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NDTV से बैगा आदिवासियों ने बयां कि पिछड़े पन की व्यथा, बदतर हाल में काट रहे जीवन, कब बदलेगी तस्वीर?

Singrauli Baiga Tribes : सिंगरौली की कमाई में कोई कमी नहीं है. ये जिला सरकार का खजाना भी भर रहा है. लेकिन यहां के बैगा आदिवासियों के सामने आज भी दशकों से पानी, बिजली और सड़क का घोर संकट है. NDTV से बैगा आदिवासियों ने बयां किया है अपने पिछड़े पन का दर्द.. मदद के लिए सरकार की राह देख रहे हैं. 

NDTV से बैगा आदिवासियों ने बयां कि पिछड़े पन की व्यथा, बदतर हाल में काट रहे जीवन, कब बदलेगी तस्वीर?

MP News In Hindi :  विकास के दावों का सच बौना साबित हो सकता है, NDTV कि ग्राउंड रिपोर्ट के आगे. दरअसल ये ग्राउंड रिपोर्ट सिंगरौली जिले के बैगा आदिवासियों की बुनियादी सविधाओं के सूखे पर आधारित है. अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और खनिज संपदाओं से भरपूर मध्यप्रदेश के दिल में बसे इलाके का सिंगरौली जिला आज भी बेहाल है, वैसे तो इसी इलाके से प्रदेश सरकार को इंदौर के बाद दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा राजस्व प्राप्त होता है, और इसी इलाके में बिजली बनती है, जो देश और विदेश को भी रोशन करती है. लेकिन इसके बावजूद यह इलाका आज भी पिछड़ेपन का दंश झेल रहा है. पावर हब सिंगरौली जिले के करीब सैकड़ों ऐसे इलाके हैं, जहां आज भी लोग अंधेरे में जीने को मजबूर हैं.

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गोभा ग्राम पंचायत में कब पहुंचेंगr 'विकास की किरण' ? 

सिंगरौली जिले के कई आदिवासी गांव में सड़क, पानी, बिजली अब तक नहीं पहुंच पाई है. लोग आज भी अंधेरे में जीने को विवश हैं. NDTV से बातचीत करते हुए गोभा ग्राम पंचायत क्षेत्र की आदिवासी इलाके की फूलमती बैगा बताती है कि "साहब हम तो अंधेरे में रहते हैं, जंगल से लकड़ी काटकर लाते हैं. उसी से खाना बनाते हैं. रात का खाना रात होने से पहले ही बना लेते हैं, क्योंकि अंधेरे में दिक्कत होती है.  पहले, तो कैरोसिन भी आसानी से मिल जाता था, अब तो वह भी नही मिलता, आधी उम्र पार हो गई. आधी बची है. वह भी गुजर जाएगी. 

आदिवासियों के उत्थान और विकास के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है. लेकिन आज भी इनकी किस्मत नहीं बदली. NDTV की टीम सिंगरौली जिले के गोभा ग्राम पंचायत क्षेत्र के एक जंगल में निवास करने वाले ऐसे ही आदिवासियों का हाल जाना. 

जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर गोभा ग्राम पंचायत क्षेत्र के इलाके में पहाड़ी की तलहटी के नीचे बैगा,गोंड आदिवासी निवास करते हैं. तकरीबन दो सौ से अधिक इन आदिवासियों की संख्या है. आज भी यहां रहने वाले जनजातियों की बदहाल तस्वीर पुराने युग के आदिवासियों का एहसास करा देता है.

दशकों से सुविधाओं से वंचित है ये गांव 

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यह जिले के बैढ़न जनपद के तहत आने वाली ग्राम पंचायत गोभा के अंतर्गत आता है. यहां न चलने के लिए सड़क है, न बिजली-पानी की व्यवस्था और न ही शिक्षा के कोई साधन हैं. कुल मिलाकर यह गांव आजादी के बाद से हर तरह की सुविधा से पूरी तरह वंचित है.

गांव में 200 से ज्यादा आदिवासी बैगा परिवार रह रहा 

सिंगरौली जिले के अंतिम पर बसे इस गोभा गांव में 200 से ज्यादा आदिवासी बैगा समुदाय के लोग रहते हैं. हर राजनीतिक दल के नेता यहां आते हैं और गांव की हालत पर अफसोस जताकर चले जाते हैं. यहां रहने वाले आदिवासियों का कहना है कि नेता दशकों से यहां के रहवासियों को केवल आश्वासन देते आ रहे हैं. उनके आश्वासन की आंच में आज भी यहां की जनता जल रही है.

'चुनाव के बाद नहीं आते नेता'

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इलाके आदिवासी महिला पार्वती ने NDTV को बताया कि चुनाव आते ही नेताओं को हम लोग याद आते है. फिर, चुनाव खत्म होते ही हम लोगों को उसी हाल पर छोड़ दिया जाता है. यहां आज भी लोग बीमार पड़ने पर दूसरा सहारा लेते हैं. करते हैं. या फिर खाट पर लेकर किसी तरह मुख्य सड़क पर पहुंचते है, जहां से वाहनों के द्वारा अस्पताल जाते हैं.

MP से CG जाना पड़ता इनको बाजार करने 

चौंकाने वाली बात यह है कि विकास न होने से लोग सीमा से लगे छत्तीसगढ़ राज्य पर मध्य प्रदेश से ज्यादा आश्रित हैं. इन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और हाट बाजार के लिए छत्तीसगढ़ जाना पड़ता है. लोगों के लिए यहां से प्रदेश के हाट बाजार जाना, स्कूल जाना, व्यापार के लिए जाना ज्यादा दूर और कठिनाइयों भरा होता है.

नाले का पानी पीने को मजबूर बैगा आदिवासी 

गांव की आदिवासी महिला हिरामती ने बताया कि एक किलोमीटर दूर से नाले का पानी लाते हैं, उसे छानकर पीते हैं,इस गांव में हैंडपंप नहीं है और न ही कोई अन्य कुआं ,जिस वजह से गड्ढे खोदकर पानी निकालते हैं, और उसे छानकर पीते हैं.

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बारिश के दिनों में कट जाता है गांव

यहां के रहने वाले बैगा आदिवासियों ने NDTV को बताया कि यहां जीवन जीना आसान नहीं. शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार तो दूर की बात है, खाना-पीना तक ढंग से नहीं मिलता. किसी को कोई बीमारी हो जाती है तो छत्तीसगढ़ राज्य जाना पड़ता है. यह जिला मध्यप्रदेश के आखिरी सीमा पर बसा है जहां से छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, झारखंड, की सीमा से जुड़ा हुआ है,बारिश में तो यह गांव पूरी तरह कट जाता है. लोगों का घरों से भी निकलता मुश्किल होता है. पता नहीं कब इस जिंदगी से निजात मिलेगी.

जानें इस मुद्दे पर क्या बोले सिंगरौली कलेक्टर

सिंगरौली कलेक्टर चंद्र शेखर शुक्ला ने NDTV से कहा कि यह सच है कि जिले में कई इलाकों में आदिवासियों की स्थिति दयनीय है. लेकिन उसके लिए जिला प्रशासन व सरकार भी कई योजनाएं के माध्यम से उनकी स्थिति को बेहतर करने का प्रयास कर रही है, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रशासन के तरफ से भी प्रयास किये जा रहे है.

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