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This Article is From Feb 25, 2026

सरपंच–विधायक मानदेय अंतर; ‘समाजसेवा’ पर सरकारी दलील

Anurag Dwary
  • विचार,
  • Updated:
    फ़रवरी 25, 2026 11:34 am IST
    • Published On फ़रवरी 25, 2026 11:34 am IST
    • Last Updated On फ़रवरी 25, 2026 11:34 am IST
सरपंच–विधायक मानदेय अंतर; ‘समाजसेवा’ पर सरकारी दलील
सरपंच-विधायक मानदेय अंतर; ‘समाजसेवा’ पर सरकारी दलील

मध्यप्रदेश विधानसभा में एक ऐसी सूचना दी गई, जिसे सुनकर गांव के पंच हँसे भी… और फिर थोड़ी देर बाद रोए भी मगर चुपचाप. बताया गया ... सरपंच को 4250 रुपए प्रतिमाह मानदेय मिलता है. और इसमें वृद्धि का कोई प्रस्ताव नहीं है. पंच को प्रति बैठक 300 रुपए. साल भर में अधिकतम 1800 रुपए. अब गांव के पंच रामलाल ने हिसाब लगाया ... “अगर मैं तीन बैठक में जोरदार बहस करूँ, दो बार ‘बिंदु क्रमांक तीन' बोलूँ, और एक बार टेबल थपथपा दूँ… तो कुल 900 रुपए?”

पास बैठे बुद्धिबल्लभ जी बोले ... “भाई, धीरे बोलो… कहीं लोकतंत्र तुम्हारी आवाज़ का अलग से चार्ज न काट ले.” एक पंच ने तो बड़ी मासूमियत से पूछा ... “300 रुपए में क्या मिलता है?” दूसरे ने जवाब दिया ... “दो लीटर पेट्रोल… या तीन किलो टमाटर… या लोकतंत्र में एक दिन की भागीदारी.” तीसरे पंच ने गंभीर होकर कहा ... “भाई, अब अगली बैठक में चाय मैं घर से थर्मस में ले जाऊँगा. 300 में से 20 रुपए बिस्कुट में गए तो घाटा हो जाएगा.” और तभी सरकार का वाक्य गूंजा .. “ये पद स्वेच्छा से समाजसेवा के लिए है, आजीविका के लिए नहीं.” पंचों ने एक-दूसरे को देखा. एक बोला ... “अच्छा… तो हम समाजसेवा कर रहे हैं?” दूसरा बोला ... “हाँ, और माननीय लोग शायद समाजसेवा का प्रीमियम वर्जन चला रहे हैं.”

बुद्धिबल्लभ जी ने निष्कर्ष दिया ... “गांव में लोकतंत्र ‘मिनी पैक' में आता है ... 300 रुपए प्रति बैठक. राजधानी में वही लोकतंत्र ‘फैमिली पैक' में आता है ... लाखों में.” और पंचों ने तय किया ... अब अगली बैठक में एजेंडा यही रहेगा ... “क्या 300 रुपए में हँसना फ्री है… या उस पर भी जीएसटी लगेगा?”

सरकार ने बड़ी करुणा से घोषणा की है ... यानि लोकतंत्र का पहिया अब साइकिल की ट्यूब से चलाया जाएगा ... सरकार ने बड़ी गंभीरता से समझाया भी ... “ये पद स्वेच्छा से समाजसेवा के लिए है, आजीविका के लिए नहीं.” सिर खुजाते बस, यहीं से हमारे बुद्धिबल्लभ जी का चश्मा टेढ़ा हो गया. उन्होंने कहा “अरे भैया, समाजसेवा तो बहुत पवित्र चीज़ है. पर पेट भी कोई अपवित्र चीज़ नहीं है.”

गांव की चौपाल पर सरपंच रामसेवक बैठे थे. चेहरे पर वही भाव, जो बिजली के बिल में ‘अतिरिक्त अधिभार' देखकर आता है ... “4250 रुपए!” उन्होंने धीरे से दोहराया ... “इतने में तो शहर में विधायक जी का एक डिनर का बिल भी पूरा न हो.”

तभी बुद्धिबल्लभ जी ने अखबार निकाला ... समाचार पढ़ा ... “मध्यप्रदेश में विधायकों का वेतन लगभग ₹1.10 लाख से बढ़ाकर ₹1.70 लाख करने का प्रस्ताव. पूर्व विधायकों की पेंशन ₹35,000 से बढ़ाकर ₹58,000-₹65,000 तक.” चौपाल पर सन्नाटा छा गया ... किसी ने पूछा ... “ये बढ़ोतरी भी समाजसेवा के लिए है या आजीविका के लिए?”

समाजसेवा का गणित

  • सरपंच - ₹4250 महीना
  • पंच - ₹1800 सालाना
  • विधायक -  ₹1,70,000 महीना (प्रस्तावित)
  • पूर्व विधायक - ₹58,000 से ₹65,000 पेंशन
  • मुख्यमंत्री - लगभग ₹2.6 लाख
  • कैबिनेट मंत्री - ₹2.2 लाख

अब बुद्धिबल्लभ जी ने बड़ी मासूमियत से पूछा ... “अगर सरपंच का पद आजीविका के लिए नहीं है, तो विधायक का पद किसके लिए है? योग साधना के लिए?” उन्होंने हिसाब लगाया ... सरपंच साल भर में 51,000 रुपए कमाएगा ... उधर विधायक जी एक महीने में 1,70,000 ... यानी समाजसेवा की थोक और खुदरा दरें अलग-अलग हैं.

लोकतंत्र की ‘एमआरपी'

सरकार कहती है ... गांव का पद सेवा है ... शहर का पद शायद सेवा के साथ सर्विस टैक्स भी है. बुद्धिबल्लभ जी बोले ... “समाजसेवा अगर सच में आजीविका नहीं है, तो पहले विधान सभा के दरवाजे पर बोर्ड लगाइए ... ‘यहां कार्यरत सभी माननीय केवल सेवा-भाव से काम करते हैं, वेतन लेना उनकी निजी विवशता है.'” पूर्व विधायक की पेंशन ... पूर्व विधायक की पेंशन 58-65 हजार! गांव का शिक्षक रिटायर होकर इतना नहीं पाता ... पर लोकतंत्र में प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं. जो पांच साल जनता को संभाले, उसे आजीवन संभालना जनता का कर्तव्य है.

बुद्धिबल्लभ जी ने तंज कसा ... “सरपंच अगर सेवा के लिए है, तो विधायक भी सेवा के लिए है. फर्क बस इतना है कि गांव की सेवा सूती कुर्ते में होती है, और शहर की सेवा सिलवाया हुआ बंदगला पहनकर.”

बुद्धिबल्लभ जी ने कहा  ... ये लोकतंत्र का ‘लाइफटाइम सर्विस पैकेज' है. पांच साल जनता को समझाइए, फिर जनता जिंदगी भर आपको समझेगी. गांव का सरपंच पांच साल बाद फिर खेत में लौट जाता है. विधायक पांच साल बाद पेंशन में प्रवेश करता है. हमारे यहां समाजसेवा दो तरह की होती है ... स्वेच्छा वाली सेवा ... जिसमें मानदेय कम, उपदेश ज़्यादा. माननीय वाली सेवा ...  जिसमें मानदेय ज़्यादा, उपदेश कम.

सरकार ने साफ कर दिया ... “गांव के पद आजीविका नहीं हैं.”

तो क्या विधायक का पद आजीविका है? या फिर वह भी सेवा है, बस सेवा के साथ सुविधा पैकेज जुड़ा हुआ है? बुद्धिबल्लभ जी अब चुप हो गए हैं ... उन्होंने अखबार तह किया और कहा ... “लोकतंत्र में सबसे सस्ती चीज़ अगर कोई है, तो वह है समाजसेवा. और सबसे महंगी चीज़ है ... माननीयता.” अब आप तय कीजिए ... कौन सेवा कर रहा है, और कौन सेवा का बिल बना रहा है. क्योंकि गांव में समाजसेवा 4250 रुपए में आती है ... और राजधानी में वही सेवा 1,70,000 रुपए में. गांव में सेवा भाव का मतलब है ... साइकिल से आओ, पंचायत भवन में पंखा खुद चलाओ, और महीने के अंत में 4250 रुपए से लोकतंत्र को जिंदा रखो. राजधानी में सेवा भाव का मतलब है ... कार से आओ, माइक्रोफोन से बोलो, और महीने के अंत में 1.70 लाख लेकर लोकतंत्र को धन्यवाद कहो. लोकतंत्र आखिर ‘जनता का' है ... बस दरें अलग-अलग हैं. बुद्धिबल्लभ जी आजकल चुप रहते हैं ... कहते हैं ... “लोकतंत्र में सवाल पूछना भी समाजसेवा है. बस उसका मानदेय अभी तय नहीं हुआ है.”

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