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This Article is From Jan 26, 2026

UGC Act 2026: विश्वविद्यालय केवल नियमों का पालन करने की जगह बन गए तो ज्ञान का निर्माण नहीं कर पाएंगे

Dr Ananya Mishra
  • विचार,
  • Updated:
    जनवरी 26, 2026 20:36 pm IST
    • Published On जनवरी 26, 2026 20:35 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 26, 2026 20:36 pm IST
UGC Act 2026: विश्वविद्यालय केवल नियमों का पालन करने की जगह बन गए तो ज्ञान का निर्माण नहीं कर पाएंगे

UGC Act 2026: भारत में उच्च शिक्षा का इतिहास केवल पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहा है; बल्कि यह विचारों की टकराहट, असहमति के साहस और गुरु-शिष्य संवाद की परंपरा का मिश्रण रहा है. लेकिन हाल के वर्षों में, और विशेषकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े हालिया विवाद के संदर्भ में, एक गहरा प्रश्न उभर कर सामने आया है कि क्या भारतीय विश्वविद्यालय धीरे-धीरे ज्ञान के केंद्र से ‘अनुपालन के केंद्र' में बदलते जा रहे हैं?

आज देश में 1300 से अधिक विश्वविद्यालय और 50 हज़ार से ज़्यादा महाविद्यालय हैं, जिनमें 4 करोड़ से अधिक छात्र अध्ययनरत हैं. इतने विशाल तंत्र को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए नियमन आवश्यक है, इसमें कोई विवाद नहीं. किंतु प्रश्न यह है कि नियमन कहां तक मार्गदर्शक है और कहां से वह शैक्षणिक स्वतंत्रता पर बोझ बनने लगता है. हालिया विवाद से लेकर शिक्षक, छात्र और प्रशासक समान रूप से असहज दिखाई दे रहे हैं.

इस असहजता की जड़ केवल किसी एक प्रावधान में नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति में है. पिछले एक दशक में भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में नियमों, समितियों, अनुपालन रिपोर्टों और निगरानी तंत्रों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद भी विश्वविद्यालयों पर अकादमिक नवाचार के साथ-साथ प्रशासनिक उत्तरदायित्व का भार बढ़ा है. अनेक राज्य विश्वविद्यालयों में पहले से ही 30 से 40 प्रतिशत तक शिक्षकों के पद रिक्त हैं, लेकिन उपलब्ध शिक्षकों से अपेक्षा की जा रही है कि वे पढ़ाने के साथ-साथ दर्जनों नियामक प्रक्रियाओं का पालन भी करें. ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न है कि शिक्षण और शोध के लिए समय कहां बचेगा?

इस पृष्ठभूमि में दूसरा, और कहीं अधिक जटिल प्रश्न सामने आता है कि क्या भारत बिना संदर्भ बदले, पश्चिमी विश्वविद्यालयी मॉडलों को अपनाने की कोशिश कर रहा है? समानता, समावेशन और उत्पीड़न-निरोध जैसे सिद्धांत पश्चिमी विश्वविद्यालयों में दशकों के सामाजिक संघर्ष और संस्थागत परिपक्वता के बाद विकसित हुए हैं. वहां की कैंपस संस्कृति, न्यायिक प्रक्रिया और सामाजिक व्यवहार एक विशेष ऐतिहासिक संदर्भ में ढले हैं. भारत में, जहां विश्वविद्यालय अक्सर सामाजिक विविधताओं, संसाधन-अभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप से जूझते हैं, उन्हीं मॉडलों को उसी संरचना में लागू करना कई बार व्यावहारिक संकट उत्पन्न करता है.

यह समस्या केवल सैद्धांतिक नहीं है. हाल के वर्षों में अनेक शिक्षकों ने यह चिंता व्यक्त की है कि विश्वविद्यालय परिसरों में भय और आत्म-संयम का वातावरण पनप रहा है. अनौपचारिक संवाद, मुक्त बहस और व्यक्तिगत मार्गदर्शन – जो कभी भारतीय उच्च शिक्षा की आत्मा हुआ करते थे, अब औपचारिकता और दस्तावेज़ीकरण के दबाव में सिमटते जा रहे हैं. शिक्षक कक्षा से बाहर संवाद करने में संकोच करने लगे हैं, और विद्यार्थी प्रश्न पूछने से पहले परिणामों पर विचार करने लगे हैं. यह स्थिति किसी एक नियम की देन नहीं, बल्कि अत्यधिक नियमन की संस्कृति का परिणाम है.

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रश्न सुरक्षा या समावेशन के विरोध का नहीं है. भारतीय विश्वविद्यालयों में भेदभाव और उत्पीड़न के वास्तविक मामले मौजूद हैं और उनके समाधान के लिए मजबूत संस्थागत तंत्र अनिवार्य हैं. किंतु किसी भी नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह विश्वास पर आधारित है या अविश्वास पर. जब नियमन यह मानकर बनाया जाए कि हर संवाद संभावित अपराध है और हर संबंध संभावित उल्लंघन, तब शिक्षा का वातावरण स्वाभाविक रूप से संकुचित हो जाता है.

अंतरराष्ट्रीय तुलना भी यही संकेत देती है. जिन देशों में विश्वविद्यालयी स्वायत्तता अधिक है, वहां अकादमिक उत्कृष्टता और नवाचार भी अधिक दिखाई देते हैं. भारत में, इसके विपरीत, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समय के साथ घटती प्रतीत होती है. केंद्रीय नियामक संस्थाओं का प्रभाव बढ़ा है, जबकि राज्य विश्वविद्यालयों और स्थानीय अकादमिक परिषदों की भूमिका सीमित होती जा रही है. यह प्रवृत्ति संघीय ढांचे और शिक्षा के विकेंद्रीकरण, दोनों के लिए चिंता का विषय है.

इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू शायद यह है कि विद्यार्थी, जो इस तंत्र के केंद्र में होने चाहिए, अक्सर सबसे अधिक भ्रम और अनिश्चितता का सामना करते हैं. जब विश्वविद्यालय नीति-विवादों और प्रशासनिक तनावों में उलझे रहते हैं, तब शिक्षण की गुणवत्ता, शोध की दिशा और अकादमिक निरंतरता प्रभावित होती है. वे न तो पूरी तरह संरक्षित महसूस करते हैं, न ही पूरी तरह स्वतंत्र.

प्रश्न यह नहीं है कि नियमन चाहिए या नहीं. प्रश्न यह है कि कैसा नियमन? क्या ऐसा नियमन जो विश्वविद्यालयों को केवल अनुपालन करने वाली संस्थाएं बना दे, या ऐसा नियमन जो उन्हें आत्म-मूल्यांकन, संवाद और सुधार की स्वतंत्रता दे? क्या हम शिक्षा को शासन का विषय मान रहे हैं, या ज्ञान-निर्माण की जीवंत प्रक्रिया?

वर्तमान विवाद इसी बड़े विमर्श का संकेत है. यह अवसर है पुनर्विचार का. यदि भारत को ज्ञान-आधारित वैश्विक शक्ति बनना है, तो उसे ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जो सुरक्षित भी हों और स्वतंत्र भी; समावेशी भी हों और सशक्त भी. इसके लिए नियमन आवश्यक है, पर उससे अधिक आवश्यक है विश्वास, संदर्भ-संवेदनशीलता और अकादमिक विवेक. यदि विश्वविद्यालय केवल नियमों का पालन करने की जगह बन गए, तो वे ज्ञान का निर्माण नहीं कर पाएंगे. और यदि वे ज्ञान का निर्माण नहीं करेंगे, तो राष्ट्र का भविष्य केवल काग़ज़ों में सुरक्षित रहेगा, विचारों में नहीं.

डॉ. अनन्या मिश्र, लेखिका, कम्युनिकेशन एवं ब्रांडिंग सलाहकार

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं.

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