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आपराधिक अवमानना केस में भाजपा विधायक की बढ़ी मुश्किल, हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत पेशी से छूट देने से किया इनकार, जानें पूरा मामला?

HC Judge Call Controversy: अवैध खनन से जुड़े प्रकरण में हाईकोर्ट के एक जज को कॉल करने के आरोप में आपराधिक अवमानना केस में फंसे भाजपा विधायक संजय पाठक के खिलाफ हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. हालांकि विधायक ने सुनवाई के दौरान बिना शर्त माफी मांग ली थी, बावजूद इसके कोर्ट ने उन्हें तलब करते हुए व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिया था.

आपराधिक अवमानना केस में भाजपा विधायक की बढ़ी मुश्किल, हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत पेशी से छूट देने से किया इनकार, जानें पूरा मामला?
JABALPUR HIGH COURT DENIES EXEMPTION OF PERSONAL APPEARANCE

Jabalpur High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भाजपा विधायक और खनन कारोबारी संजय पाठक को उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना के मामले में व्यक्तिगत पेशी से छूट देने से इनकार कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ के सामने पेश हुए पाठक के वकील ने विधायक के व्यस्त कार्यक्रम का हवाला देते हुए 15 जुलाई को अगली सुनवाई के दौरान उन्हें व्यक्तिगत पेशी से छूट देने का अनुरोध किया, लेकिन पीठ द्वारा उनकी याचिका खारिज कर दिया गया है.

अवैध खनन से जुड़े प्रकरण में हाईकोर्ट के एक जज को कॉल करने के आरोप में आपराधिक अवमानना केस में फंसे भाजपा विधायक संजय पाठक के खिलाफ हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. हालांकि विधायक ने सुनवाई के दौरान बिना शर्त माफी मांग ली थी, बावजूद इसके कोर्ट ने उन्हें तलब करते हुए व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश दिया था.

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भाजपा विधायक की कंपनी से जुड़ी सुनवाई से न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने खुद को अलग कर लिया था

गौरतलब है कटनी के आशुतोष दीक्षित द्वारा हाई कोर्ट में दायर एक याचिका में कहा गया था कि उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने पिछले साल सितंबर में पाठक से जुड़ी एक कंपनी से जुड़े कथित अवैध खनन के मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था. अपने आदेश में न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा था कि विधायक ने उनसे फोन पर संपर्क करने की कोशिश की और उन्होंने निष्पक्षता बनाए रखने के लिए खुद को अलग कर लिया और निर्देश दिया कि इस मुद्दे को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए.

हाईकोर्ट ने विधायक के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही दर्ज करने का निर्देश दिया था

याचिका में कहा गया है कि विधायक के आचरण ने न्यायपालिका की गरिमा को धूमिल किया है और न्यायिक कार्य में उनका हस्तक्षेप आपराधिक अवमानना के समान है. मामले में उच्च न्यायालय ने दो अप्रैल को भाजपा विधायक के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही दर्ज करने का निर्देश दिया था. इससे पहले हुई सुनवाई के दौरान पाठक ने गलती स्वीकार करते हुए दाखिल हलफनामे में बिना शर्त माफी मांग ली थी.

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मामला जबलपुर में सामने आया, जहां अवैध खनन से जुड़े एक केस के दौरान हाईकोर्ट के जज को फोन लगाए जाने का बीजेपी MLA संजय पाठक पर आरोप लगा. इसी को लेकर हाईकोर्ट में आपराधिक अवमानना के तहत सुनवाई हुई. कोर्ट ने इसे गंभीर विषय मानते हुए विधायक को नोटिस जारी किया. हाईकोर्ट ने मामले में कटनी जिले के विजयराघवगढ़ से भाजपा विधायक को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया था.

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विधायक का कहना था कि जज को कॉल लगना एक भूल थी और उनका कोई गलत इरादा नहीं था

सुनवाई के दौरान बीजेपी विधायक की ओर से अदालत के सामने बिना शर्त माफी मांगी गई. विधायक का कहना था कि जज को कॉल लगना एक भूल थी और उनका कोई गलत इरादा नहीं था. उन्होंने इसे अनजाने में हुई गलती बताया. संजय पाठक ने अदालत में दलील दी कि हाईकोर्ट के जज विशाल मिश्रा को कॉल गलती से लग गया था. इस कॉल के पीछे किसी तरह का दबाव या हस्तक्षेप का उद्देश्य नहीं था. उनके पक्ष में वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट के सामने अर्जी रखी और माफी की अर्जी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की अपील की थी.

 एक लंबित मामले की सुनवाई के दौरान विधायक ने हाईकोर्ट जज से संपर्क करने की कोशिश की

उल्लेखनीय है इस पूरे प्रकरण की शुरुआत कटनी निवासी आशुतोष दीक्षित द्वारा दायर याचिका से हुई थी. याचिका में आरोप लगाया गया कि एक लंबित मामले की सुनवाई के दौरान संजय पाठक ने हाईकोर्ट के जज से संपर्क करने की कोशिश की, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी, क्योंकि संजय पाठक परिवार से जुड़ा एक खदान से संबंधित मामला न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की कोर्ट में विचाराधीन था और सितंबर 2025 में न्यायमूर्ति मिश्रा ने बताया कि उनसे संपर्क साधने की कोशिश की गई और न्यायिक निष्पक्षता का हवाला देते हुए खुद को केस की सुनवाई से अलग कर लिया था.

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संबंधित अधिकारियों से शिकायत के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई तो याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचा गया

याचिकाकर्ता आशुतोष दीक्षित का कहना था कि मामले को लेकर पहले भी संबंधित अधिकारियों के सामने शिकायत की गई थी, लेकिन उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. इसके बाद मजबूर होकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद श्रीवास्तव और पुनीय श्रोती ने पक्ष रखा. वहीं संजय पाठक की ओर से अदालत के आदेश पर आपत्ति जताई गई, लेकिन मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने उन आपत्तियों को खारिज कर दिया.

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