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This Article is From Jan 26, 2024

1984 गैस त्रासदी का दर्द, दशकों बीते लेकिन नहीं पूरे हुए सरकारी वादे, अब तक पेंशन की आस में हैं विधवाएं

भोपाल गैस त्रासदी को 39 साल बीत चुके हैं... लेकिन आज भी यह जिंदा बचे लोगों को एक भयंकर सपने की तरह याद है. इस हादसे की यादें आज भी गैस पीड़ितों के ज़हन में ज़िंदा है. त्रासदी का दंश झेल रहे लोगों में कई विधवा महिलाएं भी शामिल हैं. इन सभी महिलाओं को सरकार से मदद की दरकार है.

1984 गैस त्रासदी का दर्द, दशकों बीते लेकिन नहीं पूरे हुए सरकारी वादे, अब तक पेंशन की आस में हैं विधवाएं
Bhopal Gas Tragedy

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 2 दिसंबर 1984 की सर्द रात... वो काली रात थी जिसने न सिर्फ हजारों लोगों की जान ले ली बल्कि त्रासदी के 39 साल बाद भी यह जिंदा बचे लोगों को एक भयंकर सपने की तरह याद आती है. 2 और 3 दिसंबर, 1984 को भोपाल के यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकली जहरीली गैस से हजारों लोग मौत के मुंह में समा गए. वहीं, 5  लाख से ज्यादा लोगों शारीरिक रूप से प्रभावित हुए. उस रात हुए धमाके में कई परिवार बेघर हुए... कितनों के दामन जले और कितनों ने अपने परिवारों को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखा. हर तरफ चीख-पुखार मच गई.

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उस खौफनाक रात के सालों बीत जाने के बाद भी लोग इस त्रासदी से हुई दुर्गति से उबर नहीं पाए हैं. भोपाल गैस रिसाव का दंश झेल रही 5000 से ज्यादा विधवा महिलाओं को आज भी समय पर पेंशन नहीं मिल पाती. इन्हें हर 2-4 महीनों के बाद अपने हक के पेंशन का फिर महीनों इंतज़ार करना पड़ता है. NDTV की टीम ने इन महिलाओं से बात की. हमसे बातचीत करते समय महिलाओं ने हादसे से मिले सितम बयां किए. NDTV के संवाददाता ने भोपाल की शकीला बी और मुन्नी बाई से बात की. 

भूखे पेट सोने को मजबूर है शकीला बी

भूखे पेट सोने को मजबूर है 'शकीला बी'

भोपाल गैस त्रासदी की पीड़ित शकीला बी के फेफड़ों में इतनी ताकत भी नहीं कि चूल्हा सुलगा लें... 30 साल पहले रिसी गैस से परिवार तबाह हो गया, पति को कैंसर हुआ, 14 साल पहले मौत हो गई. उनके घर में उज्जवला जैसे मुंह चिढ़ा रही है. लकड़ियां बिखरी पड़ी हैं. अंगूठे के निशानों ने भी धोखा दे दिया, सो सरकारी राशन भी रूठा है. ज्यादातर शकीला भूखे पेट ही जमीन पर चादर बिछाकर सो जाती हैं. पेंशन बुढ़ापे की लाठी थी. लेकिन सरकारी वादों से परे शकीला बी को सहारे की दरकार है. 

सीने में घुटन लेकर जीने को मजबूर 

जब आप शकीला बी की  झोपड़ी को गौर से देखेंगे तब आपको शायद शकीला बी का दर्द महसूस होगा. शकीला 1 छोटे से झोपड़ी में ही रहती हैं.  महीनों से पेंशन का पैसा अटका हुआ है. घर परिवार में कोई बचा रहा है तबीयत ख़राब रहती है. उन्हें 1 वक्त खाना भी नसीब नहीं होता हैं. शकीला बताती है कि पैसा आना बंद हो गया है. दो जोड़ी कपड़ों में वह जीवन निकाल रही हैं. घर में कोई नहीं है. सालों पहले पति की मौत  हो चुकी है. 

इसके बाद NDTV ने एक और घर की रुख किया. जेपी नगर में ही छोटे से घर में मुन्नी बाई रहती है. आज के मौसम में महंगाई ने कमर तोड़ दी है. तीन साल के पेंशन का पैसा आजतक अटका है. वो मिला नहीं है. दो महीने से वापिस पेंशन बंद है. पहले झाड़ू पोंछा कर काम चलता था, लेकिन अब शरीर ने साथ देना बंद कर दिया है. 

मुन्नी बाई

मुन्नी बाई

मेरे पति की मौत 11 साल पहले हो चुकी है. गैस का असर आज भी हमारे शरीरों पर है. सबसे बड़ी परेशानी वाली बात ये है कि 1 हज़ार रुपया में जैसे तैसे ख़र्चा चलता था... अब वो भी नहीं मिलते हैं, थोड़ा बहुत मुआवज़ा मिला था. उसके लिए रहने के लिए जगह तो बना ली लेकिन अब घर का ख़र्चा निकल तक नहीं पाता है. महंगाई लगातार बढ़ रही है. बेटा थोड़ा बहुत कमा लेता है. पहले झाड़ू पोछा करके काम चला लिया जाता था. लेकिन अब उम्र बढ़ती जा रही है तो वो भी बंद कर दिया है. 

मुन्नी बाई

गैस पीड़ित 

गैस पीड़ित विधवाओं के आंसू साफ़ बताते हैं कि देश की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के जख़्म अब तक भरे नहीं हैं. जख़्म रह-रहकर तब उभरने लगते हैं. सरकार किसी की भी हो लेकिन ये लाडली बहनें नहीं बन पातीं... अगर बनतीं तो कम से कम हक का पैसा वक्त पर जरूर मिलता. गैस पीड़ितों के मामले में BJP और कांग्रेस आपस में ही एक दूसरे को घेर रहे हैं. साल 2019 में पेंशन बंद होने को BJP ने मुद्दा बनाया था. मार्च 2020 में BJP की सरकार आई,फिर घोषणा हुई. घोषणाएं होती रही पर पूरी कभी नहीं हुई. ना कांग्रेस ने एक सवाल उठाया. 

“हमने तो गैस पीड़ित लोगों के लिए बजट भेजा था. कांग्रेस ने उस बजट को रोक दिया था. गैस पीड़ितों को आज जो भी परेशानियां है उसकी ज़िम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी है. हमारी पार्टी तो महिलाओं का हमेशा सम्मान करती है. जो भी परेशानियां है वो सब ख़त्म की जाएंगी. पेंशन भी दोबारा शुरू की जाएगी. सरकार इसको लेकर लगातार कोशिश कर रही है”. - सत्येन्द्र जैन , BJP प्रवक्ता

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“ईधर नई सरकार आई है. ये जन हितेषी की जगह जनविरोधी नीतियों के लिए जानी जाएगी. गैस पीड़ित बहनों की पेंशन को रोकना जनविरोधी नीतियों का हिस्सा है. चुनाव के लिए आपने लाड़ली बहना योजना का इस्तेमाल किया. मजबूरी में आपको और कंटिन्यू रखेंगे. आप जानते हैं कि लोक सभा के बाद वो भी बंद हो जाएगी लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की इन बहनों का क्या?” अब्बास हफ़ीज़ , कांग्रेस प्रवक्ता  

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