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This Article is From Aug 30, 2025

Surajpur News: अंधविश्वास बना जानलेवा झाड़-फूंक के चक्कर में गई दो जानें, चार बच्चे हुए अनाथ, जानें- पूरा मामला

सूरजपुर जिले के भैयाथान विकासखंड के गांव बसकर में सांप के काटने से एक दंपती की मौत हो गई. हालांकि, इस मौत में सांप के जहर से ज्यादा भूमिका अंधविश्वास की रही. दरअसल, सांप काटने के बाद पति-पत्नी की हालत बिगड़ने पर अस्पताल के बजाय झाड़ फूंक के लिए ओझा के पास ले गए. लिहाजा, इलाज में देरी की वजह से दोनों की मौत हो गई.

Surajpur News: अंधविश्वास बना जानलेवा झाड़-फूंक के चक्कर में गई दो जानें, चार बच्चे हुए अनाथ, जानें- पूरा मामला

Snake Bite News: सूरजपुर जिले के भैयाथान विकासखंड के गांव बसकर में अंधविश्वास ने एक परिवार की दुनिया उजाड़ दी. तुलेश्वर गोंड और उनकी पत्नी नीता गोंड की मौत सर्पदंश से नहीं, बल्कि इलाज में देरी और झाड़-फूंक के भरोसे रहने के कारण हुई. अब चार छोटे-छोटे बच्चे मां-बाप दोनों को खो चुके हैं.

बीती रात दंपती अपने बच्चों और लकवाग्रस्त पिता के साथ जमीन पर सो रहे थे. रात दो बजे के करीब नींद खुली, तो बिस्तर के पास सांप देखा. दोनों ने मिलकर सांप को मार दिया और उसे घर के कोने में डाल दिया. इसके बाद दोबारा सो गए, लेकिन तभी नीता की तबीयत बिगड़ने लगी.

पति-पत्नी ने इलाज में देरी से तोड़ा दम

लिहाजा, परिजन आनन-फानन में उसे अस्पताल ले जाने की बजाय गांव के एक ओझा को बुला लाए. फिर झाड़-फूंक का दौर शुरू हुआ, मंत्र पढ़े गए और धुआं किया गया, लेकिन नतीजा वही निकला जो हर बार निकलता है. सर्प दंश के शिकार महिला की हालत और बिगड़ती गई. न समय पर इलाज मिला, ना सही दिशा में कदम उठाए गए. सुबह जब तक एंबुलेंस आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. नजदीकी हॉस्पिटल में पहुंचने पर डॉक्टरों ने नीता की मृत घोषित कर दिया. वहीं, पति को जिला अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन दोपहर में तुलेश्वर ने भी जिला अस्पताल में दम तोड़ दिया.

अंधविश्वास नहीं, इलाज जरूरी है

यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है.  झाड़-फूंक, टोना-टोटका और ओझाओं के भरोसे रहकर हर साल सैकड़ों लोग खासकर ग्रामीण इलाकों में अपनी जान गंवा देते हैं. दरअसल, सर्पदंश एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसका इलाज सिर्फ अस्पताल में संभव है. झाड़-फूंक से न तो जहर निकलता है और न ही जान बचती है. उल्टा, देरी से इलाज मिलने पर जिंदगी खत्म हो जाती है, जैसा कि तुलेश्वर और नीता के साथ हुआ. अब सवाल है यह है कि कब तक लोग अंधविश्वास के अंधेरे में जान गंवाते रहेंगे. क्या अब भी हम नहीं समझेंगे कि सही समय पर सही इलाज ही जीवन बचा सकती है.

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फ़िलहाल, चार मासूम बच्चों की आंखों में अब सिर्फ आंसू है.  उनके पास न मां है, न पिता. ऐसे में कहा जा सकता है कि यह सर्प दंश नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में फैला अंधविश्वास का ज़हर है, जिसने दो ज़िंदगियां छीन ली.

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