Uniform Civil Code Drafting Committee in Madhya Pradesh : मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में समान नागरिक संहिता (UCC) को धरातल पर उतारने की कवायद ने अब रफ्तार पकड़ ली है. इसी कड़ी में राजधानी भोपाल में यूसीसी ड्राफ्टिंग कमेटी की एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील बैठक आयोजित की गई. इस बैठक का मुख्य उद्देश्य कानून का मसौदा तैयार करने से पहले समाज के हर वर्ग की राय जानना था. बैठक में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरु, सामाजिक संगठन और राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को आमंत्रित किया गया था.
बैठक में अल्पसंख्यकों और विशेषकर मुस्लिम समाज की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली. भोपाल के शहर काजी ने यूसीसी के कई प्रस्तावित ड्राफ्ट पर अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई. शहर काजी का स्पष्ट कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ पूरी तरह से पवित्र कुरान और हदीस के मुताबिक संचालित होता है. इसलिए इसमें किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप या बदलाव उन्हें कतई स्वीकार्य नहीं होगा.
लिवइन रिलेशनशिप पर एक हुए हिंदू और मुस्लिम संगठन
दिलचस्प बात यह रही कि जहां कई मुद्दों पर हिंदू और मुस्लिम संगठनों की राय अलग-अलग थी. वहीं, लिवइन रिलेशनशिप के मुद्दे पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों के सुर एक जैसे नजर आए. मुस्लिम समाज की ओर से शहर काजी ने लिवइन से जुड़े प्रावधानों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में सिर्फ 'विवाह' की संस्था को सामाजिक और कानूनी मान्यता प्राप्त है. अवैध या बिना शादी के संबंधों को नहीं. उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर देश के मूल निवासी आदिवासियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जा रहा है, तो फिर इसे 'समान' नागरिक संहिता कैसे कहा जा सकता है? बैठक में मौजूद हिंदू संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी सुर में सुर मिलाते हुए साफ कहा कि लिवइन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधानों को यूसीसी के फाइनल ड्राफ्ट से पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह हमारी पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था को कमजोर करता है. वहीं, ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों ने इस कानून का स्वागत किया. उनका कहना था कि उनके अधिकांश नियम पहले से ही इस आधुनिक व्यवस्था के अनुकूल हैं, हालांकि उन्होंने बच्चा गोद लेने और लिवइन को लेकर समिति को कुछ व्यावहारिक सुझाव भी दिए.
जुलाई में आ सकता है बिल
जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली यह उच्च स्तरीय समिति अब इन सभी सुझावों और आपत्तियों का अध्ययन कर रही है. सूत्रों की मानें तो कमेटी बहुत जल्द अपना फाइनल ड्राफ्ट मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार को सौंपने जा रही है. दरअसल, मध्य प्रदेश सरकार की तैयारी बेहद पुख्ता है और सरकार जुलाई में होने वाले विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में ही 'यूसीसी बिल' को सदन के पटल पर पेश कर इसे अमलीजामा पहनाने की पूरी कोशिश में है. अगर ऐसा होता है, तो उत्तराखंड के बाद मध्य प्रदेश देश का ऐसा अगला बड़ा राज्य बन जाएगा, जहां समान नागरिक संहिता लागू होगी.
कांग्रेस ने बनाई बैठक से दूरी
हालांकि, इस पूरे मामले पर सूबे की सियासत भी गरमाई नजर आई. ड्राफ्टिंग कमेटी ने सर्वदलीय रायशुमारी के लिए सभी राजनीतिक दलों को न्योता भेजा था, लेकिन बैठक में सिर्फ दो दलों के प्रतिनिधि ही पहुंचे. यूसीसी का खुलकर विरोध कर रही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता या प्रतिनिधि इस बैठक में शामिल नहीं हुआ, जिसने इस मुद्दे पर राजनीतिक विभाजन को एक बार फिर साफ कर दिया. भोपाल जिले की इस बैठक में कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद निजी हैसियत से पहुंचे. उनके अलावा, बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा और विधायक भगवानदास सबनानी जैसे चेहरे मौजूद रहे.
भाजपा ने सौंपे कई बड़े सुझाव
सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति के सामने सत्तारूढ़ दल बीजेपी ने अपने 9 सबसे प्रमुख और कड़े सुझाव रखे. पार्टी का पूरा जोर लैंगिक समानता और महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा पर रहा. बीजेपी द्वारा दिए गए मुख्य सुझाव इस प्रकार हैं.
शादी और उम्र पर कड़ाई
सभी धर्मों में शादी की न्यूनतम कानूनी उम्र का सख्ती से पालन हो, बाल विवाह करने वालों पर कठोरतम कार्रवाई की जाए और हर शादी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो.
प्रॉपर्टी में बराबर का अधिकार
बेटे और बेटी को पैतृक (Ancestral) और खुद से अर्जित की गई संपत्ति में बिल्कुल समान अधिकार मिले. साथ ही पति या पत्नी की मौत के बाद जीवित जीवनसाथी के संपत्ति अधिकारों को पूरी तरह सुरक्षित किया जाए.
तलाक के बाद 50% की हिस्सेदारी
एक बेहद अहम सुझाव में बीजेपी ने कहा कि शादी के बाद अर्जित की गई कुल संपत्ति पर पति और पत्नी दोनों का 50-50 प्रतिशत तक होना चाहिए, ताकि घर संभालने वाली महिलाओं को मजबूत आर्थिक सुरक्षा मिल सके.
गोद लेने का समान अधिकार
बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सभी को बच्चा गोद लेने का हक मिले और उस बच्चे को सगे बच्चे के बराबर ही परिवार और जायदाद में कानूनी अधिकार प्राप्त हों.
नेशनल डिजिटल पोर्टल और फास्ट ट्रैक कोर्ट
शादी, तलाक, गोद लेने और वसीयत के प्रमाणीकरण के लिए एक देशव्यापी डिजिटल पोर्टल बने, जहां शादी के तुरंत बाद डिजिटल सर्टिफिकेट जारी हो. पारिवारिक विवादों को निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनें, जो 6 महीने के भीतर फैसला सुनाएं.
भरण पोषण और एनआरआई शादियां
तलाक के बाद पत्नी, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता के गुजारे के लिए एक न्यायसंगत कानून बने. इसके अलावा, यदि कोई एनआरआई (NRI) भारत में शादी करता है, तो 7 दिनों के भीतर उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो, ताकि शादी के बाद लड़कियों को विदेश में लावारिस छोड़ने जैसी धोखाधड़ी पर रोक लगे.