यह कहानी सिर्फ एक सड़क की नहीं, बल्कि 25 साल से इंतजार और टूटी हुई उम्मीदों की है. मध्य प्रदेश के बैतूल जिला मुख्यालय से महज 18 किलोमीटर दूर बसे ग्राम बोड़ना के ग्रामीण बीते ढाई दशक से सड़क के लिए गुहार लगाते रहे, लेकिन जब हर दरवाजा बंद मिला तो अब वही ग्रामीण कुदाल-फावड़ा उठाकर खुद रास्ता बनाने निकल पड़े
गांव के बुज़ुर्ग बताते हैं कि इसी दुर्गम पहाड़ी रास्ते पर कई बार बीमारों को खाट पर ढोकर ले जाना पड़ा तो कभी गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल न पहुंच पाने का दर्द झेलना पड़ा. बरसात में हालात और भी भयावह हो जाते हैं, जब कच्ची सड़क दलदल में बदल जाती है और गांव मानो दुनिया से कट जाता है.

यह तस्वीर 25 साल से इंतजार और टूटी हुई उम्मीदों की है.
बघवाड़ तक पक्की सड़क है, लेकिन उसके आगे बोड़ना तक पांच किलोमीटर का रास्ता ग्रामीणों के लिए सबसे लंबा सफर बन गया. इस छोटे से रास्ते के बन जाने से जहां जिला मुख्यालय की दूरी 18 किलोमीटर रह जाएगी, वहीं आज ग्रामीणों को मजबूरी में 35 किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है. गांव के छात्र रोज सुबह अंधेरे में निकलते हैं, कई बार रास्ता खराब होने के कारण कॉलेज तक पहुंच ही नहीं पाते. वहीं, किसानों की उपज समय पर मंडी न पहुंच पाने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.
कोई अफसर झांके तक नहीं आया
ग्रामीण कहते हैं- “सड़क नहीं है, इसलिए हमारी तकलीफें भी कहीं नहीं पहुंचतीं”. उनका आरोप है कि चुनाव से पहले विधायक ने लिखित आश्वासन दिया था, लेकिन चुनाव बहिष्कार के फैसले के बाद गांव को अनदेखा कर दिया गया. वर्षों से कोई अफसर गांव में झांकने तक नहीं आया है.

रास्ता नहीं भविष्य बना रहे ग्रामीण
आख़िरकार गांव ने फैसला किया- अब और इंतज़ार नहीं. हर घर से महिला-पुरुष निकले, किसी के हाथ में कुदाल थी तो किसी के हाथ में फावड़ा. पथरीली चढ़ाई के बीच ग्रामीण उस रास्ते को ठीक कर रहे हैं, जिस पर होकर उनके बच्चों का भविष्य, किसानों की फसल और मरीजों की जिंदगी सुरक्षित रह सके.
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शायद प्रशासन की नींद भी तोड़ेगा
ग्रामीणों को उम्मीद है कि यह श्रमदान सिर्फ सड़क नहीं बनाएगा, शायद प्रशासन की नींद भी तोड़ेगा, ताकि कभी एंबुलेंस गांव तक पहुंच सके और किसी को मजबूरी में अपनी जान हथेली पर लेकर सफर न करना पड़े.