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This Article is From Jan 11, 2024

Rewa : रामायणकाल का राजवृक्ष 'कोविदार' अंकित ध्वज अयोध्या में लगेगा, रीवा के इस शख्स ने ऐसे खोज निकाला

MP News: अयोध्या के शोध संस्थान के ग्लोबल एनसाइक्लोपीडिया आफ रामायण के दिल्ली विभाग से जुड़े ललित ने कोविदार को खोज निकाला है. जिसे अब निर्माणाधीन राम मंदिर के प्रांगण में संरक्षित किया जा रहा है.

Rewa : रामायणकाल का राजवृक्ष 'कोविदार' अंकित ध्वज अयोध्या में लगेगा, रीवा के इस शख्स ने ऐसे खोज निकाला

Ayodhya Shri Ram Temple:  रीवा (Rewa) के ललित ने रामायण काल के उस राजवृक्ष 'कोविदार' को खोज निकाला है. जिसका चिन्ह रघुकुल काल में अयोध्या (Ayodhya) के ध्वज में था. अब इस कोविदार वृक्ष की मदद से एक बार फिर से रघुकुल काल का अयोध्या का ध्वज तैयार कर इसे अयोध्या में लगाया जाएगा. 

 ललित को बाकायदा इसके लिए अनुमति मिल गई है. अब रीवा से 100 ऐसे राजध्वज लाने की अनुमति भी मांगी गई है. माना जा रहा है कि 1-2 दिनों में यह अनुमति मिल सकती है. यदि ऐसा हुआ, तो रीवा से ऐसे 100 राज ध्वज को अयोध्या भेजा जाएगा. 

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राम मंदिर के प्रांगण में संरक्षित किया जाएगा

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा में अशोक चक्र है. वैसे ही रघुकुल काल के त्रेता युग में महाराज दशरथ की अयोध्या का भी एक राष्ट्रध्वज हुआ करता था, जिसमें कोविदार का वृक्ष अंकित था. बदलते वक्त के साथ कोविदार का अस्तित्व भी खत्म हो गया, लेकिन एक बार फिर से अयोध्या का नव निर्माण हो रहा है, जिसके चलते एक इतिहासकार अयोध्या के शोध संस्थान के ग्लोबल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रामायण (Global Encyclopedia of Ramayana) के दिल्ली विभाग से जुड़े ललित ने कोविदार को खोज निकाला है, जिसे अब निर्माणाधीन राम मंदिर के प्रांगण में संरक्षित किया जा रहा है.

ऐसे की कोविदार की खोज 

अयोध्या के प्राचीन ध्वज और उस पर रिसर्च करने वाले ललित, अयोध्या शोध संस्थान के लिए मेवाड़ के महाराणाओं  की ओर से निर्मित कराई गई चित्रमय़ रामायण  (Ramayan) पर राजस्थान के मेवाड़ में शोध कर रहे थे. महाराणा प्रताप के तीसरी पीढ़ी के महाराणा जगत सिंह ने रामायण की हर एक कहानी पर मेवाड़ में चित्र बनवाए थे. एक चित्र में ललित को ध्वज नजर आया. जिसमें भरत सवार थे, ललित बताते हैं कि इस बात का वर्णन वाल्मीकि रामायण (Valmiki Ramayana) के अयोध्या कांड में भी मिलता है, जिसमें सेना सहित भरत, राम से अयोध्या (Ayodhya) वापस लौटने की प्रार्थना करने के लिए चित्रकूट (Chitrakoot) जा रहे थे, जिसे लक्ष्मण ने अयोध्या के ध्वज पर कोविदार वृक्ष के निशान को देखकर दूर से ही पहचान लिया था.

मंदिर प्रांगण में लगाया जाएगा

ललित मिश्र, प्राचीन ध्वजों के इतिहास पर पूर्व में ही रिसर्च कर चुके थे. कोविदार का प्रसंग आते ही, उन्होंने अयोध्या के प्राचीन ध्वज का ऐतिहासिक महत्व तुरंत समझ लिया और मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र  के सामने रखा, जिनके निर्देश पर प्रक्रिया का पालन करते हुए एक्स्पर्ट्स के सामने प्रजेंट किया गया. इसके बाद निर्णय लिया गया कि कोविदार वृक्ष को मंदिर प्रांगण में लगाया जाएगा, जिसकी प्रक्रिया भी 23 दिसंबर से अयोध्या के नव निर्माण हो रहे, मुख्य मंदिर में प्रारंभ कर दी गई है. 

रीवा से भेजने की है तैयारी 

मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा से अनुमति मिलने के बाद कोविदार  के वृक्षारोपण के लिए उन्होंने अयोध्या जाकर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव  चंपत राय के सामने अपनी शोध एवं झंडे का प्रारूप रखा. यह भी प्रस्तावित किया कि रीवा से 100 ऐसे राज ध्वज उन्हें लाने की अनुमति प्रदान की जाए, जिन्हें मंदिर में लगाया जाएगा,  22 जनवरी के दिन रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान . ललित को उम्मीद है कि उन्हें एक-दो दिन में इसकी अनुमति मिल जाएगी.

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इसकी तीन प्रजातियां हैं 

ललित बताते हैं कि प्राचीन पौराणिक काल से ही कोविदार अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है,इसका पहली बार उल्लेख ऋषि कश्यप एवं अदिति के संवाद में प्राप्त होता है . पौराणिक गाथाओं के अनुसार, कश्यप ऋषि ने कचनार के वृक्ष में मदार के गुणों को मिलाकर कोविदार वृक्ष का निर्माण किया था. इसकी तीन प्रजातियां पाई जाती हैं, कचनार ,श्वेत कंचन और कोविदार. कचनार का Botanical नाम  Bauhinia Variegata linn तथा कोविदार का  Botanical नाम Bauhinia purpurea linn होता है. श्रीमद्भागवत पुराण में भी महत्वपूर्ण वृक्षों की सूची में कोविदार वृक्ष शामिल रहा है. कचनार तो आमतौर पर सभी जगह मिल जाएगा लेकिन कोविदार आपको जल्दी कहीं नहीं मिलेगा. रीवा के विवेकानंद पार्क में इसकी तीनों प्रजातियां मौजूद हैं. जो अपने आप में बड़ी बात है. ऐसा माना जा रहा है कि किसी जमाने में किसी बड़े जानकार ने इसको यहां पर रोपा होगा, जो आज बदलते वक्त के साथ पुराने वृक्ष के रूप में तब्दील हो गया है.

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