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This Article is From Jan 20, 2026

महाभारत समागम के मंच पर अंधायुग का आखिरी संवाद: 'और भीगती आंखों का मौन'

Mahabharata Samagam: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के भारत भवन में देश का सबसे बड़ा महाभारत समागम का आयोजन किया गया है, जिसका शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया है. इसमें अंधायुग की महागाथा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया.

महाभारत समागम के मंच पर अंधायुग का आखिरी संवाद: 'और भीगती आंखों का मौन'

Mahabharata Samagam: जब अंधायुग का आख़िरी संवाद मंच पर ठिठक कर ठहरा, तो वह केवल नाटक का अंत नहीं था... वह मनुष्य के भीतर बसे युद्ध का स्वीकार था. सभागार में मौन था, पर वह मौन बोल रहा था. आंखें बरबस भीग गईं, क्योंकि मंच पर कोई पात्र नहीं, स्वयं मनुष्य खड़ा था अपने कर्मों, अपने अपराधबोध और अपने अधूरे प्रश्नों के साथ. जो शताब्दियों का बोझ था, दर्शक के मन पर आकर ठहर गया.

जब कृष्ण गांधारी से कहते हैं ...“प्रभु हूं या परात्पर…
पर पुत्र हूं तुम्हारा, तुम माता हो
मैंने अर्जुन से कहा
सारे तुम्हारे कर्मों का पाप पुण्य, योगक्षेम
मैं वहन करूंगा अपने कंधों पर
अठ्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूं करोड़ों बार
जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ
कोई नहीं था
मैं ही था”

यह पंक्तियां जैसे कृष्ण के मुख से नहीं, बल्कि समय के कंठ से निकलीं. धर्मवीर भारती की रचना में जो पीड़ा शब्दों के बीच धड़कती है. वह इस मंचन में देह बनकर सामने आई. अठारह दिनों के संग्राम में “कोई नहीं, केवल मैं ही मरा हूं” यह वाक्य युद्ध की विभीषिका नहीं, बल्कि मनुष्य की सामूहिक नैतिक मृत्यु का बयान बन गया.

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अंधायुग को साइको-फिजिकल शैली में किया गया प्रस्तुत

वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित महाभारत समागम के पांचवें दिन, मणिपुर की ट्रेजर आर्ट एसोसिएशन ने निर्देशक जॉय मैस्नम के नेतृत्व में अंधायुग को जिस साइको-फिजिकल शैली में प्रस्तुत किया, वो दृश्य कम और अनुभूति अधिक थी. संवादों की मितव्ययिता, शरीर की भाषा और मौन की धार सब मिलकर एक ऐसा अंधकार रचते हैं, जिसमें दर्शक स्वयं अपना चेहरा टटोलने लगता है. जॉय का निर्देशन भारती के शब्दों पर हावी नहीं होता, बल्कि उन्हें सांस लेने देता है. मंच पर अंधेरा केवल दृश्य नहीं, विचार बनकर उतरता है.

गहरे में उतार देता मोहन जोशी का ये संगीत

गांधारी की दृष्टिहीनता केवल आंखों की नहीं रही, वह सत्ता की नैतिक अंधता बन गई. धृतराष्ट्र का विलाप व्यक्तिगत नहीं, एक पूरे तंत्र की पराजय था. अश्वत्थामा प्रतिशोध का चेहरा नहीं, घायल विवेक का प्रतीक बनकर उभरा... मोहन जोशी का संगीत कहीं सहारा देता है तो कहीं और गहरे में उतार देता है, जैसे पीड़ा की संगत. कभी करुण, कभी भयावह, कभी बिल्कुल निर्वाक... गांधारी के रूप में साजिदा का अभिनय बंद आंखों से खुद को टोहता है.

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इस समागम में प्रस्तुत अन्य नाट्य-रूप भी महाभारत की बहुस्तरीयता को अलग-अलग सुरों में छूते हैं.

‘जय' नामक रॉक म्यूजिकल ने युधिष्ठिर की दृष्टि से धर्म, निर्णय और नियति के प्रश्नों को समकालीन ऊर्जा के साथ रखा. रॉक संगीत, मंत्रोच्चार और नृत्य शैलियों का संगम यह पूछता है कि आज के समय में सत्य किसके पक्ष में खड़ा है. वहीं ‘अभिमन्यु वध' की पुरुलिया छाऊ प्रस्तुति में शब्द गौण और देह प्रधान रही. चक्रव्यूह में घिरे युवा वीर का संघर्ष केवल युद्ध नहीं, अन्याय के सामने अकेले खड़े होने की करुण गाथा बन गया.

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युद्ध कभी समाप्त नहीं होता...

अंधायुग का यह मंचन हमें यह एहसास कराता है कि युद्ध कभी समाप्त नहीं होता वह केवल मैदान बदलता है और जैसा भारती ने कहा था, 'विजेता कोई नहीं होता.. हारता है मनुष्य हर बार, बार-बार...' वैश्विक सभ्यताओं के संघर्ष और औदार्य की महागाथा महाभारत पर केंद्रित देश के पहले और अब तक के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन का शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 16 जनवरी को किया था...

भोपाल के भारत भवन में 16 से 24 जनवरी 2026 तक भारत के साथ इंडोनेशिया, श्रीलंका, जापान के प्रतिष्ठित नाट्य समूह अपनी-अपनी प्रस्तुतियां देंगे.

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