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Jhiram Valley Attack: झीरम घाटी की अनकही कहानी: एक शिक्षक, एक छात्र और अधूरी यादें

Jhiram Ghati mastermind: धन सिंह के लिए सदा सिंह नाग कोई राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि एक शिक्षक थे, जो उन्हें हल्बी भाषा पढ़ाते थे, जो गांव के बच्चों के लिए सिर्फ ‘सर’ थे. छोटे-छोटे गांवों में शिक्षक सिर्फ पढ़ाने वाले नहीं होते, बल्कि वह बच्चों की दुनिया गढ़ने वाले होते हैं. ऐसे में एक शिक्षक का जाना सिर्फ एक परिवार का नुकसान नहीं होता, बल्कि पूरी पीढ़ी के भीतर एक खालीपन छोड़ जाता है.

Jhiram Valley Attack: झीरम घाटी की अनकही कहानी: एक शिक्षक, एक छात्र और अधूरी यादें

Jhiram Kaand: छत्तीसगढ़ में बस्तर के झीरम घाटी की कहानी अक्सर बड़े नेताओं की मौत, नक्सलियों की क्रूरता और राजनीतिक नुकसान के रूप में सुनाई जाती है, लेकिन इन सुर्खियों के पीछे एक और दुनिया है, उन अनगिनत चेहरों की, जिनकी कहानियां इतिहास के पन्नों में कहीं दर्ज ही नहीं हो पाईं. यह कहानी उन्हीं में से एक है सदा सिंह नाग और उनके एक छात्र की, जो आज भी अपने ‘सर' को उसी तरह याद करता है, जैसे वह कभी कक्षा में खड़े होकर पढ़ाते थे.

धन सिंह मौर्य उस वक्त सिर्फ 12 साल के थे. आज वह बस्तर डेयरी फार्म में काम करते हैं, दूध की डिलीवरी करते हैं, लेकिन जब झीरम का जिक्र आता है, तो उनकी आवाज में वही बचपन लौट आता है. “मुझे बस उनका चेहरा याद है,” वह कहते हैं. “उस दिन रविवार था… क्या हुआ था, ये मुझे पता ही नहीं था. अगले दिन स्कूल में पता चला कि हमारे सर नहीं रहे…”

हल्बी भाषा के शिक्षक थे सदा सिंह नाग

धन सिंह के लिए सदा सिंह नाग कोई राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि एक शिक्षक थे, जो उन्हें हल्बी भाषा पढ़ाते थे, जो गांव के बच्चों के लिए सिर्फ ‘सर' थे. छोटे-छोटे गांवों में शिक्षक सिर्फ पढ़ाने वाले नहीं होते, बल्कि वह बच्चों की दुनिया गढ़ने वाले होते हैं. ऐसे में एक शिक्षक का जाना सिर्फ एक परिवार का नुकसान नहीं होता, बल्कि पूरी पीढ़ी के भीतर एक खालीपन छोड़ जाता है.

नाग की मौत से संकट में डूब गया पूरा परिवार

सदा सिंह नाग छिंदवाड़ा गांव के रहने वाले थे और कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए थे. वह उसी काफिले में शामिल थे, जो अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाया. उनके जाने के बाद उनके परिवार की दुनिया पूरी तरह बदल गई. उनकी पत्नी उज्ज्वला ने अकेले अपने दोनों बच्चों की जिम्मेदारी संभाली. संघर्ष आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. करीब दो साल बाद उनकी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति पर सरकारी नौकरी मिली, जो आज परिवार का सहारा है, लेकिन परिवार के लिए न्याय का मतलब सिर्फ नौकरी या मुआवजा नहीं है. परिवार कहता है कि हमारे लिए असली न्याय तब होगा, जब दोषियों को सजा मिले. यह एक ऐसी आवाज है, जो समय के साथ धीमी जरूर हो जाती है, लेकिन खत्म नहीं होती है.

"बदलाव काफी नहीं"

बस्तर बदल रहा है. यह बात धन सिंह भी मानते हैं. “अब यहां स्कूल हैं. चार-पांच स्कूल हो गए हैं. प्राइवेट स्कूल भी खुल गए हैं. हम लोग वहीं पढ़ते थे, वह बताते हैं. लेकिन साथ ही यह भी जोड़ते हैं कि अस्पताल अब भी पुराना है. यानी विकास की कहानी यहां अधूरी है. कुछ बदला है, कुछ अब भी वहीं ठहरा हुआ है. इन सबके बीच एक चीज है जो बिल्कुल नहीं बदली यादें.

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झीरम शहीद स्मारक में सदा सिंह नाग की तस्वीर आज भी लगी है. कई लोगों के लिए वह बस एक तस्वीर है, लेकिन धन सिंह जैसे छात्रों के लिए वह एक रिश्ता है. वह कभी-कभी वहां जाते हैं, तो चुपचाप खड़े होकर अपने ‘सर' को याद करते हैं. वहां कोई भाषण नहीं होता, कोई औपचारिकता नहीं होती, बस एक छात्र और उसके शिक्षक के बीच एक खामोश संवाद होता है. आज धन सिंह की जिंदगी आगे बढ़ चुकी है काम है, जिम्मेदारियां हैं, रोजमर्रा की भागदौड़ है। लेकिन इन सबके बीच एक स्मृति हमेशा साथ चलती है एक चेहरे की, एक आवाज की, एक शिक्षक की. 

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