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Devdutt Pattanaik: "आज शंका करें तो एंटी नेशनल..." मायथोलॉजी के पीछे का तर्क... विश्वरंग में देवदत्त पटनायक

Devdutt Pattanaik: भोपाल में आयोजित विश्वरंग में देवदत्त पटनायक ने कहा कि "पहले के जमाने में शास्त्रार्थ होते थे, जिसका मतलब होता था शास्त्रों का अर्थ निकलना. जबकि, टीवी पर और हमारे सीरियल्स में शास्त्रार्थ को सिर्फ बहस और अहंकार की लड़ाई की तरह दिखाते हैं.

Devdutt Pattanaik: "आज शंका करें तो एंटी नेशनल..." मायथोलॉजी के पीछे का तर्क... विश्वरंग में देवदत्त पटनायक
Devdutt Pattanaik: "आज शंका करें तो एंटी नेशनल..." मायथोलॉजी के पीछे का तर्क... विश्वरंग में देवदत्त पटनायक

Devdutt Pattanaik: रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विश्वरंग 2025 के तीसरे और अंतिम दिन देवदत्त पटनायक भी शामिल हुए. उन्होंने माइथोलॉजी पर बात करते हुए कहा कि "मैं जब भी पौराणिक कथाओं पर बात करता हूं, टी9 एक शब्द का इस्तेमाल करता हूं मायथोलॉजी, और लोग मुझसे गुस्सा हो जाते हैं. लेकिन, क्या आपको पता है, जब तक आप उत्तेजित नहीं होंगे तो सरस्वती नहीं आएंगी. बहुत से लोग मानते हैं कि मायथोलॉजी शब्द मिथ्या से बना है, जो गलत है. संस्कृति में मिथ्या का मतलब incomplete truth. जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य.... मिथ्या असल में सच और झूठ से बिल्कुल अलग अधूरा सच है. आज हर आदमी के पास अपनी दुनिया का ज्ञान तो है, मगर संपूर्ण ज्ञान नहीं है. संपूर्ण ज्ञानी सिर्फ ईश्वर है. जबकि, मायथोलॉजी शब्द आया है ग्रीक के माइथोज से , यानि आख्यान."

अपनी-अपनी माइथोलॉजी

दुनिया की हर संस्कृति  सभ्यता का अपना अलग आख्यान है  चीन, जापान, वियतनाम की अपनी अपनी माइथोलॉजी है. सब अपने संस्कृति के दृष्टिकोण को बताने के लिए आख्यानों का इस्तेमाल करते हैं. असल में, दुनिया को समझने का एक माध्यम है आख्यान, यानि माइथोलॉजी. जो विवाद करते हैं, वो जिज्ञासु नहीं होते, योद्धा होते हैं, उनके पास ज्ञान नहीं होता.

देवदत्त पटनायक ने कहा कि "पहले के जमाने में शास्त्रार्थ होते थे, जिसका मतलब होता था शास्त्रों का अर्थ निकलना. जबकि, टीवी पर और हमारे सीरियल्स में शास्त्रार्थ को सिर्फ बहस और अहंकार की लड़ाई की तरह दिखाते हैं. मगर, जहां सर्द बहस होती है, वहां से सरस्वती चली जाती है. याद रखिए, श्रद्धा ज्ञान का द्वार नहीं खोलती, जिज्ञासा ज्ञान का द्वार खोलती है. गुरु जो कहता है वो ही सही है, यदि आप मान लें तो यही आपकी श्रद्धा की शुरुआत हो जाएगी और फिर आप तर्क करना बंद कर देंगे. और शंका नहीं होगी तो हम फिर ज्ञान से दूर हो जाएंगे. शंका के समाधान के लिए हम मापदंड तय करते हैं. शंका मन में रहेगी तो शब्द मायने नहीं रखेंगे."

उन्होंने अंत में कहा कि "श्रद्धा से विज्ञान नहीं सीख पाओगे, बिल्कुल वैसे ही जैसे बिना लैब के आप विज्ञान नहीं पढ़ सकते. केवल गुरु के शब्दों में श्रद्धा रखकर विज्ञान नहीं पढ़ पाएंगे . शंका से ही विज्ञान पढ़ पाएंगे. मगर, आज कल कोई शंका करे, तो लोग एंटी नेशनल कह दिया जाता है. आप जब तक शंका में घिर मायथोलॉजी के पीछे के तर्क को नहीं समझेंगे, तब तक वह पूरी तरह आपकी श्रद्धा का विषय ही बना रहेगा. आप उसके कोई सीख नहीं ले पाएंगे."

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