मध्य प्रदेश के बुरहानपुर की नेपानगर विधानसभा के क्षेत्र के आदिवासी बाहुल्य धूलकोट क्षेत्र में रंगपंचमी के मौके पर हर वर्ष मनाया जाने वाला पारंपरिक झेंडा उत्सव इस बार भी पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया. इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए न केवल धुलकोट गांव, बल्कि आसपास के कई गांवों से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे. दिनभर रंगपंचमी के रंगों में सराबोर रहने के बाद शाम के समय गांव में यह विशेष आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी ने उत्सव को और भी रोचक बना दिया.
दरअसल, यहां रंगपंचमी के दिन सुबह से ही गांव में त्योहार का माहौल दिखाई देता है. ग्रामीण एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर पर्व की शुभकामनाएं देते हैं. इसके बाद शाम होते ही ग्राम पंचायत प्रांगण में गांव के महिला-पुरुष और बुजुर्ग एकत्रित होते हैं. यहीं पर वर्षों से चली आ रही झेंडा उत्सव की परंपरा का आयोजन किया जाता है. कार्यक्रम की शुरुआत गांव के पटेल और समाज के वरिष्ठ जनों द्वारा की जाती है. गांव के पटेल द्वारा करीब सात फीट लंबी एक लकड़ी को जमीन में गाड़ा जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में झेंडा कहा जाता है. झेंडा गाड़ने के बाद गांव के बुजुर्गों द्वारा विधि-विधान से उसकी पूजा की जाती है. पूजा के बाद गांव की महिलाएं झेंडे के चारों ओर सात बार परिक्रमा लगाती हैं.
ऐसे होता है पूरा कार्यक्रम
यह परिक्रमा गांव की परंपरा और आस्था का प्रतीक मानी जाती है. इसके बाद शुरू होती है झेंडा उत्सव की सबसे रोमांचक और अनोखी परंपरा. इसमें गांव के ग्यारह पुरुषों की एक टोली बनाई जाती है. इन पुरुषों के हाथों में लकड़ी की गेड़ियां होती हैं, जिनका उपयोग वे महिलाओं की मार से बचने के लिए करते हैं. पुरुषों की यह टोली करीब पचास मीटर दूर से दौड़ते हुए झेंडे तक पहुंचने का प्रयास करती है. उनके हाथ में लाल कपड़े में बंधा हुआ नारियल होता है, जिसे झेंडे के ऊपर बांधना उनका लक्ष्य होता है. लेकिन पुरुषों के लिए यह कार्य आसान नहीं होता. जैसे ही पुरुष झेंडे की ओर दौड़ते हैं, गांव की महिलाएं हरी लकड़ियां लेकर उन्हें रोकने के लिए दौड़ पड़ती हैं और पुरुषों को मारते हुए झेंडे तक पहुंचने से रोकने का प्रयास करती हैं. महिलाएं पूरी ताकत से पुरुषों को पीटती हैं, ताकि वे झेंडे पर नारियल न बांध सकें. इस दौरान पूरा माहौल हंसी-मजाक, उत्साह और रोमांच से भर जाता है और आसपास खड़े ग्रामीण इस अनोखे दृश्य का आनंद लेते हैं.
लोगों में ये है मान्यता
पुरुषों की टोली झेंडे पर नारियल बांधने का प्रयास कुल पांच बार करती है. हर बार महिलाओं की मार और रोकटोक के कारण पुरुषों को काफी संघर्ष करना पड़ता है. अंत में परंपरा के अनुसार पुरुषों की टोली झेंडे को जमीन से उखाड़ने में सफल हो जाती है और इसे पुरुषों की जीत माना जाता है. इस जीत के साथ ही झेंडा उत्सव का समापन होता है और गांव में खुशी का माहौल बन जाता है. गांव की परंपरा के अनुसार महिलाओं द्वारा पुरुषों पर लकड़ी से जितने वार किए जाते हैं, उसे शुभ माना जाता है. ग्रामीणों का मानना है कि महिलाओं के इन वारों से पुरुषों की उम्र बढ़ती है और उनके जीवन में खुशहाली आती है. इसी विश्वास के चलते पुरुष भी हंसी-मजाक के साथ इस परंपरा में भाग लेते हैं.
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धूलकोट का यह झेंडा उत्सव क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. हर साल रंगपंचमी पर आयोजित होने वाली इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है और आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. झेंडा उत्सव न केवल मनोरंजन और उत्साह का प्रतीक है, बल्कि यह गांव की सामाजिक एकता और परंपराओं को जीवित रखने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है. यही कारण है कि हर वर्ष रंगपंचमी पर धुलकोट में यह अनोखा आयोजन पूरे धूमधाम और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है.
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