Naxalite Papa Rao Surrender: छत्तीसगढ़ को नक्सली मुक्त बनाने की दिशा में अब तक की सबसे बड़ी सफलता सामने आई है. सशस्त्र नक्सल आंदोलन के सबसे सक्रिय और खूंखार चेहरों में शामिल पापा राव (Naxalite Papa Rao Surrender) ने अपने 17 साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया है. इसे राज्य में नक्सल समस्या के अंतिम चरण की ओर बढ़ा निर्णायक कदम माना जा रहा है. एनडीटीवी से बातचीत में पापा राव ने कहा कि वह अब संविधान के दायरे में रहकर लोकतांत्रिक तरीके से काम करेगा. सरकार द्वारा तय 31 मार्च 2026 से पहले छत्तीसगढ़ के नक्सली मुक्त होने की उम्मीद इस घटनाक्रम से और मजबूत हुई है.
जनवरी से शुरू हुई थी आत्मसमर्पण की प्रक्रिया
यह घटनाक्रम अचानक नहीं हुआ. इस पूरे घटनाक्रम की नींव जनवरी महीने में रखी गई थी, जब संवाद की कोशिशें शुरू हुईं. मध्यस्थ नेशनल पार्क के भीतर तक जाकर पापा राव के लिए कई स्थानों पर चिट्ठियां छोड़ी गई थीं. रणनीति का आधार भरोसा था, क्योंकि माना जाता है कि जंगलों में खबरें शोर से नहीं, विश्वास से फैलती हैं. चिट्ठियां पापा राव तक पहुंचीं, हालांकि उस समय उन्होंने आत्मसमर्पण का फैसला नहीं किया. बाद में रविवार को अचानक फोन आया. कॉल करने वालों ने नाम नहीं बताया, सिर्फ इतना कहा कि वे मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं. बातचीत से साफ हो गया था कि मामला बड़ा और गंभीर है.
छत्तीसगढ़ में अब सिर्फ तीन बड़े नक्सली नेता सक्रिय
पापा राव के पुनर्वास के बाद छत्तीसगढ़ में सक्रिय बड़े नक्सली नेताओं की संख्या काफी कम हो गई है. अब केवल तीन बड़े नक्सल लीडर सक्रिय बताए जा रहे हैं.
- हेमला बिच्चा
- सोढ़ी केशा
- महिला नक्सल लीडर रूपी
हेमला बिच्चा और सोढ़ी केशा बीजापुर और तेलंगाना की सीमावर्ती जंगलों में सक्रिय हैं, जबकि रूपी कांकेर और आसपास के इलाकों में अपनी टीम के साथ मौजूद बताई जा रही है.

नए कैडर का ट्रेनर था ‘पापा राव'; कई बड़ी नक्सली वारदातों में रही अहम भूमिका
छत्तीसगढ़ के सबसे खौफनाक नक्सली हमलों में शामिल ताड़मेटला कांड, जिसमें 76 जवानों की शहादत हुई थी, उसमें पापा राव की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. इसके अलावा कई बड़ी नक्सली वारदातों में भी पापा राव को मास्टरमाइंड के रूप में जाना जाता रहा है. संगठन में रहते हुए पापा राव केवल साजिश रचने तक सीमित नहीं था, बल्कि वह नए कैडर को ट्रेनिंग देने वाला मुख्य प्रशिक्षक भी था. युवाओं को हथियार चलाने, आईईडी प्लांट करने, सुरक्षा बलों की टुकड़ियों को एंबुश में फंसाने, और जंगल में लंबे समय तक टिके रहने की ट्रेनिंग देने जैसी जिम्मेदारियां वह निभाता रहा.
सरेंडर के बाद फिर चर्चा में आईं पुरानी कहानियां
पापा राव के सरेंडर के बाद उससे जुड़ी कई पुरानी कहानियां एक बार फिर चर्चा में हैं. इनमें सबसे अहम चर्चा उसकी बार‑बार जिंदा रहते मारे जाने की अफवाहों को लेकर है. सुरक्षा बलों को चकमा देने के लिए पापा राव ने कई मौकों पर खुद की मौत की खबरें फैलवाईं और इसी आड़ में अपने मंसूबों को अंजाम देता रहा.
20 वर्षों में कई बार फैलाई अपनी मौत की अफवाह
नक्सल संगठन में सक्रिय रहते हुए पापा राव ने पिछले 20 वर्षों में कई बार अपनी मौत की अफवाह फैलाई. इनमें से तीन बार ऐसे मौके आए, जब सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय लोगों को भी लगभग यकीन हो गया था कि पापा राव मारा जा चुका है.
कभी सांप काटने, तो कभी किडनी खराब से मौत की खबर
साल 2015‑2016 में जब बस्तर इलाके में नक्सलियों पर सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ा, तब जुलाई 2016 में सुकमा से खबर आई कि नक्सल कमांडर पापा राव की सांप काटने से मौत हो गई है. हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों की खुफिया जांच में यह खबर महज अफवाह निकली. इसके बाद 2020 में एक बार फिर उसकी किडनी की बीमारी से मौत की खबर फैली, जिसने कुछ समय के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर दी.
मुठभेड़ों में मारे जाने की खबरें भी आती रहीं
कोरोना काल के दौरान जब कई नक्सलियों के मारे जाने की सूचनाएं सामने आ रही थीं, तब यह मान लिया गया कि पापा राव भी किडनी फेल होने से मर चुका है. लेकिन बाद की कुछ मुठभेड़ों में उसकी मौजूदगी सामने आने से यह खबर भी गलत साबित हुई. इसी साल जनवरी में बीजापुर के नेशनल पार्क एरिया में एक मुठभेड़ के दौरान पापा राव के मारे जाने की खबर आई थी. इस मुठभेड़ में उसकी टीम के चार सदस्य मारे गए, लेकिन पापा राव फिर बच निकलने में कामयाब रहा.
बीमारियों और मुठभेड़ों के नाम पर उड़ती रहीं अफवाहें
साल 2005 से 2025 के बीच अलग‑अलग समय पर कभी मलेरिया, कभी मुठभेड़, तो कभी अन्य बीमारियों के हवाले से पापा राव की मौत की अफवाहें उड़ती रहीं. हर बार ये खबरें सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनीं, लेकिन अंततः वह लंबे समय तक गिरफ्त से बाहर रहा.
सरकार की बदली रणनीति साबित हुई निर्णायक
राज्य सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ केवल सैन्य कार्रवाई तक खुद को सीमित न रखते हुए रणनीति में व्यापक बदलाव किया. दूरस्थ और प्रभावित इलाकों में सड़क, बिजली, पानी, स्कूल और राशन जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाई गईं. इसके साथ ही नियद नेल्लानार योजना, बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों के जरिए स्थानीय आदिवासी समुदाय का भरोसा जीतने की कोशिश की गई. अधिकारियों का मानना है कि विकास और संवाद की इस संयुक्त नीति ने नक्सल आंदोलन को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाई.

नक्सल समस्या के अंतिम चरण में छत्तीसगढ़
विशेषज्ञों के अनुसार, पापा राव जैसे शीर्ष नक्सली नेता का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या अपने अंतिम दौर में पहुंच रही है. यदि शेष सक्रिय नेता भी मुख्यधारा में लौटते हैं, तो तय समय सीमा में राज्य के नक्सली मुक्त होने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.
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