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रमेशचंद्र झा पुण्यतिथि: जिसने आज़ादी लड़ी भी और उसे लिखा भी

रविकांत ओझा
  • विचार,
  • Updated:
    अप्रैल 07, 2026 15:11 pm IST
    • Published On अप्रैल 07, 2026 15:06 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 07, 2026 15:11 pm IST
रमेशचंद्र झा पुण्यतिथि: जिसने आज़ादी लड़ी भी और उसे लिखा भी

Ramesh Chandra Jha Freedom Fighter Death Anniversary: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कुछ कहानियां व्यक्ति की नहीं, पूरे परिवार की होती हैं. रमेशचंद्र झा की कहानी भी ऐसी ही है, जहां एक 14 वर्षीय किशोर का संघर्ष एक पूरे बाग़ी घराने की विरासत से निकलता है.

चंपारण के सुगौली स्थित फुलवरिया गांव में रमेशचंद्र झा और उनका परिवार उन विरले परिवारों में था, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में सचमुच “जान फूंक दी” थी. 7 अप्रैल रमेश जी की पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है. अगर इस परिवार का इतिहास देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि पूरे चंपारण में दर्जन भर स्वतंत्रता सेनानियों का यह शायद इकलौता परिवार था, जहां हर कोई आंदोलन में शामिल था. पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी. पिता पंडित लक्ष्मीनारायण झा के साथ-साथ राजाजी झा, नंदजी झा, उपेन्द्र झा, शुभकला देवी और जागीदत्त झा सभी अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सक्रिय थे.

स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ठ पत्रकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर' ने इस परिवार के संघर्ष को शब्द देते हुए लिखा था. “रमेशचंद्र झा और उनके परिवार का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम में बर्बाद होकर अट्टाहास करने का इतिहास है. वे उनमें हैं, जिन्होंने गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के लिए खुद हथकड़ियां पहनी हैं और खौफनाक फरारी जिंदगी का लुत्फ भी उठाया है.” यह केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस वातावरण का दस्तावेज़ है, जिसमें रमेशचंद्र झा का बचपन बीता.

स्कूल के दिनों में ही उन्हें अंग्रेज़ी प्रशासन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस्तेमाल किया गया, यह सोचकर कि 14 साल के एक लड़के पर कोई शक नहीं करेगा. तब वे रक्सौल के हजारीमल उच्च विद्यालय के छात्र थे. लेकिन यह अनुमान गलत साबित हुआ. इतिहासकार रितु चतुर्वेदी और आर.एस. बख्शी अपनी किताब “Bihar Through the Ages” में लिखते हैं. “रमेशचंद्र झा को पकड़ लिया गया था और इंडियन डिफेंस एक्ट की धारा 38(5)(a) लगाकर रात भर थाने के जेल में रखा गया. अगली सुबह हथकड़ी लगाकर उन्हें कोर्ट में पेश किया गया.”

कम उम्र ने एक बार उन्हें बचा लिया, लेकिन यह केवल शुरुआत थी. सुगौली रेलवे थाना लूट और अग्निकांड जैसे मामलों में उन्हें फिर अभियुक्त बनाया गया. इसके बाद वे लंबे समय तक फरार और भूमिगत रहे. यह वह दौर था, जब उनका जीवन किसी भी छोटे बच्चे से बिल्कुल अलग हो चुका था. यह एक अंडरग्राउंड क्रांतिकारी का जीवन था.

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर' द्वारा 1963 में प्रकाशित संस्मरण ‘ और तीसरे दर्जे का कैदी करार दिया गया' में झा जी का एक आत्मवृत्तांत इस पूरे माहौल को और स्पष्ट करता है. वे लिखते हैं. “सुगौली का अनवर दारोगा जानता था कि ये सब मेरा किया धरा है, पर उसे सबसे ज्यादा भय गायब हुई पिस्टल की वजह से था. इसलिए जब कभी वह मुझे गिरफ्तार करने आता तो आदर से ही बात करता और मैं भी कभी-कभी कह देता कि आज गिरफ्तार होने का मेरा मूड नहीं है. उस एक जर्मन मेड पिस्टल ने मुझे कई बार बचाया.”

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यह बात उस असामान्य स्थिति को दर्शाती है, जहां एक 14 साल का युवा सत्ता और कानून के बीच एक अनिश्चित, लेकिन साहसी स्थान पर खड़ा था. 1942 तक आते-आते आंदोलन का स्वर भी बदल चुका था. महात्मा गांधी ने साफ कह दिया था. “अपने-अपने इलाक़े आज़ाद कर लो, देश खुद आज़ाद हो जाएगा.” यह आह्वान केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध को वैधता देने जैसा था. बलिया में चित्तू पांडे जैसे उदाहरण सामने आए, और बिहार, विशेषकर चंपारण भी उसी तेवर में खड़ा था.

चंपारण का इतिहास वैसे भी छिटपुट घटनाओं का इतिहास नहीं रहा. यहां स्वतंत्रता आंदोलन कई दशकों तक लगातार चला. ऐसे में रमेशचंद्र झा जैसे युवाओं का उभरना किसी अपवाद की तरह नहीं, बल्कि उस सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम था. 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान रमेशचंद्र झा और उनके परिवार को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. गांव के लोगों के अनुसार, अंग्रेज़ उनके घर को बार-बार लूटते थे. कपड़े, बर्तन, जो कुछ मिलता, उठा ले जाते. घर उजड़ता, फिर बसता और फिर उजड़ जाता.

इस निरंतर अस्थिरता के बीच रमेशचंद्र झा ने न केवल आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की, बल्कि जेल की यातनाएं भी झेलीं. लेकिन यही जेल उनके जीवन का एक अहम हिस्सा भी बनी. जहां एक ओर जेल दमन का प्रतीक थी, वहीं रमेशचंद्र झा के लिए वह जगह अध्ययन और आत्म-परिवर्तन का माध्यम बन गई. यहीं उन्होंने साहित्य पढ़ना शुरू किया और धीरे-धीरे लेखन की ओर झुकाव हुआ.

इस तरह, एक किशोर क्रांतिकारी जो फरारी, गिरफ्तारी और टकराव के बीच जी रहा था, जेल से बाहर निकलते-निकलते एक लेखक में बदलने लगा. उनकी विरासत केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन में भी निरंतर सक्रिय बनी रही. उनकी कविताएं केवल पढ़ी नहीं जाती थीं, बल्कि सुनी जाती थीं. आकाशवाणी से लेकर अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों तक उनकी आवाज एक जनस्वर के रूप में गूंजती रही, जहां वे हरिवंश राय बच्चन और गोपालदास नीरज जैसे समकालीनों के साथ मंच साझा करते थे.

हरिवंश राय बच्चन लिखते हैं. “रमेशचंद्र झा की गीतों में हृदय बोलता है और कला गाती है. मेरी मनोकामना है कि उनके मानस से निकले हुए गीत अनेकानेक कंठों में उनकी अपनी-सी प्रतिध्वनि बनकर गूंजें.” यह इस बात का प्रमाण है कि वे केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि एक जीवंत सार्वजनिक कवि थे, जिनकी रचनाएं सीधे लोगों से संवाद करती थीं.

रमेशचंद्र झा के व्यक्तित्व में राष्ट्रबोध हमेशा सक्रिय रहा. भारत-चीन युद्ध के समय लिखी गई उनकी किताब “यह देश है वीर जवानों का”, जिसकी प्रस्तावना तत्कालीन रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने लिखी, इस बात का संकेत है कि उनका लेखन केवल आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भी उनकी भागीदारी बनी रही.

आजादी के 75वें वर्ष, जब ‘आजादी का अमृत महोत्सव' की शुरुआत हुई, तभी से रमेशचंद्र झा के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर स्मरण किया जा रहा है. भारत सरकार के वार्षिक कैलेंडर में उनके नाम का शामिल होना इस बात का संकेत है कि उनकी भूमिका को अब व्यापक स्तर पर फिर से पहचाना जा रहा है और वे केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक व्यक्तित्व हैं. रमेशचंद्र झा जी की एक कविता है...

“धारों को देने चला विचार किनारों के
मुट्ठी भर दाहक फूल लिए अंगारों के,
मैं आग भरे पथ का अनमना मुसाफ़िर हूं
निकला उकसाने बुझते दिए मजारों के”

रविकांत ओझा NDTV में डिप्टी एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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