Bhojshala Dhar Madhya Prades: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ द्वारा धार के विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को 'सरस्वती मंदिर' करार दिए जाने के फैसले पर विवाद बढ़ गया है. मुस्लिम पक्ष ने इस मध्यकालीन स्मारक में नमाज की अनुमति समाप्त करने संबंधी उच्च न्यायालय के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में चुनौती देने की घोषणा की है.
ASI की रिपोर्ट पर मुस्लिम पक्ष की आपत्ति
मुस्लिम पक्ष के वकील अशहर वारसी ने ‘पीटीआई-भाषा' से कहा, “हम भोजशाला मामले में उच्च न्यायालय के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और इसे जल्द से जल्द शीर्ष अदालत में चुनौती देंगे.” वारसी ने दावा किया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और उसकी रिपोर्ट ‘त्रुटिपूर्ण' थी. उन्होंने आरोप लगाया कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इसी विवादास्पद रिपोर्ट पर भरोसा किया है.
क्षेत्राधिकार और कानूनी प्रक्रिया पर सवाल
अशहर वारसी ने दलील दी कि 'विवादित तथ्यों' वाले इस संवेदनशील मामले का निपटारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत नहीं किया जाना चाहिए था. उनके अनुसार, इस मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए दीवानी अदालत भेजा जाना चाहिए था. वारसी ने स्पष्ट किया कि उनके मुवक्किलों ने धार की एक दीवानी अदालत में भोजशाला मामले को लेकर पहले ही मुकदमा दायर कर रखा है.
नमाज की पुरानी व्यवस्था हुई समाप्त
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 15 मई 2026 को अपने 242 पन्नों के विस्तृत फैसले में भोजशाला परिसर की धार्मिक प्रकृति 'वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर' के रूप में निर्धारित की है. इसी के साथ अदालत ने ASI के 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी. वारसी ने कहा कि इस आदेश के बाद नमाज की पुरानी व्यवस्था फिलहाल समाप्त हो गई है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट उनकी दलीलों पर विचार करते हुए इसे बहाल करेगा.
ASI सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष
ज्ञात हो कि उच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2024 को ASI को इस परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था. 98 दिनों तक चले सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को पेश की गई 2,000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट में ASI ने संकेत दिया था कि वहां परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल मंदिर संरचना पहले से मौजूद थी. रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान विवादित ढांचे का निर्माण पहले से मौजूद मंदिर के अवशेषों का पुन: उपयोग करके किया गया था.
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