अमावस्या पर संगम में स्नान करने को लेकर माघ मेला प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Swami Avimukteshwaranand) के बीच तनातनी हो गई. मेला प्रशासन की ओर से उन्हें नोटिस देकर पूछा कि वह शंकराचार्य कैसे हैं. इसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर सवाल खड़े हो गए. आइए, इस विवाद के बीच हम जानते हैं कि शंकराचार्य कैसे बनते हैं?    

ब्राह्राण कुल में जन्म और दंडी संन्यासी आवश्यक 

भारत में शृंगेरी, द्वारका, ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) और गोवर्धन मठ (पुरी) चार मठ हैं, सभी मठों के शंकराचार्य अलग-अलग होते हैं. किसी भी मठ के लिए शंकराचार्य के चयन की प्रक्रिया लंबी और जटिल है. इसकी सबसे पहले प्रक्रिया यह है कि शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्राण परिवार में जन्म होने के साथ-साथ दंडी संन्यासी होना जरूरी है. गृहस्थ जीवन और सांसारिक मोह-माया का त्याग कर ब्रह्मचर्य का पालन करना और मुंडन और पिंडदान की प्रक्रिया से भी गुजरना जरूरी है. साथ ही जीवन त्याग, संयम, तप और अनुकरणीय आचरण से भी युक्त होना चाहिए, ताकि वह समाज और शिष्यों का मार्गदर्शन कर सके.

चार वेटों और छह वेदांगों  का ज्ञान जरूरी 

किसी संन्यासी को शंकराचार्य बनने के लिए चार वेदों चार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का संपूर्ण ज्ञान होना चाहिए. संस्कृत में निपुणता के साथ छह वेदांग शिक्षा, छंद, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प का भी ज्ञाता होना जरूरी है. इसके लिए शास्त्रार्थ की विधा में भी निपुणता जरूरी है.

ऐसे होता है शंकराचार्य का चयन  

अगर, कोई सन्यासी इन भी परंपराओं में निपुण है तो भी उसका शंकराचार्य बनना आसान नहीं है. इसके बाद भी उसे एक लंबी चयन प्रक्रिया से गजरना होगा. किसी भी मठ के शंकराचार्य के चयन की प्रक्रिया अन्य मठों के प्रमुखों से शुरू होगी है. मठों के प्रमुख शंकराचार्य की उपाधि के लिए किसी योग्य और विद्वान सन्यासी का चयन करते हैं. उसके नाम के प्रस्ताव को आचार्य महामंडलेश्वरों के समक्ष पेश किया जाता है. महामंडलेश्वरों द्वारा सन्यासी के वेदों, वेदांग और शास्त्रों के ज्ञान समेत अन्य योग्यता का परीक्षण किया जाता है. 

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काशी विद्वत परिषद करती है आखिरी फैसला  

महामंडलेश्वरों की कठिन परीक्षा पास करने के बाद शंकराचार्य बनने के योग्य सन्यासी को आचार्य महामंडलेश्वर द्वारा प्रतिष्ठित संतों की सभा के पेश किया जाता है. जहां, संतों द्वारा उसके धार्मिक, दार्शनिक, शास्त्रार्थ (धार्मिक वाद-विवाद) और आध्यात्मिक ज्ञान परखा जाता है. अगर, सन्यासी इस परीक्षा में सफल होता है तो उसे काशी विद्वत परिषद के समक्ष पेश किया जाता है. काशी विद्वत परिषद सन्यासी की योग्यता का आखिरी मूल्यांकन करती है, सफल होने पर शंकराचार्य की उपाधि दी जाती है. 

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