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Manmohan Singh Died: जब इस्तीफा देने जा रहे थे मनमोहन, तब अटल ने समझाया और देश के दरवाजे दुनिया के लिए खुल गए

मनमोहन सिंह बिना कोई चुनाव जीते या बिना किसी सदन के सदस्य हुए ही 1991 में देश के वित्त मंत्री बने थे. इसके बाद साल 1999 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने उन्हें दक्षिण दिल्‍ली लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार बनाया था. तब सोनिया गांधी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए 20 लाख रुपये भी दे दिए थे. लेकिन, वह चुनाव हार गए.

Manmohan Singh Died: जब इस्तीफा देने जा रहे थे मनमोहन, तब अटल ने समझाया और देश के दरवाजे दुनिया के लिए खुल गए

Manmohan Singh Death News: देश के आर्थिक दरवाजों को दुनिया के लिए खोलने वाले देश के पहले सिक्ख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे. वे जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी के बाद चौथे सबसे लंबे समय तक पीएम पद पर रहने वाले शख्स थे. उनके बारे में कई बार उनके विरोधी कहते थे कि वे एक्सिडेंटल PM थे लेकिन खुद मनमोहन सिंह ने एक बार कहा था कि में एक्सिडेंटल PM नहीं, एक्सिडेंटल वित्त मंत्री भी था. देश को क्रांतिकारी बजट देने वाले मनमोहन सिंह से जुड़े कुछ किस्सों को आज भी आम जनता याद करती है.

सियासत में कैसे आए मनमोहन?

मनमोहन सिंह बिना कोई चुनाव जीते या बिना किसी सदन के सदस्य हुए ही देश के वित्त मंत्री बने थे. दरअसल हुआ ये था कि नरसिंह राव जब देश के प्रधानमंत्री बने थे मनमोहन सिंह यूजीसी के चेयरमैन के पद पर तैनात थे.नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री बनने की कहानी खुद मनमोहन सिंह ने ही एक बार सुनाई थी. उन्होंने कहा था- जब वह मुझे वित्त मंत्री बनाना चाहते थे तब मैं रोजाना की तरह अपने ऑफिस यूजीसी में बैठा हुआ था. उन्होंने मुझे फोन किया और कहा कि आप कहां हो? मैंने जवाब दिया कि मैं अपने ऑफिस में बैठा हूं. तब उनका रिप्लाई आया, आपको मंत्री पद की शपथ लेनी है. पूर्व पीएम ने जवाब दिया कि तब मैंने गंभीरता से नहीं लिया था. हालांकि बाद में मुझे स्थिति की गंभीरता का पता चल गया.

पहले बजट के बाद इस्तीफा देने जा रहे थे मनमोहन

बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने जब बजट का ड्राफ्ट तैयार किया और नरसिंह राव के पास ले गए तो नरसिंह राव ने उसे देखा और कहा- क्या मैंने इसलिए आपको वित्त मंत्री बनाया था. मनमोहन सिंह इशारा समझ गए और फिर दोबारा से ड्राफ्ट तैयार कर ले आए. ये एक ऐसा बजट था जिसने देश में उदारीकरण के दरवाजे खोल दिए. लेकिन हुआ ये कि संसद में उनके बजट भाषण के तुरंत बाद तब के विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी जमकर आलोचना की. कहा जाता है कि इससे आहत होकर मनमोहन सिंह ने नरसिंह राव के सामने इस्तीफे की पेशकश तक कर दी थी. लेकिन नरसिंह राव ने तब अटल जी को बुलाया और खुद अटल जी ने ही मनमोहन सिंह को समझाया कि सदन के अंदर उनकी आलोचना उन्होंने विपक्ष के नेता के तौर पर की थी. 1991 से 1996 के बीच वो पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में भारत के वित्त मंत्री रहे. उन्होंने देश में हुए आर्थिक सुधारों में अहम रोल निभाया था. मनमोहन सिंह ने बजट के दौरान उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से जुड़े कई ऐलान किए थे, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिली.

जीवन में एक ही चुनाव लड़ा वो भी हार गए

अपने लंबे राजनीतिक जीवन में मनमोहन सिंह ने केवल एक बार ही लोकसभा चुनाव लड़ा था. दरअसल साल 1999 में के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने उन्हें दक्षिण दिल्‍ली लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार बनाया था. तब सोनिया गांधी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए 20 लाख रुपये भी दे दिए थे. लेकिन, वह चुनाव हार गए. उन्हें बीजेपी के  विजय कुमार मल्होत्रा से हार मिली थी. इसके बाद 2004 में टिकट की पेशकश होने के बावजूद उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था.

RBI का गवर्नर जो प्रधानमंत्री भी बना

मनमोहन सिंह एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने RBI के गवर्नर के रूप में भी कार्य किया है। वह 1982-1985 तक RBI के गवर्नर थे। 21 जून 1991 से 6 मई 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक सुधारों के लिए भी श्रेय दिया जाता है. मनमोहन सिंह ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट के साथ युवावस्था के दौरान संयुक्त राष्ट्र के लिए काम किया.

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जब मंत्री से कहा- मैं वापस प्रोफेसर की नौकरी कर लूंगा

बात उन दिनों की है जब मनमोहन कैंब्रिज से लौटे थे। उन्हें विदेश व्यापार विभाग में सलाहकार नियुक्त किया गया था. तब इस विभाग के मंत्री ललित नारायण मिश्र थे. इसी दौरान किसी बात को लेकर उनकी मिश्र जी से खटपट हो गई. तब मनमोहन सिंह ने ललित नारायण मिश्र को साफ-साफ शब्दों में कह दिया था- ज्यादा हुआ तो वह दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अपनी प्रोफेसर की नौकरी पर वापस चले जाएंगे. तब इंदिरा के सचिव पीएन हक्सर ने मामले को सुलझाया था.

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