Bhopal Gas Tragedy 1984: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy ) से जुड़े यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करने से सोमवार को इनकार कर दिया. अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति को राहत के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख करने की सलाह दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला उस याचिका पर दिया, जिसमें यूनियन कार्बाइड के कचरे को जलाने के बाद बची राख से पारे के संभावित रिसाव को लेकर चिंता जताई गई थी.
हाईकोर्ट की निगरानी में चल रहा है मामला
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह मामला पिछले करीब दो दशकों से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की निगरानी में चल रहा है. इसलिए इस विषय से जुड़ी सामग्री और साक्ष्यों के साथ वहीं आवेदन दायर करना अधिक उचित होगा. पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता यदि भविष्य में पारे के रिसाव से संबंधित कोई नई सामग्री प्रस्तुत करना चाहता है, तो वह हाईकोर्ट में आवेदन कर सकता है. अदालत ने यह भी उम्मीद जताई कि हाईकोर्ट इस मुद्दे पर जल्द विचार करेगा.
पारे के रिसाव को लेकर जताई गई थी आशंका
याचिका में दावा किया गया था कि यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे को जलाने के बाद बची राख में पारे की बड़ी मात्रा मौजूद हो सकती है. इससे आसपास के भूजल और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई थी. याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील में डॉ. आसिफ कुरैशी की एक रिपोर्ट का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि ट्रायल रन के दौरान पारे की सही मात्रा मापने के लिए उचित पद्धति का इस्तेमाल नहीं किया गया. इसके कारण वास्तविक मात्रा का पता नहीं चल पाया.
विशेषज्ञों की राय में मतभेद
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने अदालत को बताया कि वर्ष 2015 में मिट्टी के अवशेष में लगभग 15 किलोग्राम पारा पाया गया था. इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर कचरे को जलाया गया. हालांकि, बाद में आई नई रिपोर्ट में दावा किया गया कि अवशेष में पारा नहीं मिला. इसी विरोधाभास को लेकर याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाए थे.
तकनीकी मामलों में अदालत की सीमाएं
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची ने कहा कि विशेषज्ञ समिति और याचिकाकर्ता के विशेषज्ञ की राय अलग-अलग है. ऐसे तकनीकी मुद्दों पर अदालत स्वयं टिप्पणी नहीं कर सकती. उन्होंने कहा कि यदि परीक्षण की पद्धति को लेकर कोई आपत्ति है, तो पहले विशेषज्ञ समिति को उसका जवाब देना चाहिए. इस पूरी प्रक्रिया पर विचार हाईकोर्ट के समक्ष होना अधिक उचित होगा.
अवशेष की जांच की मांग भी खारिज
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उस मांग को भी ठुकरा दिया, जिसमें अवशेष वाली कंक्रीट की पेटियों को खोलकर पारे की जांच कराने का आदेश देने की बात कही गई थी. याचिका में यह भी उल्लेख किया गया था कि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 2024 में एक नोटिस जारी कर आरोप लगाया था कि पिथमपुर स्थित ट्रीटमेंट, स्टोरेज और डिस्पोजल सुविधा से जहरीले तत्व भूजल में रिस रहे हैं. बताया गया था कि यह रिसाव मानव बस्तियों से करीब 50 मीटर की दूरी तक पाया गया.
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इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2015 की रिपोर्ट में यूनियन कार्बाइड के कचरे में पारे की पर्याप्त मात्रा मिलने की बात कही गई थी, जबकि वर्ष 2025 की ट्रायल रिपोर्ट में “पारा नहीं मिला” बताया गया, जिस पर याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाए थे.
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