
Chhattisgarh Election Results: छत्तीसगढ़ में कांग्रेस (Congress) की डूबी नैया के बीच कुछ मंत्रियों ने जीत दर्ज की है, इनमें से आबकारी मंत्री कवासी लखमा भी हैं. हालांकि, कड़े मुकाबले के बाद आखिरकार उन्हें जीत मिली. वे कोंटा (Konta) विधानसभा सीट से छठी बार विधायक चुने गए हैं. हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान इस बार उन्हें अपने इलाके में भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. कवासी लखमा ने बीजेपी के सोयम मोका को शिकस्त दिया है.
इकलौते अनपढ़ मंत्री रहे हैं लखमा
सुकमा (Sukma) जिले के छोटे से गांव नागारास में जन्में लखमा का सियासी सफर पार्षद के तौर पर शुरू हुआ था. भूपेश कैबिनेट में वे इकलौते अनपढ़ मंत्री रहे हैं. उन्हें आबकारी मंत्री बनाया गया था. ऐसा नहीं है कवासी लखमा के गांव में स्कूल नहीं था, प्राइमरी स्कूल तब भी था और आज भी है. लेकिन घर की माली हालत ने लखमा और उनके भाइयों को पढ़ाई से बेहद दूर रखा.
1998 में पहली बार मिला था टिकट
वार्ड पंच के बाद कवासी लखमा साल 1991 में सोनाकूकानार के सरपंच चुने गए. लखमा अनपढ़ जरूर थे, लेकिन चारों भाईयों में सबसे तेज तर्रार हैं. ऐसे में बैलों की खरीदी बिक्री के लिए वे ही गांव से बाहर जाया करते थे. इसी का फायदा इन्हें मिला वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अरविंद नेताम के संपर्क में आए. काबिलियत को देख साल 1998 में कोंटा विधानसभा टिकट दिया गया और पहली ही बार में जीत दर्ज की.
पिता को पता ही नहीं था बेटा विधायक है
लखमा के रिश्तेदारों ने NDTV से बातचीत में बताया कि पहली बार जब विधायक का चुनाव लड़े तो किसी को पता ही नहीं था. घर पर लोग आते-जाते थे, गाड़ियां आने लगीं. पिताजी को चिंता सताने लगी थी. वे अक्सर कहते थे, महारा की तरह इधर-उधर घूमता रहता है, उन्हें लगता था, बेटे ने कर्ज लिया है, कर्जदार घर आते हैं. पिताजी के मित्र कहते थे, बेटा बिगड़ गया है. कई सालों तक यही स्थिति चलती रही. लेकिन बाद में जब पिता को पता चला कि उनका बेटा MLA है, तो उन्हें गर्व होने लगा.
प्रेमिका से मिलने कोसरा काटने जाते थे, भरना पड़ा था दंडुम
लखमा के वैवाहिक जीवन के किस्से भी बेहद दिलचस्प हैं. करीब 45 साल पहले लखमा को गांव की लड़की बुधरी से प्रेम हो गया था. उन्हें देखने के बहाने वे बुधरी के खेत कोसरा काटने जाया करते थे. गांव में पंडुम, मेला-मड़ई जैसे पर्वों पर दोनों का मिलना बेहद आसान हुआ करता था. ऐसे पर्वों पर दोनों साथ में नाचने जाया करते थे. दोनों ने शादी का मन बनाया व घर से भाग गए. ग्रामीणों व परिवार को जब यह बात पता चली तो लखमा पर भी दंडुम लगाया. दंडुम के तौर पर 30 बॉटल शराब, सुअर, बकरा, तीन मुर्गा देना पड़ा था. पत्नी बुधरी कवासी ने बताया कि पति अनपढ़ जरूर हैं, लेकिन उनमें काबिलियत बहुत है.
2008 का चुनाव बड़ी चुनौती, यहां से पत्नी ने दिया था साथ
लखमा 1998 के बाद लगातार विधायक चुने गए. साल 2008 का चुनाव सबसे चुनौती भरा था. बड़े पुत्र कवासी बोंके बताते हैं कि 2005 सलवा जुड़ूम का दौर था. पिताजी ने कभी सलावा जुड़ूम समर्थन नहीं किए थे. वजह यही थी कि इस चुनाव बीजेपी के पदम नंदा से कड़ी टक्कर रही, बेहद कम 192 मतों से कवासी लखमा ने जीत दर्ज की थी. इस चुनाव में पति को जीत मिले, इसके लिए पत्नी बुधरी कवासी ने कमान संभाली, अपनी सहेलियों के साथ प्रचार के लिए निकल पड़ीं.
राजनीति में रूचि नहीं
चारों भाईयों में इकलौते लखमा ही राजनीति में हैं. इनके छोटे पुत्र हरीश कवासी राजनीति में आए. इनके अलावा परिवार के किसी भी सदस्य की राजनीति में रूचि नहीं हैं. बड़े बेटे ने 8वीं तक पढ़ाई की.